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2 बार चोरी हो चुकी है फुटबॉल विश्व कप की ट्रॉफी, लगा है इतना सोना

Posted On: 8 Jun, 2018 Sports में

Shilpi Singh

खेल संसारकौन जीता कौन हारा कौन बना सरताज, खेलों की दुनियां का लिखते सब हाल

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फुटबॉल का विश्व कप जल्द ही शुरु होने वाला है और चमचमाती ट्रॉफी को उठाने का सपन हर खिलाड़ी औऱ टीम देखती हैं। 32टीमें आपस में भिड़ती है इस ट्रॉफी को अपना बनाने के लिए करीब 1 महीने तक, जो काफी मेहनत करने का बाद पूरा होता है। 15 जूलाई को पता चल जाएगा कि इस बार ये ट्राफी किसके हिस्से में आएगी, लेकिन इससे पहले विश्व कप की ट्रॉफी का इतिहास भी जान लेते हैं जो चोरी भी हो चुकी है और इसका लुक भी बदल चुका है। तो चलिए जानते हैं कैसा रहा है अब तक इस ट्रॉफी का सफर।

 

 

 

ट्रॉफी पहली बार लंदन से चोरी हुई थी

दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल के महाकुंभ को जीतने वाली टीम को मिलने वाली ट्रॉफी बेहद खास होती है, ये सोने से बनी होती है और अभ तक दो बार चोरी भी हो चुकी है। ये कप पहली बार 1966 में चोरी हुई थी, फुटबॉल वश्व कपके आयोजन से ठीक तीन माह पहले सेंट्रल लंदन के वेस्टमिंस्टर हॉल से चोर इस उड़ा ले गए थे। हालांकि चोरी होने के 7 दिन बाद ही ट्रॉफी एक गार्डन में अखबार में पड़ी मिली थी।

 

 

ब्राजील से चोरी हुई ट्रॉफी कभी नहीं मिली

1983 में जब ब्राजील ने तीसरे बार ये खिताब जीता तो फीफा ने उसे असली ट्रॉफी थमा दी, लेकिन इसी दौरान ट्रॉफी का सोने का ऊपरी हिस्सा गायब हो गया। लेकिन कुछ देर बाद वो हिस्सा एक दर्शक के पास से मिल गया। इस घटना के बाद नई ट्रॉफी को केवल एक हिस्से में बनाया गया। ब्राजील 1983 में इतना भाग्यशाली नहीं रहा, जब ब्राजीली फुटबॉल परिसंघ के रियो डि जिनेरियो में एक बुलेटप्रूफ कांच की अलमारी में अपने मुख्यालय पर रखी ट्रॉफी को 19 दिसंबर 1983 को कोई हथौड़े से अलमारी का पिछला हिस्सा तोड़कर चुरा ले गया। इसके बाद यह ट्रॉफी दोबारा कभी नहीं मिली।

 

 

सोने की बनी है ट्रॉफी

फीफा विश्व कप की मौजूदा ट्रॉफी का डिजाइन इटली के विख्यात शिल्पकार सिल्वियो गाजानिगा ने तैयार किया है। 18 कैरेट सोने की 14.2 इंच लंबी ट्रॉफी का कुल वजन 6.175 किग्रा है। फीफा विश्व कप ट्रॉफी को 1970 तक फीफा के पूर्व अध्यक्ष के नाम पर ‘जूल्स रिमे ट्रॉफी’ कहा जाता था, जिन्होंने 1930 में पहले विश्व कप के आयोजन में अहम भूमिका निभाई। इस ट्रॉफी को पहले विश्व कप या कोप डु मोंडे के नाम से जाना जाता था लेकिन फीफा ने रिमेट के योगदान को देखते हुए 1946 में इस ट्रॉफी को उनका नाम दिया।

 

 

इस ट्रॉफी को केवल विजेती ही छू सकते हैं

ये ट्रॉफी कितनी खास है आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इसे हर कोई नहीं छू सकता है केवल विश्व विजेता बनने वाली टीम और उसके कोच ही इसे खुले हाथो से छू सकते हैं। बाकि अगर किसी के हाथों में ये ट्रॉफी जाती है तो वो इस ग्लव्स के साथ इसे अपनी हाथों में ले सकते हैं। चार साल में होने वाले विश्व कप टूर्नामेंट के बीच में इसे ज्यूरिख बैंक की तिजोरी में संभाल कर रखा जाता है। ट्रॉफी में दो मानव आकृतियां आगे-पीछे से धरती को बाजुओं में उठाए हुए नजर आएंगी। मान्यता यह है कि वीनस ने ही इसे अपने दोनों हाथों में उठा रखा है।…Next

 

 

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