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महिला या पुरुष होने से कोई फर्क नहीं पड़ता शासन की शैली पर

Posted On: 29 May, 2011 Common Man Issues में

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प्रारम्भिक काल से ही भारतीय समाज पुरुष प्रधान रहा है. घर हो या बाहर पुरुषों का हर जगह एकछत्र राज रहा है. महिलाओं को हमेशा पुरुषों के मुकाबले दूसरे दर्जे पर ही रखा गया है. अपनी जरूरतों के लिए उसे कभी पिता तो कभी पति पर ही निर्भर रहना पड़ा है.


यूं तो आज़ादी के समय से ही स्त्री स्वच्छंदता की कहानी लिखी जाने लगी,किसी हद तक उसे वास्तविक रूप में भी उकेरा गया परंतु आज तक उस कहानी को पूर्ण रूप नहीं दिया गया है. आज महिलाएं घर संभालने के साथ-साथ व्यावसायिक क्षेत्र में भी अपनी सफलता का परचम लहरा रही हैं. विज्ञान हो या व्यापार, शिक्षा हो या खेल जगत, हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज़ करा अपने लिए सम्मानजनक मुकाम हासिल किया है.


वहीं भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति पर नज़र डालें तो आज देश के चार बड़े राज्य जैसे दिल्ली, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल की कमान महिलाओं के ही हाथों में है. इतना ही नहीं कॉग्रेस आलाकमान और लोकसभा की अध्यक्ष भी एक महिला ही हैं, साथ ही राष्ट्रपति जो देश का प्रथम नागरिक होता है, उस पद की शोभा भी एक महिला ही बढ़ा रही है.


अक्सर देखा गया है कि राजनैतिक परिस्थितियां ही उस देश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का निर्णायक कारक बनती हैं. उल्लेखनीय बात यह है कि जिस देश की महिलाओं को हमेशा से ही केवल घर सम्भालने के लिये ही उपयुक्त समझा गया हो, जब वो देश को सम्भालने की ज़िम्मेदारी उठाती हैं, तो क्या वो अन्य उपेक्षित महिलाओं के उत्थान के लिये कार्य करती हैं? या फिर सत्ता में आने वाला व्यक्ति केवल सत्ताधारी ही रह जाता है और सत्ता के नशे मे चूर वह सिर्फ राज करने में मशगूल होता है?पारिवारिक परिस्थितियां, आर्थिक स्थिति और व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएं कुछ ऐसे आधारभूत तत्व हैं, जो उसके चरित्र का निर्माण करते हैं, और चारित्रिक स्वच्छता ही एकमात्र कसौटी है जो उस व्यक्ति को अच्छा या बुरा सिद्ध करती है.


आज दिल्ली,तमिलनाडु,उत्तर प्रदेश,पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की मुख्यमंत्री महिलाएं हैं. भारत के कई राज्यों में यूं तो महिला उत्थान के लिए अलग-अलग योजनाएं चलायी जा रही हैं, पर व्यवहारिक तौर पर ये योजनाएं अपने उद्देश्य को पूरा करने में कितनी सक्षम हैं,इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री एक दलित महिला है, लेकिन उन्हीं के प्रदेश में महिलाओं के हालात बेहद दयनीय हैं. हत्या ,बलात्कार जैसे जघन्य अपराध तो अब उत्तर प्रदेश की पहचान ही बन गए हैं, दबंगों द्वारा दलित मज़दूरों, किसानों को ज़िन्दा जलाए जाने की घटनाएं तो अब आए दिन सुनने को मिल जाती हैं. दूसरी तरफ,देश की राजधानी दिल्ली की ही बात की जाए तो यहां भी महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद महिलाओं की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आ पाया है. आज भी कभी घर तो कभी बाहर हर जगह उसे प्रताड़ित होना ही पड़ता है, दिल्ली सरकार द्वारा चलाई जा रही लाडली योजना जो गरीब लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिये चलाई जा रही है उसकी वास्तविकता किसी से छुपी नहीं है. वहीं उदाहरण लिया जाए तमिलनाडु का तो नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री जयललिता खुद ही भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी हुई हैं, इसलिए यहां तो कोईं उम्मीद रखना ही फिज़ूल है.हां,तृणमूल अध्यक्षा ममता बनर्जी ज़रूर चौंतीस साल पुराने मार्क्सवादियों के आधिपत्य को समाप्त कर बंगाल की सत्ता पर काबिज़ हुई हैं. चुनावी नतीजों ने तो यह साबित कर दिया कि जनता को अब बदलाव की ज़रूरत है लेकिन एक महिला मुख्यमंत्री अपनी ज़िम्मेदारी निभा पाती है या नहीं, इसका इंतज़ार हम सभी को रहेगा.


सही मायने में शासक का चरित्र सत्ता का चरित्र का होता है जिसके असर से बच पाना किसी भी व्यक्ति के लिए कठिन है. तानाशाही, अधिकारिता, उपेक्षा की नीति, सत्ता के लिए जोड़-तोड़, नीतियों के क्रियांवयन में भेदभाव, मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए सामुदायिक हितों को प्रश्रय देना आदि तमाम ऐसे सत्ता जनित दुर्गुण हैं जिनके लिए महिला या पुरुष की कोई अहमियत नहीं होती. यही कारण है कि सत्ता में आने के पश्चात किसी भी स्त्री या पुरुष का व्यवहार एक ही तरह देखने को मिलता रहा है. और इसीलिए भले ही भारत में मुख्यमंत्री पद के लिए चुनी गयी तमाम महिलाओं के बारे में सकारात्मक बयानबाजी की जा रही हो लेकिन अंतिम सत्य तो उनकी कार्यशैली देखकर जानी जा सकती है.



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