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सहमा सा शहर क्यों है?

Posted On: 15 Oct, 2018 Common Man Issues में

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srivastavarashmi

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सहमा सा शहर क्यों है“-—-

 

चल उठ पथिक ! अब डोर सम्हाल  |

नहीं वक़्त है सोने का ||

कब तक रहेगा दीर्घा में तू |

कभी उतर मैदान में आ ||

(“कैलाश-कीर्ति (रश्मि)” द्वारा रचित )

शहर जिसका जिक्र आते ही हम सभी के चक्षु पटल को चकाचौंध करती एक ऐसी दुनिया का दर्शन प्राप्त हो जाता जो परी लोक के दिव्य स्वरुप को साकार करता प्रतीत होता है, किन्तु हक़ीक़त इससे परे है| झिलमिल करती रोशनी से नहाये वर्तमान शहर आज मानव और मानवीय जीवन के मूल्यों की ऐसी धज्जियाँ उड़ा रहे हैं जो पूरे ब्रम्हांड को ही शर्मसार कर दे|

शहर जिनकी परिकल्पना ग्रामों से ऊपर उठ कर इस लिए की गयी ताकि मानवीय जीवन की ग्राम रूपी आत्मा को विकास की नैय्या में बिठाकर गगन छू लेने की आकांक्षा की प्रतिपूर्ति की जा सके, पर क्या पता था कि जिस विकास के जरिये मानवीय अंश अपनी खुशहाली कि नयी इबारत लिखना चाहता था वही आज उसकी मायूसी का कारण बन गया है| आज जब भी हम गावों से निकलकर शहरों की तरफ आते हैं तो इन शहरों की आकर्षित करने वाली भूल-भुलैय्या में खो से जाते हैं परन्तु वर्तमान में जिस तरह की तस्वीर शहरों ने प्रस्तुत की है वो मानवता के उस वीभत्स स्वरुप को प्रदर्शित कर रहा है जो इस सृष्टि  के सर्जक को भी रोने के लिए मजबूर कर दे|

शहरों में आज की जिंदगी इस बात का पर्याय बन चुकी है कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को परे रख लोग अपना हित साधने में लगे हैं और तो और आये दिन शहरों में हो रहे अपराध अनगिनत मानवीय जिंदगियों को दावं पर लगाकर अपनी चमक को कायम रखने का वास्ता दे रहे हैं| हाल ही में मुंबई शहर से आयी इस घटना सूचना ने मेरे अंतर्मन को एकदम से झकझोर दिया| जब एक प्राइवेट संस्था में कार्यरत कर्मचारी को सिर्फ कुछ पैसों के लिए मौत के घाट उतार दिया गया और उसके परिवार को ताउम्र न भूलाने वाला एक जख्म दिया गया जिसकी आहट से हर शहरी नागरिक हतप्रभ है| क्यूँ आखिर हम शहरों में सुरक्षित रहने के लिए ही जंग लड़ रहे हैं? क्या होगा इन भौतिक मूल्यों वाली इन सुख सुविधाओं का जब इन्हे भोगने के लिए हम ही न होंगे| क्यों हर दिन इन शहरों में बढ़ते अपराध क्रम दिन और रात के संतुलन को भी धराशायी करने में सफल हो रहे हैं|

क्या हुआ उस भाई चारे का जो शहरों में आकर कहीं खो सा गया है| क्यों हमारे गावं से निकली प्रेमालाप के गंगा शहरों के वहशीपन का शिकार हो रही है|

बस बहुत हो चूका ! अब हम सभी को अपनी-अपनी इस निर्णायक भूमिका को स्वीकारना ही होगा क्योंकि कब तक हम सभी घुट-घुटकर और सहम-सहमकर ईश्वर द्वारा प्रदत्त मानवीय जीवन कि इस अमूल्य निधि के साथ दुर्भाव करते रहेंगे|

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