blogid : 316 postid : 1390967

1840 से चलती आ रही ‘फर्जी सुंदरता’ की वो मानसिकता जिसने महिलाओं की शर्ट में जेब नहीं बनने दी थी!

Posted On: 27 Aug, 2019 Common Man Issues में

Pratima Jaiswal

जन-जन से जुड़ी दास्तांसमाज की विभिन्न जरुरतों व समस्यायों को उभारता और समाधान तलाशता ब्लॉग

Social Issues Blog

970 Posts

830 Comments

आज कपड़ों को लेकर महिलाओं के पास इतने विकल्प है, जिसे गिन पाना आसान बात नहीं है। ऐसे में इन कपड़ों के बीच अगर बात की जाए, ज्यादातर शर्ट या टीशर्ट की, तो उनमें जेब नहीं होती। हालांकि, कई फैशन ब्रांड्स ने महिलाओं के लिए भी शर्ट वाली ड्रेसेस बनानी शुरू कर दी है लेकिन क्या आप जानते हैं शुरुआती चरण में महिलाओं के फैशनेबल कपड़ों में जेब नहीं होती थी। इसे सीधे तौर पर पश्चिमी देशों की सुंदरता की मानसिकता से जोड़कर देखा जाता था। आइए, जानते हैं इससे जुड़ी खास बातें-

 

 

 

महिलाओं का काम होता था सिर्फ सुंदर दिखना

1840 को फैशन के लिहाज से एक क्रांतिकारी दशक समझा जाता है। उस समय फैशन डिजाइनर महिलाओं के लिए बड़े गले, पतली कमर और नीचे से घेरदार स्कर्टनुमा ड्रेस डिजाइन करने लगे थे। यह चलन धीरे-धीरे महिलाओं की ड्रेसों से जुड़े फैशन की बुनियाद बन गया। साथ ही ऐसा माना जाता था कि अगर महिलाओं के कपड़ों में जेबें बनाई जाएगी तो इससे महिलाएं अपनी जेब में कुछ न कुछ रखेंगी, जिससे उनके शरीर की बनावट कुछ उभरी-सी दिखाई देगी। आपको सुनकर हैरानी होगी कि उन दिनों महिलाओं का काम सिर्फ सुंदर लगना ही समझा जाता था।

 

 

 

जेब के लिए चलाया गया था आंदोलन

‘Give us Pocket’ (गिव अस पॉकेट) एक ऐसा अभियान, जिसमें महिलाओं ने अपने सभी कपड़ों में पॉकेट की मांग करते हुए आंदोलन चलाया था. बीते कुछ समय से कुछ यूरोपीय देशों में महिलाओं ने अपनी पोशाकों में जेब पाने के लिए ‘गिव अस पॉकेट’ अभियान ने काफी जोर पकड़ा है लेकिन फैशन जगत को ये अभियान बहुत ही हास्याप्रद लगता है।

 

 

 

मानसिकता का फायदा उठाया बाजारवाद ने

पुरूषवादी मानसिकता के चलते महिलाओं के कपड़ों में जेब तो नहीं आई लेकिन बाजार में नए तरह के फैशनेबल पर्स, पोटली, बैग जरूर आ गए। महिलाओं को लुभावने के लिए पिछले काफी सालों से महिलाओं के लिए कई तरह के पर्स मार्केट में आए हैं। हालांकि, इसे अभियान का नतीजा कहिए या आधुनिक लोगों की खुली  सोच, जींस, शर्ट के अलावा ऐसी कई कैचुअल ड्रेस बनाई जा रही हैं, जिनमें जेब होती हैं। ऐसे में सदियों पुरानी मानसिकता को देखते हुए आज कहा जा सकता है कि हम इन फर्जी धारणाओं से एक कदम आगे बढ़े हैंNext

 

 

Read More :

वो इन बदनाम गलियों में आते ही क्यों हैं?

‘देवदास’ की पारो असल जिंदगी में थी इनकी दोस्त, ऐसे लिखी गई उन बदनाम गलियों में घंटों बैठकर ये कहानी

शोएब से पहले इनकी बीवी बनने वाली थी सानिया, लेकिन हो गई ये गड़बड़

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग