blogid : 316 postid : 999

प्रेम विवाह में बरती जाने वाली सावधानियां

Posted On: 8 Sep, 2011 Common Man Issues में

जन-जन से जुड़ी दास्तांसमाज की विभिन्न जरुरतों व समस्यायों को उभारता और समाधान तलाशता ब्लॉग

Social Issues Blog

1284 Posts

830 Comments

love marriageआजकल हमारे युवा परंपरागत विवाह शैली से इतर प्रेम-विवाह को अधिक तरजीह देने लगे हैं. उनका मानना है कि जब विवाह के बाद पति-पत्नी को साथ ही रहना है तो बेहतर है कि वे पहले से ही एक-दूसरे को जानते-समझते हों ताकि आगे चलकर स्वभाव भिन्नता और ताल-मेल को लेकर किसी भी प्रकार की समस्या उनके संबंध में ना आने पाए. लेकिन जहां तक हमारे पारंपरिक समाज की बुजुर्ग पीढ़ी की बात है तो वह आज भी बच्चों का विवाह अपने संरक्षण में करने की ही पैरवी करती है. उसका तर्क है कि अगर शादी-ब्याह परिवार की रजामंदी और उनकी पसंद से किया जाए तो उससे दोनों परिवारों में आपसी लगाव और एक-दूसरे के प्रति सहयोग की भावना का विकास होता है. अगर कहीं लड़का-लड़की आपस में ही शादी करने का फैसला कर लें, तो भले ही परिवार वालों को उनकी जिद के आगे सिर झुकाना पड़े, लेकिन पूरी आत्मीयता से उनके संबंध को स्वीकार नहीं कर पाते.


ऐसे में दोनों में से किसी को भी गलत नहीं कहा जा सकता. लेकिन अब समय बदल चुका है, इसीलिए जरूरी है कि पुरानी मानसिकता को त्याग दिया जाए. अभिभावकों को चाहिए कि वे अपनी मान्यताओं और सामाजिक प्रतिष्ठा से ज्यादा अहमियत अपने बच्चों की खुशी और उनकी पसंद को दें. हालांकि भारतीय समाज के संदर्भ में विवाह जैसे संबंध केवल पति-पत्नी को ही नहीं उन दोनों के परिवार को भी आपस में जोड़ते हैं. लेकिन अगर हमारे युवा प्रेम-विवाह को ही अपनी पसंद मानते हैं, तो बेहतर है कि उनके इस निर्णय का सम्मान कर उन्हें पूरा समर्थन दिया जाए ताकि परिवारों के आपसी संबंध में किसी भी प्रकार का मनमुटाव ना पैदा हो.


ऐसा नहीं है कि प्रेम-विवाह हमेशा सफल ही रहते हैं. हमारे समाज में कई ऐसे उदाहरण हैं जिनके अनुसार यह कहना गलत नहीं होगा कि विवाह चाहे परंपरागत तरीके से संपन्न किया जाए या फिर आजकल के युवाओं की मन-मर्जी से, उसका निर्धारण करने से पहले अगर थोड़ी सी भी असावधानी बरती जाए तो वह पति-पत्नी के वैवाहिक संबंध और परिवार दोनों के लिए ही घातक सिद्ध हो सकती है.


विशेषकर प्रेम-विवाह जिसमें यह पूरी तरह युवक और युवती पर ही निर्भर करता है कि वो किस व्यक्ति से विवाह करना चाहते हैं और इसमें परिवर की भागीदारी न्यूनतम रह जाती है तो ऐसे में बहुत हद तक संभव है कि अगर किसी कारणवश यह निर्णय गलत साबित हो जाता है, तो परिवार वाले इसकी जिम्मेदारी नहीं लेंगे और पति-पत्नी ताउम्र अपने इस फैसले के लिए खुद को कोसते रहेंगे.


love marriageइसीलिए अगर आप प्रेम-विवाह करने जा रहे हैं या करने की सोच रहे हैं तो बेहतर होगा कि निम्नलिखित बिंदुओं पर गौर कर लें ताकि आगे चलकर आपके वैवाहिक जीवन में मनमुटाव और मतभेदों के लिए स्थान ना रहे:


  • आपसी ताल-मेल को परख लें – जिस व्यक्ति से आप विवाह करना चाह रहे हैं, बेहतर होगा उसके सभी पक्षों को अच्छी तरह परख लें. कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता, कमियां सभी में होती हैं. अगर परंपरागत शैली से विवाह किया जाए तो व्यक्तियों को एक-दूसरे को जानने का मौका नहीं मिलता, लेकिन जब आप प्रेम-विवाह की तरफ ही आकृष्ट हो रहे हैं तो भावी जीवन साथी के गुण-दोषों को जानने के बाद ही कोई निर्णय लें. अगर आपको लगे कि आप दोनों की आपसी समझ और तालमेल विकसित हो चुकी है और आप एक-दूसरे की कमियों के साथ जीवन व्यतीत कर सकते हैं, तभी भविष्य के बारे में सोचें.

  • स्वभाव भिन्नता – प्राय: देखा जाता है कि प्रेमी-प्रेमिका चाहे एक-दूसरे से कितना ही प्रेम क्यों ना करते हों, उनका स्वभाव आपस में मेल नहीं खाता. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि दो व्यक्तियों के स्वभाव और विचारधारा का मिलन बहुत कठिन है. जिसकी वजह से वैवाहिक जीवन में छोटी-मोटी नोंक-झोक होना लाजमी है. लेकिन अगर यही छोटी-मोटी बातें बड़ा रूप ले लें तो समस्या पैदा हो सकती है. अगर पति-पत्नी में से एक व्यक्ति गुस्सैल प्रवृत्ति का है और दूसरा खुद को थोड़ा शांत रखता है तब बिगड़ते हालातों को सुधारा जा सकता है लेकिन अगर दोनों ही क्रोधी स्वभाव के हों तो स्थिति अनियंत्रित बन जाती है.

  • पारिवारिक सदस्यों का स्वभाव – विवाह के पश्चात युवती को अपने पति के घर में उसी के माता-पिता के साथ रहना होता है. हालांकि वर्तमान परिवेश में एकल परिवारों की संख्या में दिनोंदिन वृद्धि देखी जा सकती है, लेकिन फिर भी ससुराल पक्ष से मेल-जोल होना स्वाभाविक है. इसीलिए विवाह करने से पहले ना सिर्फ अपने होने वाले जीवन साथी का बल्कि ससुराल वालों के स्वभाव को भी जान लेना भी एक अच्छा विकल्प है ताकि आगे चलकर किसी भी प्रकार का मनमुटाव पैदा ना होने पाए.

  • परिवार वालों की रजामंदी – अगर आप अपने परिवार वालों की मर्जी के विरुद्ध जाकर विवाह करने की सोच रहे हैं, तो आपका यह निर्णय आगे चलकर आपके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. अगर दुर्भाग्यवश आपके वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार की समस्या पैदा हो गई तो ऐसे हालातों में आपका साथ देने के लिए आपका परिवार आपके साथ कोई सहयोग नहीं करेगा. वैसे तो अधिकांश मामलों में भारतीय परिवार प्रेम-विवाह, विशेषकर अंतर्जातीय विवाह की अनुमति नहीं देते. लेकिन वह भी अपने बच्चों की खुशी को समझते हैं इसीलिए उनकी रजामंदी से विवाह किया जाए तो ही बेहतर है.

  • परिपक्वता और व्यवहारिकता से निर्णय लें – ऐसा देखा जाता है कि युवा एक-दूसरे से बड़े-बड़े वायदे कर लेते हैं, लेकिन जब उन्हें निभाने का वक्त आता है तब उन्हें जीवन की हकीकत समझ आती है. इसीलिए विवाह का निर्णय पूरी परिपक्वता के साथ अपनी प्राथमिकताओं और अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए. भावनाओं में बहकर किया गया निर्णय अंत में पछतावे के सिवा और कुछ नहीं देता.

  • विवाह के पश्चात बदलाव के लिए भी तैयार रहें – प्रेम-विवाह करने के बाद पति-पत्नी अकसर एक-दूसरे से यहीं शिकायत करते हैं कि अब वह आपस में उतना समय नहीं बिता पाते जितना पहले बिताया करते थे. इसके अलावा उन्हें यह भी लगने लगता है कि अब उनकी प्राथमिकताओं में अंतर आने लगा है. प्रेम-विवाह करने से पहले आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी के उत्तरदायित्वों और प्राथमिकताओं में बहुत अंतर होता है. विवाह से पहले वह सिर्फ एक-दूसरे के प्रति ही उत्तरदायी होते थे, आज उन्हें अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. ऐसे में लाजमी है कि उन दोनों की प्राथमिकताओं में थोड़ा बहुत अंतर आए. लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि दोनों के बीच का लगाव और प्रेम कम हो गया है. आपके द्वारा की गई ऐसी शिकायतें वैवाहिक जीवन में खलल डाल सकती हैं.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग