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युवाओं की राजनीति

SUDARSHAN KUMAR OPINION
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‘राजनीति’ एक ऐसी शब्द है जिससे हर कोई प्रभावित होता है। शुरुआती दौर में देखें तो हम पाएंगे कि राजनीति में युवाओं की सक्रिय भूमिका रही है।पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर जी को ‘युवा तुर्क’ भी बोला जाता था। स्वर्गीय करुणानिधि ने 14 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखा। हालांकि उनकी राजनीति हिंदी विरोधी थी इसलिए उत्तर भारत में वो नहीं छा पाये। उत्तर भारत के सबसे चर्चित नेता माननीय लालू प्रसाद यादव ने भी 22 वर्ष की उम्र में राजनीति में कदम रखा। जयप्रकाश नारायण(जेपी) वाली छात्र आंदोलन  में लालू जी ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। लालू जी अपने समय के सबसे युवा सांसद में से एक थे। नीतीश कुमार शरद यादव कई अन्य भी युवा अवस्था में ही राजनीति में आ गए थे। कहां जा सकता है कि उस वक्त युवा राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते थे।

दौर बदला, मानसिकता बदली। युवाओं का मोहभंग होना शुरू हो गया। ‘राजनीति’ एक ऐसी शब्द बन गई जिससे युवा नफरत करने लगा। युवाओं में यह गर्व का विषय बनने लगा कि वह राजनीति से दूर रहते हैं। ” मुझे राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। कोई बने हमें क्या फर्क पड़ता है।” इस तरह के वाक्य प्राया सुनने को मिलने लगा। जो थोड़े नेता आए भी वह विशिष्ट परिवार और जात से नाता रखते थे। सामान्य युवा इससे दूर होता गया। मैं जब विद्यालय में था, उस वक्त भी बहुत कम दोस्त राजनीति पर चर्चा करते थे। न्यूज़पेपर में बस दो पेज- एक मुख्य पृष्ठ और दूसरा खेल जगत, यही पढ़ने का शौक था सभी को। उस वक्त नेता में किसी को कैरियर नहीं दिखता था। उस वक्त कैरियर मतलब इंजीनियर, डॉक्टर, चार्टर्ड अकाउंटेंट, बैंक मैनेजर यह सब हुआ करता था। कोई यह सोच भी नहीं पता था कि नेता भी एक कैरियर हो सकता है।

समय ने एक बार फिर करवट बदली, नए तरह की राजनीति की शुरुआत करने की पटकथा लिखी जाने लगी। सत्ता के भ्रष्टाचार, गलत नीति ,बेरोजगारी और धर्म को मिलाकर एक ऐसी हवा बनाई गई जिसमें युवाओं को यह महसूस होने लगा कि अगर हम अभी नहीं जगे तो देश बर्बाद हो जाएगा। हवा का असर बच्चों से लेकर बड़ों तक हुआ। 2014 के चुनाव में जिस मतदान केंद्र पर मैं था वहां पर एक बूढ़ी औरत के साथ 8 10 साल का लड़का आया। आते ही अति उत्साह में उस बच्चे ने बोला ‘अबकी बार मोदी सरकार'( हालांकि यह नियम के विरुद्ध था पर मानवीय दृष्टिकोण को देखते हुए उस बच्चे को कुछ भी नहीं किया गया, बस उसे शांत रहने को इशारा किया गया)। तो यह छोटी सी घटना यह बताने के लिए काफी है कि की 2014 के आसपास राजनीति में एक व्यापक असर दिखाना शुरू कर दिया था। युवाओं में एक नया जोश आ गया। देश का सोया युवा जाग गया। चाय की दुकान हो या Facebook का वाल हो, WhatsApp का फॉरवर्ड हो या न्यूज़ से भरी अखबार हो हर जगह राजनीति की शुरुआत हो गई। इसके लिए मैं माननीय मोदी जी को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने देश के सोए हुए युवाओं को जगा दिया और जगाने के बाद क्या-क्या हो रहा है यह हम सभी अच्छे से जानते हैं।

अब वह दौर आ गया जहां नेता बनना एक कैरियर हो गया। हर बेरोजगार युवा स्वयं को नेता के रूप में देखने लगा। हलाकि युवाओं में जो बीमारी थी वह छूटी नहीं। युवाओं की सबसे बड़ी बीमारी यह थी और है कि वह इंतजार करना नहीं चाहते वह जन्मजात चिता की तरह दौड़ना चाहते हैं। युवा चाहते हैं कि वह रातों रात स्टार बन जाए, रातों-रात विधायक बन जाए या देश के बहुत बड़े हिस्से पर उनका नाम जाना जाए। जब युवाओं ने नेता को कैरियर के रूप में देखा तो उन्होंने ने इसके बनने की विधि पर भी अमल किया। सबसे आसान विधि जो काफी ट्रेंड में है आजकल, वह धर्म आधारित राजनीति करना। इसमें आपको कुछ करनी नहीं होती है बस दो चार बार Facebook पर या विभिन्न सोशल साइट्स पर आपको लिखना रहता है काट दूंगा मार दूंगा, जो मेरा नहीं हुआ वह फलना का कहां से होगा,.. हित का हनन हुआ तो खून बहेगा सड़कों पर। इसके लिए आपको बस किसी वाहिनी, दल, सेना, मोर्चा में शामिल हो जाना है और उनके नारों को चिल्लाते रहना है। लिए भेड़ चाल युवाओं ने इस पैटर्न का बखूबी इस्तेमाल किया। इस को एक नए आयाम तक पहुंचाया, मॉब लिंचिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। युवाओं को लगने लगा कि वह भी योगी बाबा ही बन जाएंगे। क्योंकि युवाओं में भेड़ चाल पनप चुका था इसलिए यहां भी सीट फुल होने लगी। अब जो कुछ युवा बच गए थे वह बड़े चिंतित होने लगे वह तो भला हो कन्हैया भैया के जिन्होंने JNU से बताया कि राजनीति दूसरी तरह से भी की जा सकती है। फिर युवाओं ने भेड़चाल पकड़ा लाल सलाम लाल सलाम, साम्यवाद, समाजवाद, दलितों की हक की लड़ाई जैसे शब्दों से Facebook को रंगीन कर दिया। हालांकि कन्हैया भैया के इस टेक्निक को भी बहुत कम लोगों ने अपनाया क्योंकि इसमें खतरा बहुत ज्यादा है। एक तो आपको बहस करनी हो जाती है और दूसरी बात कि आप सत्ता के खिलाफ हो जाते हैं। पर पहले वाले टेक्निक के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है उन्हें ना बहस करने की जरूरत है ना उन्हें सत्ता का डर है। किसी भी तरह के बहस के लिए उनका नारा बुलंद रहता है और कभी-कभी तो केंद्रीय मंत्रियों के द्वारा माला भी पहनाई जाती है।

बीमारी तो पहले से है,मेहनत तो करनी नहीं है। जब मेहनत नहीं करनी है तो पढ़ाई कहां से करनी है। बिना पढ़े बहस तो कर नहीं सकते या कुछ नया सोच नहीं सकते। भेड़ चाल चलना है। तो अपना यह पुराना पैटर्न, ऊपर जो बताया गया ,उसको अपनाते हैं और राजनीति करते हैं। युवा नेता के लिए फेसबुक के लाइक और कमेंट उनके वोट की तरह होते हैं। जिसको जितना लाइक और कमेंट वह अपने आप को उतना बड़ा नेता मानता है।

और अंत में यह कहा जा सकता है कि अधिकतर बेरोजगार युवा ‘युवा नेता’ बनने को इक्छुक हैं।

प्रत्येक ‘युवा नेता’ को मेरी ओर से उनके सफल कैरियर की बधाई हो।

~सुदर्शन कुमार

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