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वैवाहिक रिश्ते को मजबूती देता है पति का परिवार के प्रति समर्पण

Posted On: 3 Sep, 2011 Common Man Issues में

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loving family

हमारी फिल्मों में अकसर एक ऐसे आदर्श परिवार की कहानी को दर्शाया जाता है जिसमें बेटा अपने माता-पिता का पूरे दिल से आदर करता है, साथ ही अपने परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी पूरी लगन से पूरी करता है. वह अपने माता-पिता और छोटे भाई बहनों की जरूरतों को पूरा करना अपना कर्तव्य समझता है. लेकिन ऐसा सिर्फ तब तक होता है जब तक वह अविवाहित होता है, क्योंकि विवाह के पश्चात परिस्थितियां पूरी तरह नकारात्मक रूप से बदलने लगती हैं. जो बेटा अपने परिवार के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता था, वह उनसे अलग-थलग रहना शुरू कर देता है. एक ही घर में रहने के बावजूद वह अपने परिवार को उसकी करीबी का अहसास भी नहीं होने देता. संबंधों का निर्वाह उसके लिए मात्र एक औपचारिकता बनकर रह जाती है. एक ही छ्त के नीचे रहते हुए वह अपनी अलग एक दुनियां बसा लेता है, जिसमें केवल उसकी बीवी और बच्चे शामिल होते हैं. उसके इस व्यवहार से माता-पिता को भावनात्मक रूप से बहुत चोट पहुंचती है, पर वे बेचारे अपने बेटे के परिवार की खुशी को देखते हुए जैसे-तैसे अपने गमों को सहन करना शुरू कर देते हैं. ऐसा इसीलिए नहीं होता है कि शादी के बाद बेटे का अपने परिवार के प्रति प्यार और लगाव कम हो जाता है बल्कि बेटे की इस बेरुखी और परिवार के दयनीय हालातों का सबसे बड़ा कारण बनती है उसकी जीवन संगिनी, जिसे लगता है कि उसका पति परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियां उठाकर अपना समय बर्बाद कर रहा है. वह यह सहन नहीं कर पाती कि उसके पति के जीवन में किसी और की अहमियत भी समान रूप से रहे. वह उसे किसी ना किसी रूप में छोटी-छोटी बातों पर भड़काती रहती है. उसे यह अच्छा नहीं लगता कि उसका पति विवाह के बाद भी अभिभावकों का दुलारा बनकर उनकी शरण में रहे. आखिरकार वह उपने पति को भावनात्मक और भौतिक रूप से उसके माता-पिता और परिवार से दूर करने में सफल हो ही जाती है. लेकिन कहानी फिल्मी है इसीलिए अंत तक पहुंचते-पहुंचते कई नाटकीय प्रसंगों के बाद सब कुछ ठीक-ठाक, बिलकुल पहले जैसा हो जाता है. दुख और संकट के कई दिन बिताने के बाद परिवार एक बार फिर मिलजुल कर खुशी से जीने लगता है.


हो सकता है यह कहानी कई लोगों को आपबीती जैसी प्रतीत हो रही हो, जिसे पढ़ने के बाद वह भी सब कुछ पहले जैसे होने की कामना कर रहे हों.


लेकिन क्या वास्तव में बिगड़े हुए पारिवारिक हालात इतनी आसानी से ठीक किए जा सकते हैं?


दुर्भाग्यवश इस समस्या का हल खोजना इतना आसान नहीं है. क्योंकि यहां सबसे बड़ी परेशानी व्यक्तियों के आपसी स्वभाव के ना मिलने की और उनकी महत्वाकांक्षाओं में अंतर होने की है.


प्राय: देखा जाता है कि पहले जो परिवार प्रेमपूर्वक रह रहा होता है, अचानक बेटे के विवाह के बाद खुद को कटा-कटा महसूस करने लगता है. बेटे के वैवाहिक जीवन में दखल देना भी माता-पिता को अटपटा सा लगने लगता है, जिसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उनकी पुत्रवधु को यह पसंद नहीं आता कि उसका पति माता-पिता को प्राथमिकता दे. छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होने शुरू हो जाते हैं. जिनका निपटारा करने का कोई और विकल्प ना मिलने की हालत में बेटे की गलती ना होने के बावजूद उसे परिवार और पत्नी में से एक को चुनने के लिए विवश कर दिया जाता है. उसकी भावनाओं की तरफ कोई ध्यान नही देता. वह तो अपने माता-पिता और पत्नी से समान रूप से प्रेम करता है और चाहता है कि उसका पूरा परिवार एक साथ मिल-जुल कर रहे. लेकिन उसकी इच्छाओं और अपेक्षाओं को महत्व नहीं दिया जाता.


हमारी फिल्मों में पुरुषों का अपने परिवार के प्रति समर्पण एक सामाजिक हकीकत को दर्शाता है. पुरुषों को चाहे कितना ही संबंधों के प्रति लापरवाह और अक्खड़ समझा जाए लेकिन वास्तविकता यह है कि जब परिवार की बात आती है तो वह अपनी सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन बखूबी और पूरी संजीदगी से करते हैं. इन सब के अलावा यह भी देखा जाता है वे पुरुष जो अपने परिवार से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए होते हैं, उनसे अत्याधिक प्रेम करते है, वे अपनी पत्नी या प्रेमिका के प्रति भी ईमानदार और अपने संबंध के प्रति गंभीर होते हैं.


हालांकि वर्तमान परिदृश्य में नौकरी की तलाश और अच्छे आय के साधनों की तलाश में पुत्र को विवाह से पहले और बाद में अपने परिवार से दूर रहना पड़ता है जिसमें ना तो उसकी और ना ही उसकी पत्नी की कोई गलती होती है. लेकिन अगर महिलाएं यह केवल यह सोच कर विवाह करें कि उन्हें अपने पति को परिवार से अलग ही रखना है, ताकि उनका स्थान कभी कोई और ना लेने पाए और उनकी महत्ता किसी भी हाल में कम ना हो सके, तो यह उनकी बहुत बड़ी गलती है. उन्हें यह समझना चाहिये कि अगर उनका पति अपने परिवार से लगाव रखता है और माता-पिता का आदर करता है तो वह भी तो उसके परिवार का ही हिस्सा बन रही हैं. नि:संदेह उन्हें भी अपेक्षित प्यार और सम्मान प्राप्त होगा. पति को परिवार से अलग रहने के लिए मजबूर करना उसे और उसके परिवार को भावनात्मक रूप से आहत करने के अलावा किसी भी रूप में सार्थक सिद्ध नहीं हो सकता. हां कुछ विशिष्ट परिस्थितियां और पारिवारिक जरूरतें ऐसे हालातों का अपवाद कहे जा सकते हैं.


किसी भी समस्या की शुरूआत एक पक्ष से नहीं होती. हर बार गलती पुत्रवधु की ही हो ऐसा जरूरी नहीं. कई बार ऐसा भी होता है कि परिवार वाले पुत्रवधू का दमन और शोषण करना अपना अधिकार समझने लगते हैं. जिसके परिणामस्वरूप वह अपने ही परिवार के भीतर घुट-घुट कर जी रही होती है. सास-ससुर अपने बेटे पर इतना ज्यादा अधिकार जताने लगते हैं, उसके वैवाहिक जीवन में अत्याधिक दखल देने लगते हैं कि पत्नी को अपना ही पति पराया लगने लगता है. ऐसे हालातों में वह किसी भी तरह परिवार से दूर जा कर अपना अलग परिवार बसाने की चाह रखने लगती हैं.


यद्यपि हम ऐसी समस्याओं को परिवार का आपसी मसला मानकर नजरअंदाज करना ही बेहतर समझते हैं लेकिन हमें इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि धीरे-धीरे यह पारिवारिक समस्याएं, पूरे समाज को अपनी चपेट में लेती जा रही हैं. यहां तक की परिवार से दूर रहना एक प्रचलन बन कर उभरने लगा है. अधिकांश लोग इसे आत्म-निर्भरता और व्यक्तिगत जीवन की दुहाई देकर ढक लेना चाहते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि हमारे पारिवारिक मूल्य अब समाप्त होते जा रहे हैं. गलती चाहे किसी भी हो, उसका भुगतान पूरे परिवार को करना पड़ता है.


इसीलिए जरूरी है कि हम अपनी मानसिकता को बदलने की कोशिश करें. मॉडर्न और आत्म-केन्द्रित होने का अर्थ यह कतई नहीं है कि एक भरे-पूरे परिवार को तोड़ दिया जाए. हां शुरूआत में थोड़ी बहुत परेशानियां अवश्य आती हैं. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि परिवार की महत्ता को भूलकर अपने लिए अलग जीवन की तलाश शुरू कर दी जाए. हमें यह समझना होगा कि वास्तविक खुशी परिवार के साथ रहने में है. क्योंकि स्वतंत्रता और व्यक्तिगत जीवन की चाह कभी अपनेपन के अहसास से बड़ी नहीं हो सकती.


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