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मौलिक अधिकार बने ''काम का हक''

Posted On: 8 Apr, 2016 Others में

आहत हृदयविचार व संप्रेषण

सुधीर कुमार

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विश्व की सबसे अधिक आबादी वाले देश चीन में काम के अधिकार को ‘मौलिक अधिकार’ का दर्जा दिया गया है।निश्चय ही यह कदम बढ़ती जनसंख्या के सफल प्रबंधन की दृष्टि से सराहनीय एवं अनुकरणीय है।जबकि,बढ़ती जनसंख्या के कारण नित नयी उपलब्धियां कायम कर रहे भारत देश में मजदूरों को वर्ष में 100 दिन रोजगार उपलब्ध कराने में सरकारी मशीनरी को पसीने छूटने लगते हैं।जिस देश की एक बड़ी आबादी कार्य की खोज में अंतः राज्यीय,अंतर्राज्यीय व अंतर्राष्ट्रीय पलायन को मजबूर हों,वहां विकास के सारे दावे डींग प्रतीत होते हैं।निश्चय ही,भारत सरकार द्वारा आजादी के बाद से ही देश में कामगारों को काम उपलब्ध कराने हेतु दर्जनों कार्यक्रमों को राष्ट्रीय पटल पर उतारा गया।मसलन,काम के बदले अनाज,प्रधानमंत्री संपूर्ण रोजगार योजना,मनरेगा जैसी योजनाओं को बड़े जोर-शोर से शुरु तो किया गया।लेकिन,कुछ ही समय में यह देखा गया कि ये योजनाएं जनकल्याणकारी कम,जबकि भ्रष्टाचार का पुलिंदा अधिक साबित हुईं।योजनाओं में व्याप्त अनियमितता व धांधली की वजह से कई योजनाएं दम तोड़ने को मजबूर हो गयीं और जो मौजूदा समय में चर्चित हैं,वह भ्रष्टाचार के आतंक से बच नहीं सका है।किसी भी योजना/कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार द्वारा प्रचारित कोई योजना बेरोजगारों को लुभाने में सक्षम है या नहीं और दूसरा कि लोग जागरुक हैं या नहीं?जबतक इन दोनों शर्तों की पूर्ति नहीं की जाती है,तब तक सकारात्मक परिणाम की उम्मीद बेमानी होगी।आजादी के छह दशक बाद भी चमक-दमक वाले भारत के भीतर एक ऐसा देश बसता है,जहां जागरुकता के अभाव में लोग गरीबी,बेरोजगारी का दंश झेलकर अपने प्राणों को त्यागने को मजबूर हैं।गौर करें तो हम पाएंगे कि सरकारी कामों को करने की तरफ झुकाव का कम होना निम्न मजदूरी दर,बेरोजगारी भत्ता न दिया जाना,रोजगार की मौसमी प्रवृत्ति तथा योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार आदि कारणों से होता है।एक तरफ,मजदूरों को काम उपलब्ध करवाने के नाम पर प्रतिवर्ष केंद्र और राज्य स्तर पर करोड़ों रुपये की फंडिंग होती है,तो दूसरी तरफ कुपोषण,गरीबी एवं बेरोजगारी से होने वाली मौतें एवं पलायन की गर्त में समाते राज्य,सरकार की कार्यशैली पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने को काफी है।मेरा मानना है कि चीन की ही भांति हमारे देश में भी काम का अधिकार मौलिक अधिकार होता,तो प्रतिवर्ष भूखों मरने वालों एवं गरीबी एवं बेरोजगारी में जीवन बसर करने वाले लोगों की संख्या में निश्चय रुप से कमी आती,साथ ही कामगारों का स्वास्थ्य बीमा कराया जाता है,तो नहले पे दहला सरीखी बात होगी।लोकतंत्र के पवित्र मंदिर अर्थात् संसद में इस पवित्र विषय पर सकारात्मक बहस और फिर पहल हो तो देश की दशा जरुर बदलेगी।

सुधीर कुमार

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