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शायद मैं फिर बहक रही हूं…..(पार्ट-2) – Hindi Story

Posted On: 7 Oct, 2012 Others में

कहानियांकहानियां जन-जन की यादों और जिंदगी की तस्वीरों को तरोताजा करती हैं. इंसान को रूमानी दुनियां में ले जाने वाली कहानियों का स्वागत है इस ब्लॉग मंच पर

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इस कहानी का पहला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें

…एक-एक कर तुम्हारे बच्चों के सपने पूरे हो रहे थे। दिव्या को कैंपस इंटरव्यू में एक बडी कंपनी ने अपने यहां रिक्रूट कर लिया और वह वापस दिल्ली आ गई। तुम्हें हैरानी होगी सुधीर, मुझे साल भर में जितनी पगार मिलती थी, उतनी तो दिव्या को एक महीने में मिलती है। पिछले कुछ सालों में समय कितना बदल गया है! अब हमारे जमाने की तरह बच्चे सरकारी नौकरियों के पीछे नहीं भागते। वे सुरक्षा से अधिक जोखिम उठना पसंद करते हैं। शायद मैं फिर बहक रही हूं..।


क्या करूं, कितने अरसे बाद तो तुमसे बात करने के लिए कागज-कलम उठाया है। इस कलम से मैं उन सारे वर्षो के बारे में लिखना चाहती हूं जो तुम्हारे बिना बिताए हैं। दिव्या के बारे में..हां, उसी के बारे में तो तुम्हें बता रही थी..। विभा दीदी उसके लिए रिश्ता लेकर आई तो दिव्या ने साफ मना कर दिया। बुआ मैं हमेशा मां के पास रहूंगी और मां नौकरी छोड देंगी। दीदी ने उसे बहुत समझाया। मैंने फिर से उसे कसम दिलाई। क्या करती, मेरे पास कोई रास्ता ही नहीं बचा था। इस बात को भी अब बारह साल हो गए हैं। दिव्या के पति संजय समझदार हैं। मगर दिव्या को पता नहीं क्या हो गया है! विकट परिस्थितियों में उसने मुझे संभाला, अब पता नहीं क्यों बचपना कर रही है! उसने मुझे उलझा दिया है..।


हां, अंश के बारे में तो तुम्हें बताना ही भूल गई हूं। हमेशा चुप रहने वाला अंश जब एम.बी.बी.एस. करके लौटा तो उसके साथ निधि थी। कौन निधि..? तुम्हारे मन में जरूर यही सवाल होगा न! मम्मा ये निधि है, मेरे साथ पढती है..। जानती थी, कम बोलने वाला अंश इसके आगे कुछ नहीं बोलेगा, लेकिन मैं समझ गई। सुधीर, ईश्वर ने हर इंसान को स्नेह के न जाने कितने बंधनों में बांधा है, लेकिन मां व बच्चे का रिश्ता हर परिधि व हर परिभाषा से परे है। मां को ईश्वर ने अनुपम शक्ति दी है, जो बिना एक शब्द बोले बच्चे के दिल की बात जान लेती है। निधि व अंश शादी के बंधन में बंध गए।


आज राहुल.. यानी तुम्हारा पोता तीन साल का हो गया है। निधि, अंश और राहुल घूमने गए हैं। मैं नहीं गई, क्योंकि तुमसे बातें जो करनी थीं।


…सुधीर, मैं तुमसे कुछ बांटना चाहती हूं। जब तक राहुल का जन्म नहीं हुआ था, सब ठीक था। दिव्या बार-बार मुझे नौकरी छोडने को कहती रही, लेकिन मैंने टाल दिया। पूरे दिन घर बैठकर करती भी क्या। रिटायरमेंट के बाद तो घर में ही रहना था। राहुल के जन्म के बाद निधि की परेशानी देखकर मैंने रिजाइन कर दिया। उस नन्हे बच्चे को बाई के भरोसे छोडकर मैं काम नहीं कर सकती थी। मैं राहुल की परवरिश में व्यस्त हो गई। यहां तक कि मैंने वर्षो के नियमों को भी बिसरा दिया। घर के मंदिर में दीपक दोपहर में जला पाती हूं। सुबह समय ही नहीं मिलता। पहले कभी तुम्हें छुट्टी वाले दिन दोपहर को पूजा करते देखती थी तो गुस्सा आता था कि मंदिर के कपाट तो दोपहर बारह बजे बंद हो जाते हैं और तुम..। तुम हंसकर कहते, नंदा, भगवान मुझसे नाराज नहीं हो सकते। तुम उनकी बेटी हो, इस नाते मैं उनका दामाद हूं। हमारे देश में दामाद से भला कोई नाराज हो सकता है! तुम्हारी बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं होता।


..लेकिन सुधीर, अब सब बदल चुका है। दिव्या की बेटी नंदिनी हुई तो मैं उसकी देखभाल के लिए उसके पास गई थी। अब राहुल को छोडकर कैसे जाऊं? एक तरफ दिव्या है, दूसरी ओर अंश। दिव्या चाहती थी कि मैं नौकरी छोड दूं, लेकिन अब जब मैंने नौकरी छोडी तो वह नाराज हो गई। बोली, मम्मा जब मैं आपको सर्विस छोडने को कहती थी तो आपने न जाने कितने बहाने बनाए। अब आपने पोते की वजह से रिजाइन किया है। मुझे कितना परायापन लगा है, जानती हो? मेरी बेटी हुई तो आपने कुछ महीने की छुट्टी ली, लेकिन जब राहुल हुआ तो..। हम पति-पत्नी भी तो नौकरी करते हैं। जैसे हम दोनों ने मैनेज किया, वैसे अंश व निधि भी कर सकते हैं।

सुधीर, मैं समझ नहीं पा रही हूं कि अचानक दिव्या को हुआ क्या? अब तो दिव्या ने जिद ही ठान ली है कि मैं उसके पास जाकर रहूं। तुम ही कहो, मैं अपने दो हिस्से कैसे करूं! दिव्या के घर जाती हूं तो अंश खामोश हो जाता है। उसका न बोलना मुझे पीडा देता है। निधि शिकायत तो नहीं करती, लेकिन उसका यह कहना ही बहुत है, मम्मी आपको राहुल को संभालने में दिक्कत आती है तो मैं हॉस्पिटल जाना छोड देती हूं।

दिव्या की नाराजगी और अंश की खामोशी मुझे रुला देती है। मैं खुद को अपराधी महसूस करती हूं। समय-समय पर विभा दीदी भी कम ताने नहीं देतीं, नंदा तुम्हारे बच्चे अब अपनी गृहस्थी संभाल रहे हैं, तुम घर से बाहर तो निकला करो..।

सुधीर, सच कहूं तो थकने लगी हूं। सब अपनी-अपनी जगह ठीक हैं। मगर दोनों मुझे बांटना चाहते हैं। रिश्तों की उलझी डोरों को मैं कैसे सुलझाऊं? सोचती हूं, कहीं चली जाऊं, लेकिन यह ठीक नहीं होगा। खुद से ही सवाल-जबाव करते-करते थक चुकी हूं। तुम्हीं बताओ कि क्या करूं..।

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