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निरर्थक हैं महिला समानता और सशक्तिकरण के सरकारी दावे

Posted On: 29 Sep, 2011 Common Man Issues में

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women empowermentमहिला सशक्तिकरण के सरकारी दावों को झुठलाती, अमेरिकी समाचार पत्रिका न्यूजवीक और महिला अधिकारों पर केन्द्रित द डेली बीस्ट की एक नई रिपोर्ट ने यह प्रमाणित कर दिया है कि हमारी सरकारें महिलाओं की दशा सुधारने और उन्हें सशक्त करने का जो दम भरती हैं, वह किस हद तक झूठे और भ्रम पैदा करने वाले होते हैं.

द बेस्ट एंड द वर्स्ट प्लेस फॉर वूमेन नाम की इस रिपोर्ट में शामिल 165 देशों में भारत को 141वां स्थान दिया गया है. हैरानी की बात तो यह यह है कि म्यांमार, बांग्लादेश, भूटान आदि जैसे अल्प-विकसित देशों को भारत की अपेक्षा महिलाओं के लिए सुरक्षित दर्शाया गया है.


इस अध्ययन में महिलाओं की स्थिति को परखने के लिए पांच मानकों पर काम किया गया – कानून, राजनीति, कामकाज में भागीदारी, शिक्षा और स्वास्थ्य. उल्लेखनीय है कि इस सर्वेक्षण में ऊपरी तौर पर नहीं बल्कि अंदरूनी हकीकत को बयां किया गया है. उदाहरण स्वरूप उनकी शैक्षिक स्थिति जांचने के लिए औपचारिक तौर पर साक्षरता दर का सहारा लेने की बजाय उसे महिलाओं को अलग-अलग आयु वर्गों और उनसे संबंधित नतीजों को आधार रखा गया है. जैसे कि वयस्क स्त्रियों की साक्षरता दर, युवतियों की साक्षरता दर, 25 वर्ष की आयु तक स्कूल न जा पाने वाली स्त्रियों का प्रतिशत, प्राथमिक शिक्षा पूरी ना कर पाने वाली महिलाएं, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए नामांकन का लिंग अनुपात आदि. वहीं आर्थिक हालातों को, महिलाएं सभी औद्योगिक क्षेत्रों में काम कर सकती हैं या नहीं,  कुल श्रमशक्ति में उनका प्रतिशत क्या है,  महिलाओं को मिलने वाला वेतन पुरुषों की तुलना में औसतन कितना प्रतिशत है और महिला नेतृत्व के क्या प्रमाण हैं, आदि के आधार पर परखा गया. इतना ही नहीं महिला स्वास्थ्य की वास्तविक हकीकत जानने के लिए तो और भी अधिक गंभीरता से अध्ययन किया गया है.


पिछले कुछ समय में महिलाओं को पारिवारिक और आर्थिक लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से कई तरह के कानून लागू किए गए हैं, जैसे घरेलू हिंसा अधिनियम, महिला एवं बाल कल्याण इत्यादि. इन अधिनियमों को कानूनी रूप देने के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि शायद अब किसी लड़की के पैदा होने पर शोक नहीं मनाया जाएगा, उसे भ्रूण में ही नहीं मार दिया जाएगा, महिलाएं दहेज हत्या या अपने पति और ससुराल वालों की ज्यादती का शिकार नहीं होंगी, महिलाओं को मनचाहे समय तक शिक्षा और आत्म-निर्भर बनने का अवसर प्रदान किया जाएगा.


domestic status of womenलेकिन वास्तविक हालातों से महिलाएं भली-भांति वाकिफ हैं. बड़े-बड़े महानगरों के ए.सी कमरों में बैठकर देश की अंतरराष्ट्रीय छवि गढ़ने वाले नीति निर्माता इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे कि केवल योजनाओं को लागू कर देना ही कर्तव्य परायणता नहीं होती. उन्हें जब तक सही तरीके से चलाया नहीं जाएगा, वह कभी भी कारगर साबित नहीं हो सकती. महिला सशक्तिकरण के दावों से इतर भारतीय महिलाएं अभी भी उसी डर और जिल्लत के साये में जी रही हैं जिसमें वो न जाने कितने वर्षों से रहती आई हैं.


तथाकथित समाज सेवी, रणनीतिकार और कल्याणकारी सरकारें सभी समय-समय पर नारी सशक्तिकरण का झुनझुना महिलाओं के हाथों में थमाकर इस बात से आश्वस्त करते रहते हैं कि भले ही उन्हें व्यावहारिक रूप से कुछ हासिल हो या ना हो लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह अब आत्म-निर्भर और बोल्ड हो चुकी हैं. इसीलिए अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का बखान करना उन्हें शोभा नहीं देता. तथाकथित परिमार्जित होती इस अंतरराष्ट्रीय छवि को बरकरार रखने के लिए जितना ज्यादा सहन किया जाए, बेहतर है.


शायद जिस ऊंचाई पर हमारे राजनेता बैठे हैं, वहां से जमीनी हकीकत देख पाना लगभग नामुमकिन हैं. वह शायद इन तथ्यों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं कि आज भी महिलाओं को मायके और ससुराल दोनों में ही बोझ से ज्यादा और कुछ नहीं समझा जाता. दहेज के लालच में महिलाओं को जिंदा जलाया जाना भी कोई कल की बात नहीं है. माना रात के अंधेरे में महिलाओं की इज्जत के साथ खिलवाड़ होना एक सामान्य घटनाक्रम है, लेकिन सभ्य और सुशिक्षित कहे जाने वाले महानगरों में भी महिलाएं दिन में भी सुरक्षित नहीं कही जा सकतीं. ऐसा परिस्थितियों को देखकर यही प्रतीत है कि महिलाएं पूरी तरह पुरुषों की इच्छाओं पर ही जीवन व्यतीत कर रही हैं. पुरुष का जब मन किया वह अपनी दरिंदगी दिखा सकता है. महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित हालातों का असल  ब्यौरा शहरों में नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों से प्राप्त किया जा सकता है, जहां महिलाओं का घर परिवार से लेकर शिक्षा जैसी आवश्यक जरूरत पर भी कोई अधिकार नहीं हैं. वहां तो अभी तक यही मानसिकता बरकरार है कि लड़की है, पढ़ लिखकर क्या करेगी. आगे चलकर तो चूल्हा चौका ही संभालना है. लेकिन हद तो तब होती है जब उसे गृहस्थी संभालने का काम सौंपा जाता है तब उसे पति और ससुराल द्वारा हर पल पराश्रित ही महसूस करवाया जाता है. उसे मारा-पीटा जाता है. कुपोषण और प्रसव के दौरान मरने वाली महिलाओं का आंकड़ा भी चिकित्सा क्षेत्र में सशक्त होने के बाद दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है. जिसका केवल एक कारण है – उपेक्षा.


भारत, जिसे हम माता कहते नहीं थकते, वहीं महिलाओं के हालात हर स्वरूप में शोचनीय हैं. उनका मानसिक और शारीरिक शोषण करना भी एक आम बात है. शैक्षिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक, कागजी स्तर पर सब परफेक्ट है. लेकिन वास्तविक सुधार का कोई साक्ष्य कम से कम वर्तमान हालातों में तो नजर नहीं आता.


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