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'राष्ट्रभाषा हिन्दी'

Posted On: 28 Apr, 2017 Others में

PriyaTarangJust another Jagranjunction Blogs weblog

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‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’



“हमारे देश की राष्ट्रभाषा है हिन्दी,

जो लगती भारत माँ पर सजी, एक चमकती बिन्दी।

इसे बोलने वालो की नही होती ज्ञानियोँ मेँ गिनती,

पर ये जनता क्योँ हिन्दी की गरिमा छीनती।

आज हम अपने समाज से करते है विनती,

न समझो हीन इसे, यह देश का गौरव है,

राष्ट्रभाषा हिन्दी।”



किसी भी समाज या देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्कृति और सभ्यता होती हैं। हमारी संस्कृति उस जड़ की तरह हैं, जिसके बिना, विकास का वो हरा भरा पेड़ कभी खड़ा हो ही नहीं सकता। भाषा किसी भी राष्ट्र व समाज का वो अभिन्न अंग है, जो उसे एक सूत्र में बांधती है। किसी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा होती है। और कोई भी भाषा अच्छी या बुरी नहीं होती। भाषा तो ग़ुरूर होता है, और उससे बोलने मे फ़क्र ही होना चाहिए। किसी एक बोली या भाषा के पीछे इतना भी पागल न हो जायें, कि अपने ही घर की भाषा अपने ही आने वाले कल को मालूम न हो ।



हमारा समाज, देश विकास की ओर बढ़ रहा है। अच्छा है, तरक्की संतोषजनक होती है। परन्तु उस तरक्की का क्या फायदा जो अपनी गरिमा ताक पर रख कर मिलें।

जी हाँ हिन्दी हमारे देश की राज्यभाषा हैं, हमारी गरिमा परन्तु क्या हमें हिन्दी के गौरव की कदर है। अभी कुछ दिन पहले ही मैंने एक समाचार पत्र के संपादकीय अंश में पढा था कि लोगो का हिन्दी के लिए अलग-अलग मत है। ‘हिन्दी को भुला कर ही विकास संभव है।’ ये एक मत था उसमें।

हममें से कितने लोग ऐसे है जो कोई हिन्दी की किताब हफ्ते छोड़िये महिने में एक बार पढते हो। मेरे अनुमान से बहुत कम प्रतिशत लोग होंगे। आज हमारे सामने यह सवाल है कि क्या हम विकास के नाम पर हिन्दी की बलि चढा सकते हैं?


अक्सर होता है की बाहर की चका चौंध में हम अपने ही आशियाने, अपनी जड़ो को भूलने लगते हैं। दुनिया को अपना बनाना है, तो अपना अभिमान, अपनी भाषा को सदा अपने साथ रखो। सम्मान से उसे बोलो। क्योंकि जब तक हम ही अपने खुद की भाषा का सम्मान नहीं करेंगे, तो दूसरों से फिर कैसी उम्मीद? जिस घर में, किसी माँ के अपने बेटे ही उसका सम्मान करना छोड़ दें, उनसे दूरी बना लें, तो फिर उस माँ को और कौन अपनाएगा? भारत हमारी माँ है और हिन्दी उसका ही एक अंश। तो क्या कोई व्यक्ति विकास के नाम पर अपनी माँ की बलि चढा सकता हैं ?


अगर जवाब है ‘नहीं ‘ तो फिर विकास के नाम पर राष्ट्रभाषा की बलि क्यो?

आज अंग्रेजी में फर्राटे से बोलने वाला कोई मिल जाए तो हमारी आँखो में उस व्यक्ति के लिए सम्मान होता है पर अगर कोई व्यक्ति हिन्दी में बात करे तो हम उसकी उतनी इज्ज़त नही करते। हम उनका तिरस्कार करते है। अगर कोई शुद्द हिन्दी बोलने वाला मिल जाए तो हाय !तौबा !

बात विकास की नही, ज्ञान की कमी की हैं। हमारे दिमाग की स्थिति की है।

“आज से हम हिन्दी का मन से ज्ञान पाएँगे

एक साथ हो आज इसको भी सम्मान दिलाएँगे,

हर भाषा समान है, भावना हो ये जब,

तभी कर पाएँगे एक सा, हर भाषा से प्रेम हम सब।”

JAI HIND

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