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विवाह में उम्र का महत्व – विश्लेषण

Posted On: 9 Jul, 2011 Common Man Issues में

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wedding coupleविवाह हर व्यक्ति के जीवन में एक बेहद अहम पड़ाव होता है. यह वह समय होता है जिस पर आगे का सारा जीवन निर्भर करता है. भारत जैसे देश में विवाह एक बहुत ही पुरानी और शानदार परंपरा के रुप में बरसों से चली आ रही है. भारत में यूं तो सभी रश्में अनूठी होती हैं पर विवाह से जुड़ी रश्में और भी शानदार होती हैं और साथ ही इनसे जुड़े रीति-रिवाज भी बहुत अलग होते हैं.


विवाह नामक संस्था में वर और वधू की शादी करवाने से पहले कई तरह के कर्म-कांड और कुण्डली मिलान आदि किए जाते हैं. साथ ही विवाह के समय इस बात का भी ख्याल रखा जाता है कि वर, वधू से बड़ा हो यानि लड़का, लड़की से बड़ा हो फिर वह चाहे कुछ महीने या साल ही क्यूं ना हो. लड़के और लड़की की उम्र में यह फासला उनके भावी भविष्य को ध्यान में रखकर ही किया जाता है.


चाहे शादी परंपरागत रूप से माता-पिता की मर्जी से हो या आधुनिक कोर्ट मैरिज अक्सर लड़के ही लड़कियों से बड़े होते हैं. एक 25 साल के लड़के के लिए उसके माता पिता 21 या ज्यादा से ज्यादा 24 साल तक की लड़की को ही पसंद करते हैं. ऐसा आज से नहीं बरसों से होता आ रहा है. कभी कभार कुछेक कारणों की वजह से अगर लड़की लड़के से बड़ी हो तो भी चलता है पर कोशिश तो यही होती है कि लड़की उम्र में छोटी हो और लड़का बड़ा.


क्यों अपनायी गयी हैं ऐसी परंपरा


ऐसा इसलिए नहीं होता कि भारत में पुरुष प्रधान समाज है बल्कि ऐसा लड़के और लड़की की शारीरिक और जैविक बदलावों को ध्यान में रखकर किया जाता है. अक्सर देखा जाता है कि लड़कियां लड़कों से पहले शारीरिक और मानसिक तौर पर परिपक्व हो जाती हैं. एक औसत 20 साल की लड़की की सोचने, समझने, धैर्य और तर्कविचार की क्षमता एक 25 साल के लड़के के बराबर होती है. लड़कियों में शारीरिक विकास भी लड़कों की अपेक्षा ज्यादा जल्दी और तेज रफ्तार में होता है.


हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई इस रीति का वैज्ञानिक पहलू बेहद अहम है. अगर एक लड़के की शादी उससे अधिक उम्र की लड़की से की जाती है तो इसमें कई तरह की परेशानियां आ सकती हैं. जैसे मान लीजिए एक 25 साल के लड़के की शादी 26 या 27 साल की भी लड़की से कर दी जाती है तो दोनों में भावनात्मक रूप से एक-दूसरे को समझ पाने में कई मुश्किलें पेश आती हैं. साथ ही लड़की जो लड़के से अधिक समझदार होती है, वह लड़के को तर्क विचार में कई बार हीन महसूस कराने लगती है. कई बार ऐसा जानबूझ कर भी नहीं किया जाता पर इससे लड़के के अहं को बहुत ठेस पहुंचती है. साथ ही दोनों के बीच कई बार धैर्य की कमी भी महसूस होने लगती है. शादी वैसे भी एक ऐसा रिश्ता होता है जिसमें धैर्य और विश्वास की बहुत जरुरत होती है और ऐसे में जब बात-बात पर लड़की को लगता है कि लड़का कम समझदार है तो तकरार होने लगती है.


लड़की के बड़े होने से एक और समस्या सामने आती है दोनों के बीच शारीरिक संबंधों में टकराव का बढ़ना. लड़कियां लड़कों से पहले जवान हो जाती हैं और उनमें शारीरिक विकास भी लड़कों से अधिक होता है. ऐसे में जब एक कम उम्र लड़का अपनी से बड़ी लड़की से शारीरिक संबंध बनाता है तो कई बार उसे लगता है वह लड़की को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है और दोनों के संबंध लंबे समय तक बने रहने की उम्मीदें कम हो जाती हैं.


ठीक ऐसे ही अगर लड़का, लड़की से छोटा हो तो लड़की को भी कई तरह की परेशानियां होती है जैसे लड़के के विचार लड़की के विचारों से कम प्रभावी हो जाते हैं, लड़के की सोचने की क्षमता लड़की को कम लगती है जो किसी भी पत्नी के लिए चिंता का विषय है. भारत में पत्नियां पतियों से चाहती हैं कि वह हर अहम मसले पर अपनी सटीक राय दें और उनके पति उनसे अधिक समझदार हो पर जब उम्र में लड़का कम होता है तो सोच, तर्कविचार और अनुभव में उसका उन्नीस होना कोई बड़ी बात नहीं.


आज समाज के कई वर्ग यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आखिर क्यूं शादी के समय हमेशा लड़के ही बड़े हों और ज्यादा उम्र की लड़की से शादी करने में दिक्कत क्या है? देखिए इससे यह फर्क नहीं पड़ता कि लड़की अगर बड़ी हुई तो वह लड़के पर अधिकार जताएगी या खुद को उससे ऊपर समझेगी बल्कि इससे लड़के और लड़की की शादीशुदा जिंदगी पर गहरा असर पड़ता है. दोनों के बीच संबंधों में शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर परेशानियां खड़ी होने लगती हैं.


यह तो सिर्फ वह बिंदु हैं जो दिखाई देते हैं कई ऐसे भी बिंदु होते है जो दिखाई नहीं देते पर उनका प्रभाव काफी गहरा होता है. लड़की और लड़के के उम्र में जो अंतर बरसों से चला आ रहा है वह रुढ़िवादी ना होकर पूर्णत: प्रयोगवादी (प्रैक्टिकल) है. अगर हम आज के समाज में भी देखें तो पता चलता है कि शादी में अगर लड़के की उम्र लड़की से ज्यादा हो तो शादी लंबे समय तक चलती है.


अंतत: यह साफ है कि बरसों से जो परंपरा हमारे पूर्वजों ने बनाई है वह सही है और उसके परिणाम हमेशा सकारात्मक ही होते हैं. वैसे भी हमारे बड़े-बुजुर्ग जो भी करते हैं वह हमारी भलाई के लिए ही करते हैं. लड़के और लड़की के बीच उम्र का फासला दोनों के आपसी संबंधों को मजबूती देता है, इससे दोनों के अधिकारों को किसी तरह की हानि नहीं होती और सामंजस्य बना रहता है. इसलिए इस मुद्दे पर किसी विवाद को आगे बढ़ाने की बजाय इसकी सहज अनिवार्यता स्वीकार करनी चाहिए.



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