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इस वजह से 14 सितंबर को मनाया जाता है हिंदी दिवस, 1953 से हुई शुरुआत

Posted On: 14 Sep, 2017 Common Man Issues में

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14 सितंबर एक ऐसी तारीख है, जिस दिन हमेशा अंग्रेजी बोलने वाले ज्‍यादातर भारतीय भी हिंदी को याद कर लेते हैं। ये अलग बात है कि दुनिया की प्रमुख भाषाओं में से एक हिंदी, अपने ही देश में अपने अस्‍तित्‍व के लिए लड़ रही है। देशभर में हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। मगर क्या आपको पता है कि इस तारीख को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है? आइये हम आपको बताते हैं इसकी वजह।


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14 सितंबर 1949 को बनी राष्‍ट्र की आधिकारिक भाषा

6 दिसंबर 1946 को आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान सभा का गठन हुआ। सच्चिदानंद सिन्हा संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को इसका अध्यक्ष चुना गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली कमेटी) के चेयरमैन थे। संविधान में विभिन्न नियम-कानून के अलावा नए राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का मुद्दा भी अहम था। क्‍योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां थीं। काफी विचार-विमर्श के बाद हिन्दी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की आधिकारिक भाषा चुना गया। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया। बाद में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को देखते हुए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। पहला आधिकारिक हिन्दी दिवस 14 सितंबर 1953 को मनाया गया था।


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हिंदी का प्रचार-प्रसार करना केंद्र सरकार की जिम्‍मेदारी


आजादी की लड़ाई के दौरान ही एक राष्ट्र के लिए एक साझा भाषा की मांग उठती रहती थी। अलग-अलग प्रांतों के नेताओं ने हिन्दी को देश की संपर्क भाषा बनने के काबिल माना। समूचे उत्तर भारत के अलावा पश्चिम भारत के ज्यादातर राज्यों में हिन्दी बोली-समझी जाती थी। मगर दक्षिण भारतीय राज्यों और पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए हिन्दी परायी भाषा थी। इसीलिए आजादी के बाद हिन्दी को देश की राजभाषा घोषित नहीं किया गया। संविधान के अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी को अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों के रूप में विकसित और प्रचारित करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है। उस समय यह सोच थी कि सरकार हिन्दी का प्रचार-प्रसार करेगी और जब यह पूरे देश में आम सहमति से स्वीकृत हो जाएगी, तब इसे राजभाषा घोषित किया जा सकेगा।


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अंग्रेजी को हटाने के समय हुआ था विरोध


जब अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के तौर पर हटने का वक्त आया, तो देश के कुछ हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए। तमिलनाडु में जनवरी 1965 में भाषा विवाद को लेकर दंगे भड़क उठे। उसके बाद केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन करके अंग्रेजी को हिन्दी के साथ भारत की आधिकारिक भाषा बनाए रखने का प्रस्ताव पारित किया। आधिकारिक भाषा के अलावा भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं।


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