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दिल से निभाएं अपनी दोस्ती !!

Posted On: 14 Nov, 2011 Common Man Issues में

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group of friendsउम्र का एक पड़ाव ऐसा होता है जब हम अपने दिमाग से ज्यादा दिल की आवाज सुनते हैं. यही कारण है कि बिना किसी द्वेष या इर्ष्या के अपने साथ खेलने और पढ़ने वाले सभी बच्चों को अपना दोस्त मानते हैं. उनके साथ हंसी-मजाक करते-करते समय कब बीत जाता है कुछ पता नहीं चलता. लेकिन ऐसी खुशहाल उम्र की आयु बहुत छोटी होती है. यह समय गुजरने के बाद हम अपने दिल की आवाज को नजरअंदाज करते हैं और आत्म-केंद्रित हो अपने मस्तिष्क से काम लेने लगते हैं. अन्य व्यक्तियों की भावनाओं की परवाह किए बगैर, मात्र अपने फायदे और नुकसान के विषय में सोचने लगते हैं. यही वजह है कि जहां किशोरवस्था में हमारे पास दोस्तों की एक पूरी टोली हुआ करती थी वहीं तथाकथित परिपक्वता के स्तर पर पहुंचते-पहुंचते दोस्त के नाम पर हमारे पास बस एक या दो व्यक्ति ही रह जाते हैं. बचपन में अपने जन्मदिन पर ज्यादा से ज्यादा दोस्त भी हमें कम दिखाई देते थे, वहीं आज अगर एक-दो भी मिल जाएं तो उसे ही हम गनीमत मानते हैं.


हालांकि कुछ समय पहले तक जब सुविधाओं और विकल्पों की पहुंच आम जन के जीवन को नहीं छू पाई थी तब भी आजीवन व्यक्ति अपने दोस्तों से ही घिरा रहता था. वहीं अब एक खास आयु के बाद दोस्तों की अहमियत हमें सोचने का विषय ही नहीं लगती.


अमेरिका की कोर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपनी स्टडी द्वारा यह बात प्रमाणित की है कि कुछ वर्ष पहले जहां एक औसत ब्रिटिश नागरिक के तीन करीबी दोस्त हुआ करते थे वहीं आज इनकी संख्या एक या दो रह गई है.


लाइवसाइंस में प्रकाशित इस रिपोर्ट के अनुसार शोध से जुड़े मुख्य वैज्ञानिक मैथ्यू ब्रैशियर्स का कहना है कि हमारे संबंध जितने कम होंगे हम उतने ही ज्यादा संवेदनशील बन पाएंगे. इसीलिए अगर हम कम दोस्त बनाते हैं तो यह कोई हैरानी या परेशानी वाली बात नहीं है.


भले ही विदेशी वैज्ञानिकों को संकुचित होता सामाजिक दायरा और दोस्तों की घटती संख्या एक सामान्य बात लगती हो, लेकिन भारतीय समाज, जो पारिवारिक और सामाजिक संबंधों की एक मजबूत नींव पर ही खड़ा हुआ है, उसके लिए आपसी संबंधों की घटती महत्ता और दिनोंदिन सिकुड़ता दायरा एक गंभीर विषय है. पहले दोस्तों के लिए जान दी जाती थी वहीं आज उनकी जरूरत भी अपने अनुसार ही निर्धारित की जाती है.


पहले जब जीवन बहुत सादा और सीमित हुआ करता था तब आपसी जरूरतों को पूरा करने के लिए और सुख-दुख के क्षणों में दोस्त ही एक एक-दूसरे का सहारा बनते थे. लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. आज जीवन का कोई भी क्षेत्र भौतिक सुविधाओं से अछूता नहीं है. धन-संपन्नता तक पहुंचने वाले सभी दरवाजे हमारे लिए खुले हुए हैं. खुद को साबित करने और एक-दूसरे से आगे निकलने जैसी प्रतिस्पर्धाओं के चलते हमारी जीवनशैली इतनी ज्यादा जटिल बन पड़ी है कि इसे सुलझाने के लिए ना तो हमारे पास वक्त है और ना ही हम ऐसा करना ही जरूरी समझते हैं. इस प्रतिस्पर्धा का ही परिणाम है कि आज हमारे भीतर ईर्ष्या,  द्वेष, स्वार्थ और अहंकार जैसी नकारात्मक भावनाएं अपनी जड़ें जमा चुकी हैं. हम यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते कि हमसे आगे कोई भी निकल पाए, फिर चाहे वह व्यक्ति हमारे लिए कितना ही प्रिय और जरूरी क्यों ना हो. उसकी सफलता हम सहन नहीं कर पाते. यही वजह है कि आज जब हम दोस्तों के विषय में सोचने बैठते हैं तो हमें एक या दो व्यक्तियों के नाम ही याद आते हैं.


तनावग्रस्त जीवनशैली होने के कारण हमारे भीतर सहनशीलता की भी कमी आने लगी है. छोटी-छोटी बातों पर हम एक-दूसरे से मुंह फेर लेते हैं. मतभेदों को सुलझाने के स्थान पर दोस्त को पीछे छोड़ आगे बढ़ना ही बेहतर समझते हैं. हमें यहीं लगता है कि उसे जरूरत होगी तो अपने आप बात करेगा. जबकि हकीकत यह है कि जब आप किसी परेशानी में होंगे तो सबसे पहले आपको ही एक दोस्त की कमी खलेगी. स्वयं को खुश रखने के लिए एक अच्छे और ख्याल रखने वाले दोस्त का ख्याल ही काफी है. ऐसे दोस्त को गंवाना आगे चलकर तकलीफदेह बन सकता है.


अत्याधुनिक संचार और मनोरंजन साधनों की बढ़ती लोकप्रियता ने दोस्त और दोस्ती की अहमियत को लगभग खत्म ही कर दिया है. वयस्कों की तो बात ही छोड़िए आज तो बच्चे भी पार्क या गलियों में खेलते नहीं बल्कि अकेले एक कमरे में बंद टी.वी. या कार्टून देखते हुए ही मिलते हैं. सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है आज अच्छे से अच्छे दोस्त भी नेट पर ही एक-दूसरे का हाल जानकर संतुष्ट हो जाते हैं. इसे देखकर यही लगता है कि सामाजिक प्राणी समझा जाने वाला व्यक्ति कब इलेक्ट्रॉनिक मानव बन जाएगा कुछ पता नहीं चलेगा.


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