blogid : 316 postid : 850

मेट्रो शहरों में बुजुर्गों के खिलाफ असम्मान और उपेक्षा की प्रवृत्ति

Posted On: 19 Jul, 2011 Common Man Issues में

जन-जन से जुड़ी दास्तांसमाज की विभिन्न जरुरतों व समस्यायों को उभारता और समाधान तलाशता ब्लॉग

Social Issues Blog

991 Posts

830 Comments

neglected senior citizenआधुनिक होते भारत की बदलती जीवन शैली एक बार तो आंखों में चमक भर देती है किंतु जब हकीकत से सामना होता है तो स्थिति काफी भयावह और संकटपूर्ण नजर आती है. परिवार और समाज में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाले बड़े-बुजुर्ग आज उपेक्षित होने लगे हैं और साथ ही उनकी स्थिति काफी दयनीय और बेसहारा की हो चली है. हालांकि आज भी भारत के अंदरूनी भागों में वृद्धों के लिए सम्मान पूर्ववत बरकरार है किंतु विकास की दौड़ में आगे निकल चुके बड़े शहरों की हालत वृद्धों के सम्मान और महत्व के मामले में काफी खराब है.


इसे आप सांस्कृतिक अधःपतन कहें या महात्वाकांक्षा की अंधी दौड़, मेट्रो शहरों की अधिकांश आबादी अपने बड़े-बुजुर्गों के सम्मान के मामले में नाकारा साबित हो रही है. कई संपन्न परिवारों के बुजुर्ग तो वृद्धाश्रम में धकेले जा रहे हैं, जो घर में ही रहना चाहते हैं उनके साथ नौकरों से भी बुरा बर्ताव होता है और इसके बावजूद उनकी शारीरिक प्रताड़ना तो एक बेहद चिंतनीय तथ्य है. उदारीकृत भारत के विकासवान नवयुवक बुजुर्गों के साथ अपनी हिंसात्मक और उपेक्षात्मक व्यवहार के लिए जाने जाने लगेंगे क्या इसे कभी सोचा भी जा सकता था?


जिन्हें कभी परिवार की संपत्ति समझा जाता था आज वही बुजुर्ग अपने परिवार पर एक बोझ बनकर रह गए हैं. जिनके आदेशों पर कभी कोई सवाल तक नहीं किया जा सकता था, आज अगर वे आदेश ना मानें तो परिवार में उनका जीना तक दूभर हो जाता है. माता-पिता जिन्होंने अपनी संतान की खुशी और जरूरतों को पूरा करने के लिए ना जाने कितनी परेशानियों का सामना किया, आज वह अपना सर्वस्व लुटा देने के बाद अकेले और बेसहारा रह गए हैं. परिवार के भीतर उनकी स्थिति इस कदर शोषित कर दी जाती है कि जीवन यापन करने के लिए उनके पास दो ही विकल्प रह जाते हैं. पहला, या तो वे अपना सारा जीवन परिवार से अलग वृद्धाश्रम में ही व्यतीत करें. दूसरे, यदि वे अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें हर पल पराश्रित होने का अहसास कराया जाता है जिसे उन्हें सहना सीखना होता है.


परिवार के भीतर व्यक्तिगत जीवन और स्वतंत्रता की तलाश को प्रमुखता दी जाने लगी है, जिसके परिणामस्वरूप जिन बच्चों का पालन-पोषण अभिभावक बड़े लाड-प्यार से करते हैं, बड़े हो जाने के बाद बच्चों को उनके साथ रहना तक पसंद नहीं आता. परिवार में माता-पिता की उपस्थिति स्वतंत्रता की राह में बाधा बन जाती है. भौतिकवाद इस कदर लोगों की मानसिकता पर हावी हो गया है कि अब अपने का बोध समाप्त होता जा रहा है. आर्थिक तौर पर सक्षम होने और आत्म-निर्भर होने की चाह लोगों में प्रबल रूप से विद्यमान होने लगी है, जिसकी पूर्ति व्यक्ति माता-पिता से अलग अपनी स्वतंत्र दुनियां बसा कर करने लगा है. एक ऐसी दुनियां जिसमें बुजुर्गों की जरूरत ना रहे.


ऐसे हालात केवल उन्हीं बुजुर्गों के नहीं हैं जो पूर्णत: अपने बच्चों पर आश्रित हैं. ऐसे वृद्धों की भी कमी नहीं है जो अपने ही बच्चों की धोखाधड़ी का शिकार बने हैं. स्वार्थ और लालच का अंधा आधुनिक मानव अवैध रूप से अपने माता-पिता की संपत्ति हथिया कर उनसे किनारा करने और उन्हें अपने हाल पर छोड़ने से भी नहीं हिचकिचाता. ऐसे भी कई बुजुर्ग हैं जिनके बच्चे काम की तलाश में देश के बाहर गए और फिर वहीं बस गए. वे अभिभावकों के लिए मासिक खर्च भेजकर ही अपने कर्तव्य को पूरा कर लेते हैं. वे यह नहीं समझते कि पैसा केवल भौतिक आवश्यकताएं पूरा कर सकता है. पैसे से भावनाओं का मोल नहीं लगाया जा सकता. घर में अकेले तन्हा जीवन जीते हुए अभिभावक या तो अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं या फिर अपने बच्चों से उम्मीद रखना ही छोड़ आस-पास की दुनियां को अपना लेते हैं जो धीरे-धीरे उनके जीने का एक सहारा बन जाता है. लेकिन कभी-कभी यही दुनियां उनके लिए घातक सिद्ध भी होती है. क्योंकि अकेले बुजुर्ग व्यक्ति आसानी से अपराधियों की नजर में आ जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप चोरी और हत्याएं जैसी घटनाएं बढ़ने लगी हैं.


यह हालत केवल परिवार के भीतर तक ही सीमित नहीं है. हम अकसर अपने आस-पास बुजुर्ग लोगों के प्रति असहनीय और अमानवीय अपराध होता देखते हैं और कभी समय की कमी को तो कभी आपसी मामला होने का बहाना बना, ऐसे कृत्यों को अनदेखा कर देते हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि भौतिकवाद और बाजारीकरण से ग्रस्त हमारी भावनाएं एक निश्चित सीमा रेखा में बंध गई हैं, जिसके अंतर्गत हम केवल अपने तक ही सीमित रह गए हैं. जब तक कोई घटना या कृत्य सीधे-सीधे हमें प्रभावित नहीं करते हम उन्हें अहमियत ही नहीं देते. हमारे पड़ोस में ही बुजुर्ग दंपत्तियों के साथ गलत व्यवहार किया जाता है और हम इस पर अपनी कोई भी प्रतिक्रिया देने से बचते फिरते हैं. मेट्रो शहर में आधुनिकता की बयार ने मनुष्य को पारस्परिक सौहार्द जैसी भावनाओं से दूरी बनाना सिखा दिया है. परिवार की जरूरत और उसके मायने अपनी स्वार्थ-पूर्ति के आगे कोई महत्व नहीं रखते.


भले ही सरकार ने बुजुर्गों की जरूरतें पूरी करने और उन्हें आश्रय देने के लिए वृद्धाश्रम खोलने के साथ-साथ उन्हें कई अधिकार भी दिए हैं. लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि संबंधों को अपनी आत्मा मानने वाले हमारे भारतीय समाज में ऐसे आश्रमों और कानूनों का क्या औचित्य है जो संबंधों के विघटन और दिनोंदिन घटते भावनात्मक क्षरण को साफ दर्शाते हों?


माता-पिता जब बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को कम नहीं होने देते, उनका पालन-पोषण प्यार और अपनेपन के साथ करते हैं तो बच्चे बड़े होने के बाद उन्हें नकारते क्यों हैं?


शहरों में बढ़ते अपराधों और नकारात्मक परिस्थितियों से बचाने के लिए ऐसा अकसर देखा जाता है कि माता-पिता अपने बच्चों के प्रति अति-सुरक्षात्मक रवैया अपनाते आए हैं. लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि ऐसा व्यवहार केवल एक उम्र तक उचित रहता है. बच्चों के बड़े हो जाने पर माता-पिता के प्रति उनकी अपेक्षाएं परिवर्तित हो जाती हैं. अब वह उनमें दोस्त को तलाशने लगते हैं, जो उनकी भावनाओं को समझें और उन्हें महत्व दें. साथ ही उनके सही निर्णयों का सम्मान करना भी अपेक्षित हो जाता है.


इसीलिए माता-पिता को चाहिए कि वह एक रूढ़िवादी सोच और व्यवहार छोड़कर अपने बच्चों को समझने का प्रयास करें. साथ ही बच्चों को भी चाहिए कि वह अपने माता-पिता की भावनाओं को अपने जीवन में महत्व दें. जो माता-पिता उनके बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, उन्हें खुद से दूर रखने के लिए कोई कदम ना उठाएं.


संभवत: परिवार के भीतर बुजुर्गों की ऐसी स्थिति और बच्चों के साथ मनमुटाव के लिए दो अलग पीढ़ियों की अलग सोच और परिस्थितियों के प्रति भिन्न दृष्टिकोण उत्तरदायी है. इस अंतर को दूर करने के बाद परिवार के बुजुर्गों और अन्य सदस्यों के बीच की खाई को समाप्त किया जा सकता है. साथ ही बच्चों को यह अहसास दिलाया जा सकता है कि जिन अभिभावाकों को वह व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए भूलते जा रहे हैं, उनके बिना कोई भी खुशी और परिवार की संरचना अधूरी ही रहेगी. इसलिए स्वार्थ भावना को त्याग कर कुछ समय के लिए अपने माता-पिता की खुशी में शामिल होकर उनके लिए अपनी भावनाओं का इजहार करने की ओर ध्यान दिया जाए तो जीवन का सही आनंद और औचित्य समझ में आ सकता है.


Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 4.20 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग