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अपनी “मातृभाषा” की हिफ़ाजत लाज़मी है दोस्‍तो, कौन कहता है अंग्रेजी कि जरुरत है दोस्तों... ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता contest -2

Posted On: 28 Sep, 2013 Others में

sach ka aainaअपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

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अपनी मातृभाषाकी हिफ़ाजत लाज़मी है दोस्‍तो, कौन कहता है अंग्रेजी कि जरुरत है दोस्तोंब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता contest2

अभी कुछ दिनों पहले कि बात है मैं अपनी दोस्त के घर दिल्ली गयी थी उसकी बेटी से बात करते-करते मैंने यूँ ही पूछ लिया कि आप किस विषय में तेज़ हैं बेटी का जवाब था अंग्रेजी. मुझे अंग्रेजी में उसकी दिलचस्पी पर जरा भी हैरानी नहीं हुई. फिर मेरे ह्रदय में अचानक से ये प्रश्न उठा और मैंने उससे पूछा कि तुम्हे सबसे बुरा और अरुचिकर विषय कौन सा लगता है. वो थोड़ी देर की लिए सोचने की मुद्रा में आई, इस बीच मैं भी मन ही मन उसके उत्तर के बारे में सोच रही थी  और मैंने झट से उसकी ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा संस्कृत….क्योंकि हम लोग संस्कृत को पहले ही बहुत पीछे छोड़ चुके हैं ऐसा सोचकर मैंने संस्कृत कहा. लेकिन उसने जवाब दिया ‘हम्मम्म्म” मैंने पूछा तो फिर कौन सा विषय है ?  उसने इस बार झट से कहा:” हाँ ‘हिंदी'”……ये सुनकर मेरे  दिल को कुछ पल के लिए धक्का लगा अपने ही देश में “मातृभाषा” हिंदी की इस दुर्दशा पर मुझे बड़ा ही अफ़सोस हुआ. लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाकर अपने देश से अपनी ही “मातृभाषा” के वजूद को समाप्त करने में लगे हैं. ये क्यों नहीं समझते कि……….

“मातृभाषा” हिंदी का सम्मान देश का सम्मान है !
और देश का सम्मान ही हमारा स्वाभिमान है !!

मैंने देखा है महसूस किया है हिन्दी का हिन्दुस्तान मे ही लोग विरोद्ध करते है विदेश की तो बात ही छोड़ दीजिये जबकि जरा सी अंग्रेज़ी बोलते ही लोग इज्जत और सम्मान बख्शते है और इन्ही कारणों को देखते हुए  किसको इज्जत और सम्मान नहीं चाहिए बस यही अहम् कारण कह लीजिये कि लोग अपने बच्चो को अंग्रेज़ी माध्यम मे पढ़ने के लिए भेजते हैं जहाँ अंग्रेजी को ज्यादा महत्व दिया जाता है और बच्चे अपनी ही “मातृभाषा” को नहीं पहचान पाते जबकि अक्सर घरों में बच्चों के माँ–बाप रोजमर्रा की बातचीत में ज्यादातर हिंदी का ही प्रयोग करते है. जिस देश की “मातृभाषा” ही हिंदी है आज उसी देश के लोगों को हिंदी में बात करने में शर्म महसूस होती है अक्सर ये देखा जाता है कि जो अंग्रेजी में बात करता है सब उसे विद्वान समझने लगते हैं. ये सत्य है कि अंग्रेजी बोलने से इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वो कितना ज्ञानवान है. जनाब ज्ञान की पहचान व्यक्ति के कर्मों से होती है न कि उसके द्वारा बोली हुई भाषा से.
वो कहते हैं कि……

“मातृभाषा” को जितना अपनाओगे उतना ही निखर जाएगी !
दोस्तों..ये कोई रात का ख्वाब नहीं है, जो बिखर जाएगी !!

आखिर लोग ये क्यों नहीं समझते कि किसी भी समुदाय की संस्कृति, स्मृतियां, परंपराएं, ज्ञान-विज्ञान दर्शन और विचार उसकी अपनी भाषा में ही व्यक्ति सही तरह से अभिव्यक्ति कर पाता है. इन सब बातों का दूसरी भाषाओं में शाब्दिक अनुवाद तो हो सकता है, पर इसमें मौजूद भावों का अनुवाद नहीं हो सकता.
आज सभी भारतीय भाषाओं पर “जिसमें हिंदी सबसे प्रमुख है” जिस तरह अंग्रेजी का अतिक्रमण हो रहा है, उससे अगले 50 साल में हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा. तब शायद भारतीय भाषाओं को नये तरीके से सीखने और सिखाने की जरूरत पड़ेगी.
सुनने में तो ये भी आया है कि अंग्रेज भारतीय साहित्य से ज्ञान अर्जित करने के लिए हिन्दी सीख रहे हैं और हमारे देशवासी है कि अच्छी नौकरी पाने के लिए अपने ही देश में अंग्रेजी सीख कर अपनी ही “मातृभाषा” का अपमान कर रहे हैं.
अगर आप लोग ये मानते हैं कि भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी है तो मेरे देश के वाशियों अंग्रेजी को इतना ज्यादा महत्व क्यों दे रहे हो आप लोग  ? आखिर मैं आप लोगों से ये पूछती हूँ किसने कहा है देश की तरक्की के लिऐ अंग्रेजी की जरूरत है ? ये सब देखकर तो मुझे लगता है कि भारत देश तन से तो आजाद हुआ है लेकिन मन से नही.
क्योंकि सरकार के द्वारा हर जगह अंग्रेज़ी व्यवहार मे लाना गलत है इसी वजह से हिंदी के वजूद को भारी छति हो रही है आज के आधुनिक युग में हिन्दी की महत्ता उतनी नहीं रही जितनी की होनी चाहिये थी. अंग्रजी को बढ़ावा देने और हिन्दी को पीछे छोड़ने के लिय सिर्फ और सिर्फ केद्र सरकार ही जवाबदार है. अगर मन में ठान लिया जाए कि हमें अपने देश का गौरव और स्वाभिमान जिन्दा रखना है और अपनी “मातृभाषा” को बचाना है तो एक जंग छेड़ देनी चाहिए.

अपनी “मातृभाषा” की हिफ़ाजत लाज़मी है दोस्‍तो !
कौन कहता है अंग्रेजी कि जरुरत है दोस्तों !!

देखा जाए तो देश के सभी काम राष्ट्र भाषा में होने चाहिए क्योंकि यहाँ कुछ ही परसेंट लोगों को अंग्रेजी का ज्ञान होगा. मेरे हिसाब से देश की तरक्की के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए ऐसा सोचना एक मानसिक रोगी होने के साथ-साथ अपनी “मातृभाषा” के साथ अन्याय करना है.
सबसे अहम् और सच्चाई से भरपूर हैं ये बात जिसे हर कोई बखूबी समझता है कि….. हिन्दी प्यार की भाषा है और अंग्रेज़ी व्यापार की भाषा है……………
और अब अंत में कुछ पंक्तियों के साथ आपसे विदा लेती हूँ…….

मैंने हिंदी तेरे सम्मान में सर को झुका रक्खा है !
मैंने आँधियों में भी एक चिराग जला रक्खा है !!

हिंदी है हमवतन है तू, गौरव है हर देशवासी का !
इसलिए मैंने अपने जज्बों में तुझको समा रक्खा है !!

सुनीता दोहरे………..


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