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पति की जासूसी भी करती हैं भारतीय महिलाएं

Posted On: 8 Nov, 2011 Common Man Issues में

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wife keep spy on husbandअब आप इसे महिला सशक्तिकरण कहिए या फिर वैवाहिक जीवन में अपनी जड़े जमाता विश्वासघात का डर, एक नई रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली-एनसीआर की महिलाएं अपने पति पर नजर रखने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाने लगी हैं. वे विवाहित महिलाएं जिन्हें अपने पति के चाल-चलन पर जरा सा भी संदेह होने लगता है, वह प्राइवेट जासूसों की सहायता से सच को सामने लाने की पूरी-पूरी कोशिश करने लगी हैं. यह जासूस महिलाओं के बेडरूम और बैठक में छोटे-छोटे कैमरे लगा देते हैं, जिनकी लाइव कवरेज महिलाएं दुनियां के किसी भी कोने में बैठकर देख सकती हैं. महिलाएं मायके जाने का बहाना कर पति को घर में अकेले रहने का मौका देती हैं. उनका पति इस अवसर को किस प्रकार प्रयोग में लाता है महिलाएं बस इसी नतीजे का इंतजार करती रहती हैं.


महिलाओं को संदेह रहता है कि उनका पति उनकी गैर मौजूदगी में अन्य महिलाओं को घर में लाता है. अपने संदेह को दूर करने या उसे पुख्ता करने के लिए महिलाएं घर के कोने-कोने में स्पाइ-कैम लगवा देती हैं और मायके या फिर किसी दोस्त के घर में बैठकर वह अपने पति की हर हरकत पर अपनी पैनी निगाहें रखती हैं जिसकी सहायता से वह इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हो जाती हैं कि उनकी गैरहाजिरी में घर में कौन-कौन आता है.


आपने स्पाइ-कैम शायद किसी घर में लगे ना देखे हों पर टी.वी और जासूसी फिल्मों में तो इनका प्रचलन बहुत पुराना है. शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इन छोटे-छोटे कैमरों की जरूरत वैवाहिक जीवन में ताक-झांक और पति की ईमानदारी को प्रमाणित करने के लिए भी पड़ सकती है. इन कैमरों को लैपटॉप से कनेक्ट कर दिया जाता है, जिसके बाद पत्नी कहीं भी रहकर पति पर नजर रख सकती है.


हालांकि अपने साथ होती इस ज्यादती पर अधिकांश पुरुष इस डर के कारण आवाज उठाने से हिचकिचा रहे हैं कि कहीं उनके विरोध को उनके पत्नियां बेवफाई ना समझ लें. लेकिन दबी आवाज में वह कहने से नहीं चूकते कि घर की बात को घर में ही सुलझा लिया जाए तो बेहतर है. निजी मसलों को सार्वजनिक करना सही नहीं है. वहीं दूसरी ओर कुछ पुरुष ऐसे भी हैं जिनका कहना है कि साफ चरित्र और आचरण वाले विवाहित पुरुषों को इन सब चीजों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है.


स्वयं पति की जासूसी करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? इनका जवाब देते हुए महिलाओं का कहना है कि अगर विवाहित जीवन खतरे में पड़ जाए तो महिलाओं को ही पहल करनी पड़ती है. पुलिस और अन्य संस्थान कोई सहायता नहीं करते इसीलिए स्वयं अपनी सहायता का विकल्प खोज लेना चाहिए. थाने में जाने के बाद पुलिस उन्हें घर के मसले को घर में ही सुलझाने की सलाह देती है इससे बेहतर है कि उनके पास जाने की नौबत ही ना आए.


यद्यपि पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार उनके पास खुफिया पड़ताल जैसी किसी भी समस्या को नहीं लाया गया है. इसके अलावा ऐसे मामलों में भी कमी देखी गई है जिनमें महिला अपने पति की धोखाधड़ी से जुड़ी समस्या का निवारण चाहती है.


यह तथ्य साफ प्रदर्शित करते हैं कि अब महिलाएं अपने अधिकारों के विषय में जागरुक होने लगी हैं. दूसरों की देखा देखी ही सही पर अब वह अपनी समस्याओं को खुद ही सुलझाने भी लगी हैं.


एक ओर जहां ऐसी सूचनाएं महिलाओं के आत्म निर्भर बनने का प्रमाण देती हैं वहीं पुरुषों की वैवाहिक जीवन के प्रति प्रतिबद्धता और उनकी ईमानदारी की पोल भी खोलती हैं. वैसे तो पुरुषों का अपने साथी को धोखा देना कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन फिर भी हम यह मानकर चलते हैं कि वैवाहिक संबंध में बंधने के बाद पुरुष अपने आचरण को परिवर्तित कर लेंगे और दांपत्य जीवन के प्रति अपनी पूरी वफादारी निभाएंगे. लेकिन यह रिपोर्ट इस धारणा को पूरी तरह समाप्त कर विवाह के पश्चात भी महिला और पुरुष के बीच अविश्वास और धोखेबाजी को आधार प्रदान करती है.


प्राय: देखा जाता है कि विवाह के पश्चात जहां महिलाएं स्वयं को पूरी तरह वैवाहिक आचरण में ढाल लेती हैं वहीं पुरुष पहले की तरह स्वच्छंद जीवन व्यतीत करने में ही दिलचस्पी रखते हैं. पुरुषों का पहले की ही तरह दोस्तों से मिलना-जुलना, बिना बताए घर से बाहर जाना, जिम्मेदारियों में लापरवाही बरतना बदस्तूर जारी रहता है. लेकिन महिलाओं को घर की इज्जत माना जाता हैं इसीलिए उन पर विभिन्न प्रकार की बंदिशें लगा दी जाती हैं. जबकि हर बार यही प्रमाणित होता है कि इन बंधनों की सबसे ज्यादा जरूरत पुरुषों को होती है.


पुरुष प्रधान समाज होने के कारण भारतीय परिदृश्य में अगर पुरुष अपनी पत्नी के साथ बेवफाई करता है तो परिवार वाले उस बात को पूरी तरह दबाने की कोशिश करते हैं, पत्नी को सहनशीलता बरतने की सलाह दी जाती है. लेकिन अगर पति को अपनी पत्नी के चरित्र पर जरा भी शक होता है तो उसे सजा के योग्य माना जाता है. इस अपराध की सजा कितनी होगी यह पति की संवेदनहीनता और स्वभाव पर निर्भर होता है. पति या ससुराल वालों को इस संदेह को पुख्ता करना कोई जरूरी नहीं होता. वह तो बस महिला को नीचा दिखाने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते.


पुरुषों को अपने मंतव्य साधने का अवसर दिया जाता है वहीं महिलाओं को जरूरी स्वतंत्रता देना भी मुनासिब नहीं माना जाता. समाज और परिवार में व्याप्त इस भेद-भाव का पूरा फायदा पुरुषों को मिलता है. वह अपने वैवाहिक जीवन के महत्व को दरकिनार कर विवाह के बाहर भी संबंध तलाशना शुरू कर देते हैं. मौका मिलते ही वह अपनी पत्नी के साथ विश्वासघात करते हैं. हैरत की बात तो यह है कि अधिकांश पुरुष अपनी गलती स्वीकारने के बजाय पत्नी को ऐसे हालातों में जीने के लिए बाध्य भी करते हैं. पत्नियां जिन्हें अपने घर-परिवार की इज्जत सबसे ज्यादा प्रिय होती है वह सब कुछ सहन करने के लिए विवश हो जाती हैं.


लेकिन वर्तमान परिदृश्य के अनुसार यह कहा जा सकता है कि विवाहित महिलाएं भी आधुनिकता की बयार से अछूती नहीं रहीं. वह अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं के महत्व को स्वीकारने लगी हैं. कोमल स्वभाव के लिए जाने जाने वाली महिलाएं अपने अधिकारों को समझने लगी हैं. जिसके परिणामस्वरूप वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध स्वयं आवाज उठाने लगी हैं. अगर वह अपने पारिवारिक और वैवाहिक कर्तव्य पूरी तन्मयता से निभाती हैं तो वह अपने पति से भी यह आशा करती हैं कि उनका पति उनके सम्मान और स्थान को बरकार रखेगा. लेकिन अगर पति यह नहीं करता तो ऐसे में महिलाएं इसके विरुद्ध कदम उठाती हैं तो इसे किसी भी रूप में गलत नहीं कहा जा सकता.


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