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महामना का आदर्श और बीएचयू के 100 वर्ष!

Posted On: 4 Jul, 2016 Others में

आहत हृदयविचार व संप्रेषण

सुधीर कुमार

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प्राचीन काल से ही हमारा भारत शिक्षा के मामले में गढ़ रहा है।वैदिक काल से लेकर,वर्तमान युग तक,भारतीय शिक्षा कई पायदानों से होकर गुजरी है।लगभग दो सौ वर्षों के अंग्रजी राज में,भारतीय शिक्षा को गहरा आघात पहुंचा।परंपरागत शिक्षा प्रणाली को धाराशायी कर,अंग्रेजों ने स्वहित देखते हुए यहां,अंग्रेजी-उन्मुख शिक्षा व्यवस्था लागू की।1857 में भारत में पहली बार कलकत्ता,बंबई तथा मद्रास में आधुनिक प्रकार के विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थी।लेकिन,इन विश्वविद्यालयों में भारतीयता कम,जबकि अंग्रेजियत ज्यादा झलक रही थी।चरित्र निर्माण और बच्चों में सभ्यता का विकास यहां प्राथमिकता नहीं थी।दूसरी तरफ,आमजन की पहुंच से ये शिक्षण संस्थान कोसों दूर थे।हालांकि,धनाढ्य परिवारों के बच्चे ब्रिटेन जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण जरुर कर रहे थे,लेकिन एक बड़ी आबादी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित थी।इन सब परिस्थितियों से महामना पंडित मदन मोहन मालवीय खासा चिंतित थे।वे,एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे,जहां भारतीयता का पाठ पढ़ाया जाय,साथ ही साथ युवाओं को देश-समाज और संस्कृति से जोड़कर उनमें राष्ट्रवाद के गुणों का विकास किया जाए।
मालवीय जी की सोच अच्छी थी,लेकिन शक्ति और संसाधन नहीं थे।अटल इरादों के धनी मालवीय जी ने परिस्थिति के झुकना स्वीकार नहीं किया।फलस्वरूप,विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु,महामना जी ने देश के अनेक राजाओं-महाराजाओं तथा देश की जनता से आर्थिक सहयोग देने की अपील की।काशी,दरभंगा,ग्वालियर,इंदौर आदि के नरेशों के अतिरिक्त लगभग पांच हजार व्यक्तियों ने इसके निर्माण हेतु धनराशि दान दी।फरवरी 1916 को बनारस के नगवां नामक स्थान पर,इस विवि का शिलान्यास भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड हार्डिंग ने किया।एक विश्वविद्यालय के तौर पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में अवस्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(बीएचयू) ने 2016 में अपनी स्थापना के गौरवपूर्ण सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं।हालांकि,यह सफर चुनौतियों से भरा रहा।सौ वर्ष की आयु पार करना किसी भी दृष्टि से अत्युत्तम होता है।लिहाजा पूरा बीएचयू परिवार अभी शताब्दी वर्ष के जश्न में डूबा हुआ है।भारतीय पुनर्जागरण,इसकी परंपरा और संस्कृति का मूर्तमान स्वरुप बीएचयू मालवीय जी की तपः स्थली या कहिए उनकी साधना का फल है।देश के अन्य विश्वविद्यालयों में जहां कॅरियर निर्माण पर जोर होता है, वहीं इस विश्वविद्यालय में कॅरियर के साथ-साथ चरित्र और राष्ट्र निर्माण भी किया जाता है।यहां विद्यार्थियों में पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार और मानवीय मूल्य भी विकसित किए जाते हैं।यह विश्वविद्यालय प्राचीन व आधुनिक भारतीय शिक्षा पद्धति का अनूठा संगम है।शिक्षा के व्यावसायीकरण के कारण देश में प्रचलित आधुनिक विषयों की शिक्षा के साथ,लुप्त तथा महत्वहीन हो रही ज्योतिष,योग,धर्मशास्त्र और आयुर्वेद जैसी विधाओं की शिक्षाएँ यहां प्रमुखता से दी जाती हैं।आज इसे एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय की ख्याति प्राप्त है।1360 एकड़ के विशाल और हरे-भरे तथा स्वच्छ परिसर में स्थापित काशी हिंदू विवि के अलावा 2740 एकड़ में दक्षिणी परिसर,शहर में स्थित 28 एकड़ में विद्यालय संकुल और शिक्षा संकाय हैं।सर्वविद्या की इस राजधानी में लगभग 32000 छात्र अध्ययनरत हैं,जबकि शोध करने वाले छात्रों की संख्या चार हजार है।यहां सिर्फ भारत ही नहीं,बल्कि विश्व के करीब 58 देशों के सैकड़ों छात्र विद्याध्ययन कर रहे हैं।विश्वविद्यालय की शुरुआत एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रुप में की गई और देश-दुनिया से चुन-चुन कर विद्वानों को आमंत्रित किया गया।महामना मालवीय भी यहां के कुलपति रहे थे।विश्वविद्यालय ने अपनी सौ वर्षों की यात्रा में देश को ऐसे-ऐसे रत्न दिए,जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में उच्चतम सफलता हासिल करते हुए देश का गौरव बढ़ाया है।यहां शिक्षा प्राप्त पूर्व छात्रों ने अपने उत्कृष्ट कार्यों के लिए देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान सहित सर्वोच्च पदों पर आसीन होने का गौरव प्राप्त किया है।बीएचयू से जुड़े 7 लोगों को अबतक भारत रत्न,जबकि 20 से अधिक व्यक्तियों को पद्म सम्मान से विभूषित किया जा चुका है।दादा साहेब फाल्के सम्मान पाने वाले भूपेन हजारिका तथा ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गये काशीनाथ सिंह भी बीएचयू से जुड़े रहे थे।ऐसी उपलब्धि अपने आप में गौरव की बात है।बीएचयू ने शिक्षा के स्तर को अंतर्राष्ट्रीय मानक देते हुए विदेश के विश्वविद्यालयों से अब तक 54 समझौते किए हैं।
संभवतः यह एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है,जहां सभी विषयों में कैम्पस प्लेसमेंट की सुविधा है।राष्ट्र की सेवा के साथ नवयुवकों के चरित्र-निर्माण के लिए तथा भारतीय संस्कृति की जीवंतता को बनाए रखने के लिए उक्त विश्वविद्यालय की परिकल्पना को साकार किया था,महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने।इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने भिक्षा तक मांगना पसंद किया था।महामना का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ।संसाधनविहीनता तथा अंग्रेजी राज के प्रभाव के बावजूद वकालत,पत्रकारिता,शिक्षा,समाज सुधार और देश सेवा से जुड़ कर उन्होंने अपने जन्म को सार्थकता प्रदान की है।वे,1909,1918,1932 तथा 1933 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे।बतौर वकील उन्होंने चौरी-चौरा कांड में दोषी प्राप्त 170 लोगों में 151 लोगों को छुड़ा लिया था।भारत सरकार ने महामना के कृतित्व एवं व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर भारत रत्न(मरणोपरांत) से सुशोभित भी किया।
आज,काशी हिन्दू विश्वविद्यालय(बीएचयू) अपनी स्थापना के गौरवपूर्ण सौ वर्ष पूरे कर लिये हैं।आशा है,आगे भी यह विवि शिक्षा के क्षेत्र में देश का प्रतिनिधित्व करता रहेगा।कुछ अराजक तत्व जब देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में माहौल को खराब कर देश की एकता और अखंडता को तोड़ने को आमदा नजर आ रहे हैं,तब ऐसे वक्त में बीएचयू शांत भाव से देश की परंपरा को बरकरार रखने के लिए प्रतिबद्ध है।शताब्दी वर्ष समारोह में शिरकत करने आए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि 100 साल के समय में पंडित मालवीय की इस तपोस्थली ने बहुत कुछ हासिल किया।सबको इस संपदा को बरकरार रखते हुए आगे बढ़ाने के विषय में भी सोचना चाहिए।इसके लिए शोध को बढ़ावा देने की बात दुहराते हुए उन्होंने कहा कि हमें यह भी सोचने की जरूरत है कि आजादी के बाद देश की किसी भी यूनिवर्सिटी या कॉलेज में पढ़ा कोई छात्र नोबेल पुरस्कार नहीं हासिल कर सका है।इस अनुपलब्धि पर विचार करने के साथ-साथ सरकार को शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अधिक निवेश करना चाहिए।तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यहां पढ़ने के लिए दुनिया के कई देशों से युवा आते थे,आज ऐसा क्यों नहीं है? इस बारे में शिक्षा जगत से जुड़े सभी लोगों को गंभीरता से सोचना होगा तब ही भारत महाशक्ति बनेगा।वहीं,प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यहां से पढ़े लोग कभी सीना तानकर कहते थे कि वह बीएचयू का स्टूडेंट है।यहां से पढ़े लोग जहां गए,अपने काम से झंडा गाड़ दिया।एक संस्था की ताकत क्या होती है?यह बीएचयू ने दिखाया है।यह बहुत बड़ी बात है।लेकिन कभी-कभी सवाल उठता है कि क्या भारत के सवा सौ करोड़ लोगों के मन में भी बीएचयू के प्रति वही श्रद्धा भाव है।आखिर वो कौन सी बाधा है?इस श्रद्धा भाव में कहीं न कहीं संकोच है।
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री महोदय के उद्बोधन से स्पष्ट है कि सौ वर्ष में प्राप्त उपलब्धियों को संजोकर रखना एक बड़ी चुनौती है।यह जिम्मेदारी हम सबों की है कि हम बीएचयू के गौरव को बरकरार रखने हेतु तत्पर रहें।किसी विश्वविद्यालय की पहचान उसके छात्रों से है।छात्रों की सफलता पर ही विश्वविद्यालय की साख बढ़ेगी,यह बात छात्रों को गांठ में बांधकर रखनी होगी।

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▪सुधीर कुमार
(छात्र-बीए,बीएचयू,वाराणसी)

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