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धोनीनामा: बेशर्मी की हद है... इन्हें आराम चाहिए

Posted On: 14 May, 2010 Sports में

खेल संसारकौन जीता कौन हारा कौन बना सरताज, खेलों की दुनियां का लिखते सब हाल

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2005 में अंतराष्ट्रीय क्रिकेट की सरज़मी पर आगाज़ करने वाला झारखंड रांची का यह विस्फोटक विकेटकीपर बल्लेबाज़ 2007 में भारत की क्रिकेट टीम का कप्तान बन जाएगा इसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं था और कप्तान भी ऐसा जो अपनी पहली परीक्षा में भारत को विश्व कप दिला देगा इसकी तो कल्पना ही नहीं की गई थी. एक के बाद एक दस ख़िताब पर कब्ज़ा कर भारतीय टीम को टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट में पहले पायदान पर पंहुचा साबित कर दिया कि आने वाले समय में धोनी का नाम सबसे सफलतम कप्तानों में शुमार हो जाएगा.

dhoni warriorइतनी सफलता अर्जित करने के बाद लोग उनको कैप्टन कूल कहने लगे, विज्ञापन जगत के वह आखों के तारे हो गए, कभी वह मोबाइल फोन का विज्ञापन करते नज़र आते तो कभी पंखे का. फ़िल्मी सितारे छोड़ कंपनियों में होड़ लग गई कि वह उनके ब्रांड का विज्ञापन करें, अगर कहीं फैशन समारोह होता तो धोनी वहॉ रैंप वाक करते नज़र आते, समाचार चैनल के प्राईम-टाइम में तो धोनी छाए रहते थे, कुछ लोगो ने तो धोनी को सचिन से भी महान क्रिकेटर बना दिया था.

Adsपरन्तु इन सबके बावज़ूद क्रिकेट आलोचकों ने कभी धोनी को महान कप्तान की संज्ञा नहीं दी. वह धोनी को एक अच्छा कप्तान कहते थे लेकिन उससे भी ज़्यादा वह उनको किस्मत का धनी कहते थे. उनका मानना था कि धोनी से ज़्यादा उनकी किस्मत खेलती है, खेलती क्या उनका साथ देती है. धोनी द्वारा उठाया गया कदम अपने आप सही साबित हो जाता है चाहे वह 2007 टी20 विश्व कप के फाईनल में अहम मौके पर जोगिन्दर शर्मा से गेंदबाज़ी कराने का था या फिर चाहे आईडिया कप में विराट कोहली को अपने से ऊपर भेजना, धोनी ने जो भी कदम उठाये वह सही साबित हुए. सब कहने लगे धोनी एक कुशल रणनीतिकार हैं जिनके निर्णय अर्जुन के बाण की तरह अपने लक्ष्य को सदैव भेदते हैं. अगर यह कथन सही थे तो अब धोनी की रणनीतिओं को क्या हो गया है, क्यों हार रही है टीम इंडिया? कभी विजय रथ पर सवार टीम इंडिया हो हर क्षेत्र में क्यों पटखनी मिल रही है? हालत यह है कि अब साख की लड़ाई भी हार रही है भारतीय क्रिकेट टीम.
2007 में धोनी ने टीम की कमान संभाली थी तो उनके पास सचिन, द्रविड़, लक्ष्मण, सहवाग, युवराज, ज़हीर और भज्जी जैसे क्रिकेट के नायाब हीरे थे जो अपने में मैच जीताऊ खिलाड़ी हैं और आज उनकी सेना में इन महारथियों के साथ गंभीर, रैना जैसे कुशल खिलाड़ी हैं जो समय के साथ-साथ निखरते गए हैं परन्तु फिर भी हम हार रहे हैं? सौ बात की एक बात आज धोनी की किस्मत उनसे रुष्ट हो गई है? उनके निर्णय गलत साबित हो रहे हैं और ऐसा ही कुछ इस बार के टी20 विश्व कप में भी देखने को मिला जहाँ धोनी के उठाए कदम हार का कारण बने, चाहे वह वेस्टइंडीज के खिलाफ़ विनय कुमार को ना खिलाने से था या फिर ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ पहले बल्लेबाज़ी करने से था.

pepsi टीम का कप्तान होने के नाते धोनी का यह फ़र्ज़ बनता है कि वह खिलाड़ियों द्वारा की गई गलतियों को सुधारें, परन्तु धोनी इन मोर्चों में भी विफल रहे. 2009 टी20 विश्व कप में भारतीय बल्लेबाज़ शार्ट पिच गेंदों के सामने असहाय दिखे थे और ऐसा ही कुछ इस बार भी देखने को मिला यानी खिलाड़ी गलती करते जाएं और धोनी के कानो में जूं ना रेंगें. धोनी की लापरवाही का आलम इतना बढ़ गया है कि अब वह हार की ज़िम्मेदारी लेने से भी इन्कार करते हैं.

IPLहाल ही में सम्पन्न हुए आई.पी.एल तीन में धोनी की चेन्नई सुपर किंग्स ने ख़िताब जीता और ज़रूरत पड़ने पर धोनी ने भी मैच जिताए परन्तु ऐसा श्रीलंका के खिलाफ़ खेले गए टी20 के मैच में क्यों देखने को नहीं मिला, क्यों आखिरी के ओवरों में धोनी का बल्ला आग नहीं उगल पाया. अगर ऐसा हो जाता तो शायद आंकड़े हमारे साथ होते और हम सेमी-फाइनल में. बात साफ़ है अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट में आई.पी.एल की तर्ज़ पर पैसा नहीं मिलता, नहीं होती हैं मैच के बाद पार्टियां तो क्यों लड़ाएं हम अपनी जान, अरे भाई! “धोनी की भी मार्केट में एक ब्रांड वैल्यू है” आज वह 100 करोड़ से भी अधिक का ब्रांड है तो क्यों वह लाखों की लिए अपनी जान लगाए.

अगर हम टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट में बादशाहत की बात करते हैं तो यह घरेलू धरती में पायी गई बादशाहत है, विदेशी सरजमीं में तो हम अभी भी मेमने है. इंग्लैंड, श्रीलंका, बंगलादेश, दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया जो भी भारत आता है, हार के जाता है. विदेशी टीम को पहले तो भारतीय हालात में ढलने में देरी लगती है, दूसरी टीम इंडिया के साथ तो सारा देश होता है. स्टेडियम में मौज़ूद 50 हज़ार से भी ज़्यादा दर्शक अगर आपके खिलाफ़ हों तो घबराहट होती ही है. वहीं विदेशी धरती पर गए और दोनों टी20 और चैंपियंस ट्राफी में मुंह की खा कर आए.

भारत में क्रिकेट धर्म है, जहाँ खिलाड़ियों को भगवान की तरह पूजा जाता है उनसे लोगो की आशाएँ जुड़ी रहती हैं. लोग खिलाड़ियों की सफलता के लिए दुआएं करते हैं और टीम इंडिया का कप्तान होने के नाते देश को जीत दिलाना धोनी का दायित्व है परन्तु क्या धोनी अपना यह दायित्व सही तरह निभा रहे हैं? शायद मौजूदा हालत देख ऐसा लगता है धोनी अपने कर्तव्यों से दूर भाग रहे हैं. अगर ऐसा नहीं है तो क्यों शर्मनाक प्रदर्शन करने के बाद भी धोनी आराम मांग रहे हैं क्यों नहीं जा रहे हैं टीम के साथ ज़िम्बाब्वे?

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