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वास्तविक विरोध या फिल्म के प्रचार का तरीका? Dispute on Saif Ali Khan in film Aarakshan

Posted On: 26 May, 2011 Common Man Issues में

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किसी भी फिल्म को कामयाब बनाने के लिए फिल्म का सही और उपयुक्त प्रचार एक अहम् भूमिका निभाता है, एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ के चलते निर्माता-निर्देशक हमेशा से ही नए-नए हथकंडे अपनाते आए हैं, जिससे की रिलीज़ होने से पहले ही वह फिल्म दर्शकों की उत्सुकता का कारण बन सके और उत्सुकता के कारण फिल्म को अधिक से अधिक दर्शक मिल सकें. फिल्म की घटना को वास्तविकता से जोड़ देना तो कभी फिल्म के कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन को जनता के बीच ला देना, फ़िल्मी प्रचार का एक हिस्सा बन गया है. कहते हैं

 

 

फिल्में समाज का आइना होती हैं. निर्देशक, सामाजिक परिस्थितियों को अपनी फिल्म के ज़रिए जनता तक पहुंचाता है. इस बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि फिल्म निर्माता और निर्देशकों की नैतिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी किस हद तक बढ़ जाती है.

 

 

 aarakshan press confrence

परन्तु हाल ही में हुई कुछ घटनाओं को देख के तो ऐसा लगता है की फिल्म उद्योग केवल पैसा कमाने का एक जरिया भर है, जिसका समाज या उसके लोगों से कोई लेना-देना नहीं है. प्रकाश झा (Prakash Jha)  की आने वाली फिल्म “आरक्षण”(aarakshan) का प्रचार ऐसे ही एक घटना का ज्वलंत उदहारण है. गौरतलब है कि इस फिल्म में आरक्षण को मुद्दा बनाया गया है, जिसमें सैफ अली खान(Saif Ali khan) एक दलित युवक की भूमिका निभा रहे हैं. खबर है कि “दलित सुरक्षा समिति” (Dalit Suraksha Samiti) नामक एक संगठन, सैफ अली खान द्वारा दलित की भूमिका करने से बेहद नाराज़ है और इसका कारण उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि है. ज्ञातव्य है कि सैफ एक मुस्लिम राज परिवार से ताल्लुक रखते है.

 

 अगर ऐसा है तो इस घटना के बाद ये तो साबित हो जाता है कि समाज चाहे कितना ही बदल जाए,कितना भी समृद्ध हो जाए, सोच कभी नहीं बदलती, और इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि कभी जाति के नाम पर तो कभी वर्ग के नाम पर भेदभाव भारतीय समाज का एक हिस्सा बन गया है. लेकिन अगर यह घटना भी फ़िल्मी प्रचार का ही एक हिस्सा है तो यह बेहद चिंतनीय वाकया है क्योंकि जिनके हाथों में समाज के सामने वास्तविकता लाने का जिम्मा है वही अगर समाज को ऐसी खोखली और मनगढ़ंत कहानियों में उलझा देते हैं तो इससे स्थिति कितनी गंभीर हो सकती है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. साथ ही आरक्षण का मुद्दा भी एक संवेदनशील मसला है, फिल्म में चाहे इसे जिस भी रूप में पेश किया जा रहा हो लेकिन ऐसे आलोचनात्मक प्रचार से तो सिर्फ समाज पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है, जो देश में एकता की भावना को कम करने का काम करेगा. इसलिए अपनी नैतिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी को समझते हुए ही फिल्म का प्रचार किया जाए तो यह सबके लिए हितकर साबित होगा.

 

 

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