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तलाक के लिए तीस साल का लंबा इंतजार – ये न्याय है या अन्याय?

Posted On: 20 Jan, 2012 Common Man Issues में

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हमारे समाज में विवाह को एक ऐसी धार्मिक और सामाजिक संस्था का दर्जा दिया जाता है जिसे स्वीकार करने के बाद महिला-पुरुष जीवन भर के लिए एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं. इतना ही नहीं जहां उन दोनों को पारस्परिक अधिकारों से नवाजा जाता है वहीं कुछ कर्तव्य भी प्रदान किए जाते हैं. इसके अलावा पति-पत्नी एक दूसरे के सुख-दुख के भी साझेदार बन जाते हैं.


divorce decreeलेकिन वैवाहिक संबंध हमेशा सुखद और व्यवस्थित रहें इसकी कोई गारंटी नहीं है. भारतीय परिवेश में आज भी परंपरागत विवाह शैली की ही प्रधानता है, जिसके अंतर्गत अभिभावक और परिवार के बड़े स्वयं अपनी सूझ-बूझ से अपनी संतान के लिए जीवनसाथी का चुनाव करते हैं. इस प्रक्रिया में विवाह योग्य युवक-युवती की भूमिका बहुत छोटी होती है. विवाह से पहले उन्हें एक-दूसरे से मिलने नहीं दिया जाता इसीलिए एक-दूसरे को समझना और गुण-अवगुणों को पहचानना मुश्किल होता है और जब उन्हें यह समझ आता है वे दोनों एक साथ नहीं रह सकते तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. उनके पास या तो ऐसे बेजान रिश्ते को ढोने या फिर तलाक लेकर अलग होने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता.


व्यवहारिक तौर पर देखा जाए तो खुद अपना शोषण कर विवाहित जीवन को सहन करने से बेहतर है तलाक लेकर अलग हो जाना. हालांकि हमारा रुढ़िवादी समाज आज भी तलाक जैसी व्यवस्था को सम्मानजनक नहीं समझता लेकिन व्यक्ति का खुशहाल और सुरक्षित जीवन किसी भी बंधन या परंपरा से ज्यादा आवश्यक है.


लेकिन जैसा कि लचरता भारत की न्याय व्यवस्था की एक प्रमुख पहचान बन गई है, इसीलिए तलाक लेने के लिए भी कभी-कभार व्यक्ति को आजीवन इंतजार करना पड़ता है और उनका जीवन एक बुरे सपने से कम नहीं रह जाता.


हाल ही में एक ऐसा ही बेहद चिंताजनक मामला सामने आया है जिसमें एक विवाहित जोड़े ने 24 घंटे भी एक साथ नहीं गुजारे और तलाक के फैसले के लिए उन्हें तीस साल का इंतजार करना पड़ा.


वर्ष 1982 में पत्नी के एक ही दिन में अपने ससुराल से भाग जाने और वापस आने से मना करने के बाद पति ने तलाक की अर्जी डाल दी. निचली अदालत में तलाक मंजूर भी हो गया लेकिन घर से भागी हुई पत्नी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी. तीस साल बाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही करार देते हुए तलाक को मंजूरी दे दी. पत्नी का घर से भागना और वापस आने से इनकार करना इस तलाक का मुख्य आधार रहा.


divorceअंग्रेजी में एक कहावत है कि जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड अर्थात अगर न्याय देने में देर की जाए तो उस न्याय का कोई अर्थ भी नहीं रहता. हालांकि इस मसले में न्याय सही व्यक्ति के साथ हुआ है लेकिन कोई व्यक्ति अपनी आयु के तीस साल केवल एक बुरे विवाह से बाहर निकलने में लगा दे तो क्या यह इसे वास्तविक न्याय कहा जाएगा.


भारतीय परिप्रेक्ष्य में हमेशा परिवार को जोड़कर रखने और संबंधों को निभाने की बात कही जाती है. लेकिन अगर यह आपसी संबंध किसी व्यक्ति की पीड़ा बन जाए तो उन्हें जल्द से जल्द समाप्त कर देना ही बेहतर है. दम तोड़ते सपनों और उम्मीदों के बीच कोई रिश्ता कायम नहीं रखा जा सकता. अगर दो व्यक्तियों को लगता है कि वह तलाक लेकर अपना जीवन सही ढंग से बिता सकते हैं तो न्यायालय को भी उनकी परेशानी और अपेक्षाओं पर विचार करना चाहिए.


हालांकि विवाह रूपी संबंध केवल संबंधित महिला और पुरुष से ही नहीं बल्कि उनके परिवारों से भी जुड़े होते हैं इसीलिए इनके टूटने के बाद पारिवारिक जनों को भावनात्मक चोट पहुंचना भी स्वाभाविक है लेकिन कई बार तलाक के अलावा कोई और रास्ता दिखाई नहीं देता. लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तलाक का निर्णय एक आखिरी विकल्प के रूप में लिया जाए. जितना हो सके ऐसे हालातों को टाला जाना ही एक परिपक्व सोच है. लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि खुद को आहत कर किसी संबंध को निभाया जाए.


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