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International Women’s Day 2019 : कभी ‘चिपको आंदोलन’ तो कभी ‘पिंजरा तोड़’ जब महिलाओं ने कहा ‘हल्ला बोल’

Posted On: 8 Mar, 2019 Common Man Issues में

Pratima Jaiswal

जन-जन से जुड़ी दास्तांसमाज की विभिन्न जरुरतों व समस्यायों को उभारता और समाधान तलाशता ब्लॉग

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वक्त बहुत तेजी से आगे बढ़ गया है। पिछले कई दशकों में महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। आज हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। लेकिन फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में महिलाओं का शोषण या ज्यादती की खबरें सामने आती रहती हैं। वहीं, उन्हें कई जगह या क्षेत्रों में कमतर तक आंका जाता है। आपके आसपास भी ऐसे कई लोग होंगे जिनके विचार महिलाओं के प्रति कुछ आपत्तिजनक होंगे। ये बात पढ़ने में थोड़ी अटपटी लगती है लेकिन कड़वी सच्चाई है। बहरहाल, ऐसा नहीं है कि कुछ दशकों में ही महिलाएं आगे बढ़ी हो बल्कि इससे पहले भी महिलाएं अपने अधिकारों को लेकर जागरूक रही हैं। अपने अधिकारों को आवाज देने के लिए महिलाओं ने ऐसे कई आंदोलनों का नेतृत्व किया है जो दुनिया भर में मशहूर हुए हैं। आइए, डालते हैं एक नजर।

 

मी टू
भारत में इसकी शुरूआत तनुश्री दत्ता ने की थी। उन्होंने नाना पाटेकर पर आरोप लगाए थे। भारत में यह मूवमेंट 2017 में शुरू हुआ। वहीं यह कैंपेन हाल-फिलहाल का नहीं है। इसकी शुरूआत 2006 में हुई थी। इस कैंपेन की शुरूआत हॉलीवुड से हुई थी। इसकी शुरूआत अमेरिकी सिविल राइट्स एक्टिविस्ट तराना बर्क ने की थी। भारत में मी टू कैंपेन शुरू होने के बाद से अब तक कई बड़ी बॉलीवुड हस्तियों के नाम इसमें सामने आ चुके हैं इनमें विकास बहल, चेतन भगत, रजत कपूर, कैलाश खैर, जुल्फी सुईद, आलोक नाथ, सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य, तमिल राइटर वैरामुथु और मंत्री एमजे अकबर शामिल हैं।

 

नो कंडीशन अप्लाई
बंगाल और कई राज्यों में दुर्गा पूजा में सिंदूर खेलने की परंपरा रही है। ‘सिंदूर खेला’ आयोजन में सिर्फ विवाहित महिलाएं ही भाग ले सकती थीं लेकिन इस कैम्पेन में समाज की सभी वर्ग की महिलाओं को जोड़ने की बात की गई। इसमें विधवा, ट्रांसजेंडर, तलाकशुदा, लेस्बियन, सेक्स वर्कर या अन्य उपेक्षा की शिकार महिलाओं को भी सिंदूर खेले में शामिल किए जाने पर जोर दिया गया था। इस कैम्पेन का समर्थन करने वाली महिलाएं माथे पर दो डॉट लगाकर सभी वर्ग को जोड़ने की बात कहती थीं। 400 सालों की परंपरा को तोड़ते हुए इसे मुहिम को एक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा था।

 

 

 

मैं बाहर जा रही हूँ
2017 में नए साल के दिन बैंगलोर में नया साल मनाने आई लड़कियों के साथ छेड़छाड़ हुई थी, ऐसे में बात सामने आने पर कई नेताओं ने बयान दिया था कि कुछ जगह महिलाओं का न जाना ही ठीक है, जैसे पब, बीयर बार।
इस आपत्तिजनक बयान पर प्रतिक्रिया करते हुए महिलाओं ने ऐसी सोच को लेकर मार्च निकाला था जिसमें 30 से ज्यादा शहरों की लड़कियों ने भाग लिया था। अपराधियों को सजा देने के बजाय महिलाओं पर पाबंदी लगाने के खिलाफ था ये आंदोलन। जिसमें रात में बिना रोकटोक बाहर जाने पर जोर दिया गया था।

 

चिपको आंदोलन
इस आंदोलन की शुरुआत 70 के दशक में उत्तराखंड के चमोली के किसानों ने पेड़ों की कटाई का विरोध करने के लिए की थी। जिसके बाद इस आंदोलन ने पूरे भारत में जोर पकड़ लिया। हालांकि, जंगलों को बचाने के लिए लोग पेड़ों की कटाई का शांति से विरोध कर रहे थे। जैसा कि नाम से जाहिर है लोग पेड़ों को काटने से बचाने के लिए पेड़ों से चिपक या लिपट जाते थे। ठेकेदारों को पेड़ों को काटने से बचाने के लिए यह आंदोलन गांधी जी की अहिंसा की नीति पर आधारित था। चिपको आंदोलन के प्रणेता सुन्दरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरादेवी हैं। इसी वजह से सुंदरलाल बहुगुणा को वृक्षमित्र और गौरा देवी को हम ‘चिपको विमन’ के नाम से भी जानते हैं। इस आंदोलन में महिलाओं ने अहम भूमिका निभाई थी।

 

 

गुलाबी गैंग
गुलाबी गैंग की शुरुआत हुई संपत पाल नाम की महिला के ससुराल छोड़ने से। घरेलू हिंसा की शिकार संपत ने कई महिलाओं का समूह बनाया और शोषण के विरूद्ध आवाज उठाने के लिए निकल पड़ी। इनकी पहचान थी एक लाठी और गुलाबी साड़ी। इन्होंने शोषकों पर लाठी से हमला बोलकर उन्हें सबक सिखाया।…Next

 

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