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बस बोझ को ‘जिम्मेदारी’ का नाम दे दिया

Posted On: 21 Sep, 2013 Common Man Issues में

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वो आसमान के तारे छूना चाहती है, अपने पंख खोलकर उड़ना चाहती है, सपने सिर्फ देखना नहीं बल्कि उन्हें पूरा करना चाहती है ……लेकिन अफसोस वो बेचारी तो लड़की है. लड़की होने के बावजूद उसने यह सब सोचने की हिमाकत कर अपनी सीमा वैसे ही पार कर दी और अब वो चाहती है कि उसके ये अरमान पूरे भी किए जाएं. ऐसा वो सोच भी कैसे सकती है…..उसकी ये हिम्मत भी कैसे हुई !!!


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ये है हमारे समाज, हमारे परिवारों की असलियत. जो खुद को मॉडर्न और खुले विचारों वाला दर्शाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. पहले हमारी बेटियां सिर पर चुन्नी ओढ़कर घर से बाहर निकलती थीं, पराए मर्दों से बात तक नहीं कर सकती थीं, आज वह जींस टॉप पहनकर कॉलेज जाती हैं, पुरुषों के साथ ऑफिस में काम करती हैं, देखिए हमने अपनी मानसिकता कितनी बदल ली है, हम कितने आधुनिक हो गए हैं….!!!


परंतु शायद इस ओर कोई ध्यान नहीं देता कि उन लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाकर उन्हें घर पर बैठाने वाले भी उनके माता-पिता ही होते हैं, उनकी आत्मनिर्भरता से जलन रखने वाले भी उसी परिवार के ही लोग होते हैं. उसे स्वतंत्रता दी, उसकी इच्छाओं को पूरा किया लेकिन वो इच्छाएं क्या होंगी, स्वतंत्रता किस हद तक होगी इसका निश्चय करने वाले भी वही लोग होते हैं जिनके सामने वह मासूम सी बच्ची बड़ी होती है. घर में बेटी हो, बीवी हो या फिर बहन उस पर अधिकार जताने का एकाधिकार भी सिर्फ और सिर्फ उस घर के पुरुषों के ही पास रहता है. उसके हर सपने पर एक अजीब सा पहरा बैठाए रखता है समाज और परिवार.


हमारा समाज बड़े ही अजीबोगरीब हालातों का सामना कर रहा है. खुद को आधुनिक कहलवाने के लिए झूठमूठ का ढोंग तो करता है लेकिन जब व्यवहारिक तौर पर अपनी कथनी को अंजाम देने का वक्त आता है तो ढर्रा वही पुराना होता है जिस पर पिछले काफी समय से हम चलते आए हैं.


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समाज की यह रीति बेटी को डर व दर्द के साए में जीने को मजबूर करती रही है.  जहां लड़कियों की आजादी और सशक्तिकरण का गंभीर लेकिन छद्म नारा दिया जाता है और हकीकत इसके बिलकुल उलट पाई जाती है. सबसे बड़ी बात कि ये कथित आजादी को देता भी पुरुष समाज है और इस रूप में उसकी आजादी का सबसे बड़ा दुश्मन भी यही पुरुष समाज है. ऐसे में आखिर कब तक ये ढकोसले जारी रहेंगे, कब तक बेटियों को पुरुष रूपी भेड़िये के डर से जिंदगी के हर पल को दुःख के साये में जीना पड़ेगा……….दी गई आजादी उसकी स्वाभाविक आजादी के खिलाफ कब तक अवरोध बन कर खड़ी होती रहेगी??

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