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गंभीर फैसले पर जवाब एक भी नहीं !!

Posted On: 31 Jul, 2012 Common Man Issues में

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‘कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिन्हें हम केवल कहने के लिए फैसले कहते हैं पर वो हजारों सवाल खड़े कर देते हैं और साथ ही ऐसा लगता है कि उन्हें फैसले कहने से अच्छा है कि प्रश्नों की किताब कहा जाए. हाल ही में आए नाबालिग लड़कियों से संबंधित फैसले ने जैसे नाबलिग लड़कियों पर सवालों की लड़ी लगा दी हो. दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि 15 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह के बाद जब संभोग होता है तो उसे बलात्कार ही माना जाएगा.


महिला है तू बेचारी नहीं


child girlहाईकोर्ट ने कहा है कि संभोग के लिए भले ही लड़की की रजामंदी हो, तब भी इसे बलात्कार ही माना जाएगा और ऐसे मामलों में पुरुष को उसके धार्मिक अधिकारों के तहत संरक्षण हासिल नहीं है. कोर्ट का कहना है कि ’15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ संभोग आईपीसी की धारा 375 के तहत एक अपराध है. ”न्यायाधीशों ने कहा, ”ऐसे मामलों में रजामंदी का कोई औचित्य नहीं है. ऐसी उम्र में रजामंदी को मंजूर करना मुश्किल है. इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़की का विवाह हुआ है या नहीं. सम्बद्ध पक्षों के निजी कानून भी यहां मायने नहीं रखते हैं.


कोर्ट का दूसरा फैसला यह है कि ”अगर पत्नी नाबालिग है तो पति को उसकी कस्‍टडी मिल सकती है, लेकिन सेक्‍स की इजाजत नहीं. उसे शारीरिक संबंध बनाने की इजाजत पत्‍नी की उम्र 20 साल होने पर ही मिलेगी. दिल्‍ली हाईकोर्ट की तीन सदस्‍यीय बेंच ने यह व्‍यवस्‍था दी है. जजों ने यह भी कहा कि नाबालिग लड़की चाहे तो 20 साल की होने तक शादी तोड़ भी सकती है. उसे कानून इस बात का अधिकार देता है. इसीलिए पति नाबालिग पत्नी की कस्टडी तो ले सकता है, लेकिन 20 साल की उम्र तक सेक्स नहीं कर सकता.


girlsक्या केवल लड़की के बालिग होने का इंतजार है ?

बड़ा गंभीर सवाल यह है कि कोर्ट ने जितने भी फैसले लिए उनमें लड़कियों के साथ सेक्स करने की उम्र तय कर दी है. क्या ऐसा करने से नाबालिग लड़कियों के साथ होने वाले अपराध कम हो जाएंगे. शायद नहीं. पर इससे भी बड़ा सवाल यह है कि लड़कियां कौन सी उम्र में सेक्स करेंगी यह तय करने का हक किसने दिया समाज को क्योंकि किसी भी व्यक्ति को अपने लिए फैसले लेने का हक है. नाबालिग लड़की 20 साल की उम्र में सेक्स करने की समझ रखने लगेगी या सेक्स करने योग्य हो जाएगी यह फैसला तो लड़की ही लेगी. हमारे समाज में अधिकांश ऐसा होता है कि जब लड़के की शादी का सवाल आता है तो माता-पिता यह कह देते हैं कि ‘जब बेटे को लगेगा कि वो शादी योग्य हो चुका है तब कर लेगा’ पर जब सवाल लड़की का आता है तो माता-पिता कहते हैं कि ‘लगता है बेटी बड़ी हो गई है इसलिए अब शादी कर देनी चाहिए और फिर बेटी से पूछ्ने की क्या जरूरत है’. आज भी हमारे समाज ने लड़की के लिए फैसले लेने का हक स्वयं को ही दिया हुआ है.



‘‘नहीं है, हां, नहीं है जरूरत,

फैसले लेने की समाज को,

स्वयं तय करेंगे अपना रास्ता,

है समझ हम में समाज को चलाने की,

समाज है नादान जो समझता है खुदा अपने आप को,

बता दो इस समाज को जन्म लेता है हमसे,

नहीं है, हां, नहीं है जरूरत…….’’

‘सवाल असभ्य का नहीं संस्कृति का है’




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