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पुरुषों को परिपक्व और पारिवारिक बनाती है संतान!!

Posted On: 21 Sep, 2011 Common Man Issues में

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father and sonअगर पारिवारिक संबंधों और बच्चों के प्रति जिम्मेदारियों के विषय में बात की जाए, तो अधिकांश लोगों का यही मानना है कि महिलाएं अपनी संतान को लेकर अधिक भावुक और संजीदा होती हैं. मातृत्व ग्रहण करने के बाद वह बच्चों की जरूरतों को पूरा करना ही अपनी प्राथमिकता समझने लगती हैं, परिणामस्वरूप शारीरिक संबंधों में उनकी रुचि पहले की अपेक्षा कम हो जाती है. लेकिन पुरुष चाहे विवाहित हो या ना हों, उनके विषय में यह बात सर्वमान्य है कि उनकी प्राथमिकताओं में शारीरिक संबंध सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं. इस बात से भी इन्कार नहीं किया जाता कि व्यक्तिगत संबंधों को लेकर उनमें मानसिक भटकाव की संभावनाएं भी महिलाओं से कहीं अधिक होती हैं. जरूरत पड़ने पर वह अपने साथी को धोखा भी दे सकते हैं. वह अपने परिवार और उनकी जरूरतों को अपनी अपेक्षाओं से कमतर ही आंकते हैं.


अगर आप भी विवाहित महिला-पुरुष की प्राथमिकताओं और संतान के प्रति उनके दायित्वों को लेकर ऐसी ही किसी भ्रांति को तथ्य मानते हैं, तो एक नया अध्ययन आपकी इस मानसिकता को परिवर्तित करने में बहुत हद तक सहायक हो सकता है.


नेशनल अकादमी ऑफ साइंस द्वारा कराए गए इस शोध की स्थापनओं में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है कि भले ही पुरुष विवाह के पश्चात अपने स्वभाव और प्राथमिकताओं को परिवर्तित करने में ज्यादा दिलचस्पी ना लेते हों, लेकिन पिता बनने के बाद वह पूरी तरह पारिवारिक हो जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनके चारित्रिक भटकाव की संभावनाएं भी लगभग समाप्त हो जाती हैं. इतना ही नहीं वह अपनी संतान के विषय में महिलाओं से कहीं ज्यादा गंभीर होते हैं, जिसके कारण वह बिना किसी दबाव के खुद को उसके अनुरूप ढाल लेते हैं. जितना महिलाएं अपने जीवन में संतान के आने का इंतजार करती हैं, उससे कहीं ज्यादा पुरुष भी बच्चे के लिए उत्साहित रहते हैं.


शोधकर्ताओं का कहना है कि पिता बनने के बाद पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन, जो कामभावना को बढ़ाता है, के स्तर में गिरावट आने लगती है. जिसकी वजह से वह शारीरिक संबंधों में भी कम रुचि लेने लगते हैं. विशेषकर वे पुरुष जो एक नवजात शिशु के पिता हैं, उनमें तो टेस्टोस्टेरोन हार्मोन न्यूनतम रह जाता है.


पांच साल तक चले इस शोध के नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पिता बनने के बाद पुरुष अधिक परिपक्व और जिम्मेदार हो जाते हैं. वह स्वयं को अपनी संतान के प्रति समर्पित कर देते हैं. जो बदलाव विवाह जैसा संबंध नहीं ला पाता, वह पिता बनने के बाद उनमें स्वत: ही आ जाता है.


शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि टेस्टोस्टेरोन नाम का यह हार्मोन, कई बीमारियों की भी जड़ है. पिता बनने के बाद इस हार्मोन में गिरावट आने के कारण उनकी सेहत हमउम्र युवकों की अपेक्षा कहीं बेहतर होती है.


एक विदेशी संस्थान द्वारा कराए गए इस शोध के नतीजों को भारतीय परिदृश्य में देखा जाए तो इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि भले ही विवाह से पहले पुरुष अपने संबंधों को लेकर बेपरवाह रहते हों, उनके विषय में गंभीरता से ना सोचते हों. लेकिन अपने वैवाहिक जीवन में वह पूर्णत: समर्पित रहते हैं. वैसे तो विवाह के पश्चात ही उनके उस बेपरवाह स्वभाव में कमी आने लगती है, लेकिन जैसे ही उनके जीवन में संतान का आगमन होता है, वह मानसिक और भावनात्मक रूप से अत्याधिक परिपक्व हो जाते हैं. पितृत्व ग्रहण करने के बाद संतान के साथ समय बिताने के लिए वह अपने शौक और जरूरतों को भी भूल जाते हैं. ऐसे हालातों में स्वाभाविक तौर पर वह शारीरिक संबंधों के विषय में ज्यादा नहीं सोचते.


ऐसा नहीं है कि पिता बनने के बाद अपनी पत्नी के लिए उनका प्रेम कम हो जाता है या फिर संबंध बनाने के लिए वह स्वयं को सहज नहीं समझते, उनकी बदलती हुई प्राथमिकताओं के पीछे सबसे बड़ा कारण उनकी अपनी भावनाएं और पिता बनने का अहसास होता है, जिसे वह किसी भी रूप में नकार नहीं पाते. पिता बनने के बाद वह अपने वैवाहिक जीवन और पत्नी के महत्व को और अच्छी तरह समझने लगते हैं. परिणामस्वरूप पति-पत्नी की आपसी भावनाएं केवल शारीरिक संबंधों की मोहताज ना रहकर अत्याधिक मजबूत बन पड़ती हैं. वह ना केवल अपनी संतान के करीब हो जाते हैं, बल्कि स्वयं पिता बनने के बाद वह अपने अभिभावकों की भावनाओं को भी और अच्छी तरह समझ उनका सम्मान करने लगते हैं. जीवन में संतान का आगमन उन्हें पारिवारिक तो बनाता ही है, साथ ही आपसी भावनात्मक संबंधों को भी सजीव कर देता हैं.


हमारे समाज में पिता की छवि परिवार में एक ऐसे व्यक्ति की होती हैं, जिसके कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी होती है. इसीलिए गृहस्थी को सुचारू रूप से चलाने और बच्चों के जीवन को खुशहाल बनाए रखने के लिए उसे थोड़ा कठोर होना ही पड़ता है. लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं होता कि पिता अपने बच्चों से प्यार नहीं करते.


आम धारणा के अनुसार भले ही मां को बच्चे के ज्यादा करीब समझा गया हो,  लेकिन वास्तविकता यह है कि पिता भी बच्चों से उतना ही लगाव और प्यार रखते हैं. हालांकि स्वाभाविक रूप से शारीरिक संबंध पुरुषों के जीवन में प्राथमिकता रखते हैं. उनका वैवाहिक जीवन भी इसी के अनुरूप चलता है. लेकिन पिता बनने के बाद वह अपनी शारीरिक इच्छाओं पर नियंत्रण पाने में बहुत हद तक सफल हो जाते हैं और पिता बनने के अहसास को वह अपने जीवन में सबसे ज्यादा महत्व देते हैं.


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