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क्या हैं ग्रीन पटाखे, इन 4 तरह के पटाखों से होता है कम प्रदूषण

Posted On: 25 Oct, 2018 Common Man Issues में

Pratima Jaiswal

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दिवाली पर सिर्फ दो घंटे के लिए रात 8 से 10 बजे तक पटाखे जलाए जा सकेंगे। इसके साथ कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि त्योहारों में कम प्रदूषण वाले ‘ग्रीन पटाखे’ ही जलाए और बेचे जाने चाहिए। ऐसे में फैसले के बाद से सोशल मीडिया पर ग्रीन पटाखों को लेकर कई ‘मीम’ और ‘जोक्स’ देखने को मिल रहे हैं, लोग ग्रीन पटाखे की अलग-अलग चीजों से तुलना कर रहे हैं। अगर आप भी ग्रीन पटाखों को समझ नहीं पाए हैं, तो ये खबर आपके लिए है।

 

 

क्या है ग्रीन पटाखे
‘ग्रीन पटाखे’ राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं जो पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है। नीरी एक सरकारी संस्थान है जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंघान परिषद (सीएसआईआर) के अंदर आता है। सामान्य पटाखों की तुलना में इन्हें जलाने पर 40 से 50 फ़ीसदी तक कम हानिकारण गैस पैदा होते हैं। इनसे जो हानिकारक गैसें निकलेंगी, वो कम निकलेंगी। 40 से 50 फ़ीसदी तक कम। ऐसा भी नहीं है कि इससे प्रदूषण बिल्कुल भी नहीं होगा। पर ये कम हानिकारक पटाखे होंगे। सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फ़र गैस निकलती है, लेकिन उनके शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था। ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं। नीरी ने कुछ ऐसे फॉर्मूले बनाए हैं, जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे।

नीरी ने बनाएं हैं चार तरह के ग्रीन पटाखे

पानी पैदा करने वाले पटाखे
ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। नीरी ने इन्हें सेफ़ वाटर रिलीजर का नाम दिया है। पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है। पिछले साल दिल्ली के कई इलाकों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर पानी के छिड़काव की बात कही जा रही थी।

 

 

सल्फर और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखे
नीरी ने इन पटाखों को STAR क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ थर्माइट क्रैकर। इनमें ऑक्सीडाइजिंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फर और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए खास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है।

 

कम एल्यूमीनियम वाले पटाखे
इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फ़ीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है। इसे संस्थान ने सेफ़ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है।

 

अरोमा क्रैकर्स
इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ़ हानिकारण गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे।

 

ग्रीन पटाखें उपलब्ध नहीं
ग्रीन पटाखे फिलहाल भारत के बाज़ारों में उपलब्ध नहीं हैं। यह नीरी की खोज है और इसे बाज़ार में आने में काफी वक़्त लग सकता है। इसे बाजार में उतारने से पहले सरकार के सामने इसके गुण और दोष का प्रदर्शन करना होगा जिसके बाद इसे बाजार में उतारने की अनुमति मिलेगी…Next

 

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