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महिला सशक्तिकरण के लिए पिता की संपत्ति में बेटियों को भी मिलेगा अधिकार

Posted On: 17 Oct, 2011 Common Man Issues में

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equality in india

भारतीय समाज में महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा हमेशा दोयम दर्जे का स्थान ही प्रदान किया गया है. घर के भीतर या बाहर बिना किसी पुरुष के साथ के उसका समाज में रहना तक दूभर माना जाता है. भले ही पहले की अपेक्षा वर्तमान हालातों में थोड़ी तब्दीली आई हो, लेकिन इस बात को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि आज भी महिलाएं अपने स्वतंत्र अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं, जिसमें उन्हें सफलता की उम्मीद तो है लेकिन यह सफलता कब मिलेगी इस बात को लेकर कोई आश्वस्त नहीं है.


पहले महिलाओं को घर की चार दीवारी के बाहर जाने और पढ़ने की इजाजत नहीं थी, उनके हितों को कोई महत्व नहीं दिया जाता था तथा परिवार के भीतर उन्हें मात्र पराश्रित ही समझा जाता था. इसके समाधान के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक भारत सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान और उनके विकास के लिए कई योजनाएं बनाई गईं. परिणामस्वरूप आज महिलाएं अपनी पहचान बनाने और समय के साथ चलने के उद्देश्य से पढ़ने के साथ-साथ पुरुषों की भांति व्यावसायिक क्षेत्र में भी अपना योगदान दे रही हैं.


लेकिन दूसरी तरफ उन्हें हमेशा इसी डर के साये तले रहना पड़ता है कि कभी भी उनसे यह अधिकार छिन सकता है. भले ही पिता के घर उन्हें काम करने का अधिकार है लेकिन अगर पति को उसके काम करने से आपत्ति हुई तो अपना वैवाहिक जीवन बचाने के लिए निश्चित तौर पर उसे अपना कॅरियर त्यागना पड़ेगा. उसे एक बार फिर अपने पति के रूप में एक पुरुष के ऊपर आश्रित रहने के लिए विवश कर दिया जाएगा. इसके अलावा अगर पति ने विवाह के पश्चात उसकी या परिवार की जरूरतों का ख्याल नहीं रखा या फिर किसी अनहोनी के कारण उसके पति का निधन हो गया तो ऐसे में उसके बच्चों और उसका अपना भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. विवाह के पश्चात वह अपने पिता या भाई से भी कोई सहायता नहीं मांग सकती इसीलिए उसे अपने जीवन को ऐसे ही अपनाना पड़ता है. इसके अलावा भारतीय परिप्रेक्ष्य में परिवारों में बेटों को ही उत्तराधिकारी माना जाता है. पिता के निधन के पश्चात कानूनी या सामाजिक तौर पर उसकी संपत्ति पर बेटी को न्यूनतम हक दिया जाता रहा है. यही कारण है कि परिवार में बेटियों को समानता के अधिकार से वंचित रहना पड़ता है.


इस समस्या के समाधान हेतु भारत के सर्वोच्च न्यायाल्य ने अपने एक निर्णय में यह घोषित किया है कि पिता की संपत्ति में जितना हक बेटे का है उतना ही बेटी को दिया जाएगा. पिता के नाम पर कोई भी प्रॉपर्टी या धन रजिस्टर है तो इसका बंटवारा उनके सभी बच्चों में, चाहे बेटी हो या बेटा, बराबर किया जाएगा.


supreme courtहिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून-2005 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है कि पिता के उत्तराधिकार को बेटे और बेटी में समान रूप से बांटा जाए. यह व्यवस्था सितंबर 2005 के बाद प्रॉपर्टी के सभी तरह के बंटवारों में लागू होगी. बेटियों को बराबरी का दर्जा देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि उत्तराधिकार के साथ-साथ बेटियों को अपने पिता के उत्तरदायित्वों को भी निभाना पड़ेगा. इससे आशय है कि अगर पिता पर कोई कर्ज है तो इसे बेटा और बेटी दोनो मिलकर चुकाएंगे.


उल्लेखनीय है कि हिंदू उत्तराधिकार [संशोधन] कानून, 2005 में बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में सहोदर भाइयों के बराबर अधिकार है. इस संशोधन के पहले बेटियों को यह अधिकार नहीं था.


सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश परिवार और समाज में बेटियों की स्थिति को पहले से बेहतर करने में सहायक हो सकता है. युवती चाहे विवाहित हो या अविवाहित दोनों ही हालातों में संपत्ति का बराबर बंटवारा लाभदायक होगा. अकसर देखा जाता है कि पिता के निधन के पश्चात भाई अपनी बहनों के साथ बुरा व्यवहार करने लगते हैं. उन्हें जीवन यापन करने के लिए खर्च देना बंद कर देते हैं. ऐसे में उस स्त्री का अपना धन उसके काम आएगा. इसके अलावा विवाह के पश्चात भी अगर किसी महिला को आर्थिक तंगी से जूझना पड़ता है तो वह अपने भाई से अपना हक मांग सकती है.


प्राचीन काल में विवाह के समय कन्या को पिता के द्वारा उपहार और नकद दिया जाता था, जिसे स्त्रीधन कहते थे. यह वह धन होता था जो पूर्णत: संबंधित स्त्री की संपत्ति होता था जो मुश्किल समय में उसके काम आता था. इस पर ससुराल पक्ष का कोई अधिकार नहीं होता था. धीरे-धीरे यह परंपरा दहेज के रूप में परिवर्तित हो गई जिसने भयंकर रूप धारण कर लिया. कहने को तो दहेज स्त्री को दिया जाता था, लेकिन व्यवहारिक तौर पर उस धन पर पूरा अधिकार पति और ससुराल वालों का ही होता था. दहेज के लालची स्त्री को मात्र पैसे का स्त्रोत मानने लगे. उसे मूलभूत सुविधाओं से वंचित रख धन का उपभोग करने लगे. उसके पास नकद धन राशि या प्रॉपर्टी नहीं होती थी इसीलिए वह आश्रय के लिए ससुराल वालों के अत्याचार को सहन करने के लिए विवश हो जाती थी. ऐसी परिस्थितियों में पिता की संपत्ति में उसका हक बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है.


यद्यपि भारत में अभी भी ज्यादातर आबादी शिक्षा और जरूरी सूचनाओं से वंचित ही रह जाती है, इसके अलावा स्त्रियां भी पैसे को लेकर अपने भाई से संबंध तोड़ने या फिर उनमें खटास पैदा करने में अपनी रुचि नहीं रखतीं, इसको देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश कितना लाभदायक सिद्ध हो सकेगा यह तो समय के साथ ही पता चलेगा. लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह एक सकारात्मक संकेत है कि अब महिलाओं को कानूनी अधिकार मिलने लगे हैं. हो सकता है धीरे-धीरे परिवार के भीतर भी उनकी भूमिका को स्वीकार कर लिया जाए.


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