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आप ही के बच्चे हैं फिर यह सजा जैसे शब्द क्यों?

Posted On: 4 Aug, 2012 Common Man Issues में

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‘वो नन्हें-नन्हें उनके कदम चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कुराहट फिर ‘सजा’ जैसा शब्द’!! क्या गलती में सुधार नहीं हो सकता है, फिर बच्चों की गलती ‘गुनाह’ क्यों ?



swtयाद होगा आपको वो दिन जब आज से दो साल पहले सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन ने इस बात के स्पष्ट आदेश दे दिए थे कि स्कूल परिसर के भीतर किसी छात्र को सजा नहीं दी जाएगी और शायद इस घटना को तो कोई भूल ही नहीं सकता है जब पिछले दिनों एक स्कूली छात्रा को टीचर द्वारा मुर्गा बनाने व उसकी पीठ पर ईंटें लादने पर उस बच्ची के नाक और मुंह से खून निकला. अस्पताल ले जाने पर वह बच्ची कोमा में चली गई और थोड़ी देर में उस बच्ची की मृत्यु हो गई. यह केवल एक दर्दनाक खबर ही नहीं बल्कि हम सबके लिए शर्मनाक हादसा भी था. इस घटना ने देश का ध्यान इस बात पर दिलाया कि क्या बच्चों को सजा देना गलत है? क्या दंड के लिए कोई और व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? इन्हीं महत्वपूर्ण मुद्दों का जानना और समझना शिक्षकों के साथ अध्यापकों और अभिभावकों दोनों के लिए जरूरी है.


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अपने बच्चों के लिए समझ बनाएं

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चाहे अभिभावक हों या टीचर, यह जानना और समझना बेहद जरूरी होता है कि अनुशासन रखने का मतलब सजा देना नहीं होता. यदि आप सख्त रहकर नियम कायदों पर चलना और चलाना चाहते हैं तो उसके अनेक रास्ते हैं. एक टीचर का यह फर्ज है कि वह बच्चे की मन:स्थिति को समझे.


अनुशासनहीनता बरतने पर आप सजा के तौर पर यह आदेश दे सकते हैं कि आज तुम लंच मेरे साथ करोगे या ब्रेक में चुपचाप यहीं बैठोगे, बाहर दोस्तों के साथ खेलने नहीं जाओगे. ये छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण सजाएं है. हम घर में भी तो इसी प्रकार की सजा देकर बच्चों को गलती का एहसास कराते हैं. टीचर के साथ बैठकर लंच करना किसी सजा से कम नहीं. दोस्तों के साथ खेलने को न मिले तो भी मन तो दुखेगा ही. इस तरह की सजा को टाइम आउट कहा जाता है. यह ध्यान रखें कि बच्चे को कक्षा से बाहर जाने की सजा न दें.


child 2सजा किसी बात का हल नहीं

बच्चे को सजा देते समय हम भूल जाते हैं कि सजा देकर हम नुकसान अपना ही करते हैं. जो बात सही तरीके से समझाई जा सकती थी उसका मौका हमने गंवा दिया. कम्युनिकेशन स्किल से जो बात कहनी और समझानी चाहिए थी, वह अवसर आपके हाथ से यूं ही निकल गया. एक बात और विचारणीय है वह यह कि बच्चे के मन पर कभी-कभी किसी सजा के घाव ऐसा असर डालते हैं कि समय की परतें भी उन्हें मिटा नहीं पातीं. सजा जब गहरी हो तो गलती पता ही नहीं चल पाती. उसके असर के तले बच्चा यह जान ही नहीं पाता कि कहां क्या हुआ. अच्छा होगा कि गलती का एहसास कराने के सही तरीके खोजें और उन्हीं पर अमल करें.


समझ जरूरी

हर स्थिति की कोई न कोई वजह होती है. यदि कोई बच्चा ज्यादा परेशान करता  है तो उसके पीछे भी कोई न कोई वजह होगी. समस्या की तह तक जाने के लिए हम सबको धैर्य रखना पड़ेगा. याद रखें कि सजा देकर हम बच्चे को गलती से सिर्फ रोक सकते हैं, इस संबंध में समझ विकसित नहीं कर सकते. बेहतर होगा कि उसके भीतर गलती के प्रति सही समझ पैदा करने की कोशिश करें क्योंकि आखिरकार वो आप ही के बच्चे हैं.


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