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इस लोकतंत्र में दलितों की हैसियत क्या है ?

Posted On: 23 Aug, 2017 Others में

sach ka aainaअपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

sunita dohare Management Editor

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इस लोकतंत्र में दलितों की हैसियत क्या है ?

इस देश के चौथे स्तम्भ ने अंध भक्ति के चलते गोरखपुर में मरे बच्चों, बिहार की बाढ़, गुजरात मे फिर दलितों पर हुए हमले, गाय मांस एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी, युवाओं की बेरोजगारी, नौकरियों की हर दिन हो रही कटौती, वैज्ञानिको का त्याग पत्र देना, महंगाई, बीजेपी शासित राज्यों के भ्रष्टाचार, नोटबन्दी घोटाले, सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों की काली कमाई, रेलवे प्रशासन से हो रही लापरवाही के चलते हो रहे हादसे जैसे ज्वलन्त मुद्दों से परे हटकर ये एक पार्टी विशेष की चाटुकारिता करते करते सही और गलत की पहचान करना भी भूल गये हैं l देखा जाये तो पहले के भारत में और आज के भारत में छुआछूत और उत्पीड़न के नाम से आज भी कुछ भी नहीं बदला है अगर बदला है तो सिर्फ दलितों पर हो रहे अत्याचारों का तरीका.
उत्तर-प्रदेश में दलितों पर अत्याचार रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं। दलित उत्पीड़न और दलित विरोधी वारदातों से भारत की छवि खराब हो रही है। गोरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों पर हमले आये दिन देखने को मिल रहे हैं l इन कथित गोरक्षकों के हमलों का शिकार दलित और मुस्लिम हो रहे हैं दबंगों ने दलितों का जीना मुहाल कर रखा है। यहाँ सरकार बदलने का भी कोई असर कानून व्यवस्था पर नहीं पड़ा है दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार और दलितों के साथ सामाजिक भेदभाव को देखते हुए हम मूल मुद्दे पर आते हैं l वो कहते हैं कि जिस समाज की अनैतिकता ने इस व्यवस्था को जन्म दिया है या संविधान और कानून को ठीक ढंग से अमल में आने से रोका है उस नैतिकता से तो अब उम्मीद ही छोड़ दी जाए, तो ही बेहतर होगा l क्यूंकि भारत के उपनिषदों और धर्मशास्त्रों के पवित्र वाक्य “सर्वे भवन्तु सुखिनः” ‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’, ‘वसुधैव कुटुंबकम’, अथवा ‘सोऽहम्‌’ और ‘तत्त्वमसि’ आदि शामिल तो हैं लेकिन दलित विरोधी तत्वों के लिए इनका कोई औचित्य नहीं रहा l इस सामजिक विकृति का पतन होना चाहिए l
ये पूर्णतया सत्य है कि जिस दौर में इस मुल्क में महावाक्यों की महिमा अपने शिखर पर थी उसी दौर में मानवता के खिलाफ सबसे बड़े षड्यंत्र इन्ही महावाक्यों को जपने वाले लोगों ने रचे थे l हमारे लिए विचारणीय ये है कि सर्वं खल्विदं ब्रह्मम हो या सर्वे भवन्तु सुखिनः हो उसमे इस्तेमाल किया गया यह शब्द “सर्व” असल में कुछ ख़ास नियम व शर्तों के तहत ही लागू होता था l “सर्व” में शूद्र और अतिशूद्रों सहित स्वयं सवर्ण द्विजों की स्त्रीयां भी शामिल नहीं थीं, छुआछूत, स्त्री दमन, महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखना आदि इनके विचारों में था l ऐसे महावाक्यों के सर्जकों के दौर में समाज में भी इन नैतिक मूल्यों का जनमानस में कोई प्रभाव नहीं हुआ था, तो अब क्या होगा l देखा जाए तो लोकतंत्र, में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद (जो सिर्फ हवाई है) दलितों के हितों की बलि पर ही तो जिन्दा है  इस लोकतंत्र में दलितों की हैसियत क्या है, दलित विरोधियों ने इसका भी आईना दिखा दिया है l
ऐसे में आज हम यह कल्पना करें कि वे ही पुराने नैतिक मूल्य हमारे समाज में यूरोपीय अर्थ के लोकतंत्र, समाजवाद और ‘सर्वोदय’ को आज संभव बना सकते हैं तो शायद हम गलत उम्मीद कर रहे हैं अगर हमें समाज से इस बुराई को दूर करना ही तो जनांदोलन और जनजागरण के लिए सड़कों पर उतरने के साथ साथ अपने हक़ की रखवाली करनी होगी

यह अत्यंत सोचनीय है कि हिन्दू धर्म, आज भी, छूआछूत के कलंक, अस्पृश्यता नामक विकृति से ग्रस्त है। इस वेदना से त्रस्त एंव क्षुब्ध दलित अपने वर्चस्व से बड़े बड़े पदों पर बैठ तो गया लेकिन, इतना सब होने के बावजूद भी आज भी दलितों कि स्थिति जस के तस है l यूपी में पिछले एक दशक के दौरान दलित उत्पीडन की घटनाओं में जिस तरह से इजाफा हुआ है वो चौकाने वाला है l दलितों को गॉव के कुएं से पानी ना भरने देना, मन्दिर के अन्दर प्रवेश ना करने देना, दलितों को लाठी डंडों से मारना, दलितों की हत्या कर देना आदि l गौरतलब है कि आजादी के 70 सालों बाद भी दलितों पर होने वाली अत्याचार की घटनाओं में गिराबट न आना चिंतनीय और विचारणीय भी है l आखिर कब तक लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दलित वर्ग अपने आपको बलि चढ़ाता रहेगा ?
देखा जाये तो दलित विरोधी मानसिकता को काबू में करने के लिए अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति एक्ट के तहत कड़ी सजाओं का प्रावधान भी है इसके बावजूद उत्पीड़न के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है कारण कि अपने आपको उच्च जाति का कहने वाले लोग दलितों को तुच्छ समझते हैं l सबसे अहम बात तो ये है कि हम आज तक इस देश को यह ही नहीं समझा पाए कि आरक्षण की ज़रूरत क्यों है l और इस पर अभी भी गतिरोध क़ायम है.
देखा जाये तो मानवाधिकारों के हनन के मामले सामाजिक रूप से तो होते ही है, आर्थिक कारणों से भी बहुत मात्रा में होते हैं जैसे कि दलितों के शादी ब्याह में घोड़े पर चढ़े दूल्हे के सर पर लाठियां बरसाने तक, ईट भट्ठों से लेकर घर तक, न्यूनतम मज़दूरी के सवाल से लेकर समाज में रहने तक, कुँए और हैंडपंप के पानी से लेकर स्कूलों में बैठने तक, अपने घर में शादी के मौके पर गाजे बाजे तक जैसे कई उदाहरण हैं जो समझाते हैं कि आज भी दलितों को सामाजिक अधिकार नहीं मिल रहे है l आज भी गांवों में अगर दलित दूल्हा घोड़ी चढ़कर निकल रहा है तो दुल्हे की घोडी की लगाम थाम लेते है क्यूँ ? इतनी गिरी हरकत करने का अधिकार इन उच्च जाति वालों को किसने दिया l केंद्र में या राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो, दलित उत्पीड़न के मामलों में कोई खास अंतर नहीं पड़ता l देश के कई जगहों पर मामूली सी गुस्ताखी पर दलितों को नंगा कर घुमाया जाता है या कभी उनका सिर मुंडवा दिया जाता है और तो और धर्म और जाति की राजनीति करने वाले खुले आम किसी ना किसी चैनल पर अक्सर टीवी डिबेट करके दलितों की बेइज्जती करते नजर आ ही जाते हैंl मुझे गर्व है ऐसे लोगों पर जो खुलकर उनकी दलित विरोधी बातों का जवाब देते हैंl अभी हाल ही की बात है कि चैनल IBN7 पर डिबेट में एंकर सुमित अवस्थी ने दलित चिन्तक चन्द्रभान प्रसाद जी से प्रश्न किया कि दलित उत्पीड़न कब खत्म होगा…? तो उस समय चन्द्रभान जी का जवाब था कि आरएसएस के राकेश सिन्हा और सम्बित पात्रा जब मृत गौ माता की लाश कंधे पर उठा कर ले जाएंगे उस दिन दलित उत्पीड़न अपने आप खत्म हो जाएगा। यह सुनकर सभी सन्न रह गए, सुमीत अवस्थी ने उसी समय डिबेट को ख़त्म कर दिया.
ठीक इसी प्रकार NEWS_24 चैनल पर बहस में चंद्रभान प्रसाद ने कहा था कि दलित अब मरे जानवर उठाने और गंदगी साफ करने का काम छोड़ रहा है जो लोग गाय को माता मानते हैं वो उसे कंधो पर उठाकर ले जायें और अपनी माँ का अंतिम संस्कार स्वयं करें तब इनको समझ आयेगा कि दलित उत्पीडन क्या होता है। ये सुनकर भाजपा के संबित पात्रा, वीएचपी के तिवारी और आरएसएस के राकेश सिन्हा के मुंह बंद हो गये थे जो देखने लायक थे फिर वहीं तुरंत डिबेट भी खत्म कर दी गई थी । मीडिया वालों ने सच्चाई सुनकर डिबेट को समाप्त कर दिया, या यूँ कहूँ कि दलितों के प्रति हो रहे अत्याचारों की सच्चाई को चन्द्रभान प्रसाद बयाँ ना कर दे l जिसके चलते दूषित मानसिकता के लोग बौखला ना जाएँ l मेरी ये समझ नही आता कि आखिर मीडिया को देश की गरीबी और उनसे जुड़े मुद्दे दिखाई नहीं देते l संसद में बैठे गुर्गों के झूठे वायदे दिखाई नही देते, इन सफेदपोशों की काली करतूते दिखाई नहीं देती, आवाम की समस्याएं दिखाई नहीं देतीं, डाक्टरों की लापरवाही से छोटे छोटे बच्चों की हो रहीं मौतें दिखाई नहीं देती, महिलाओं कि सुरक्षा दिखाई नही देती, दलित महिलाओं को बाहर से लेकर घर की चाहरदीवारी तक हिंसा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है मीडिया को ये सब दिखाई नहीं देता l यहाँ का पुलिस प्रशासन और सरकारी तंत्र हमेशा से दलित समाज को हेय दृष्टि से देखता है जिसके चलते दलितों के उत्पीड़न के मामले में प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती और अगर दर्ज कर ली तो चार्जशीट नहीं भरी जाती है l कहने को देश आजाद है लेकिन मानवाधिकार संगठनों और जन संगठनों में इस सवाल को लेकर कोई संवेदनशीलता नही है l दलितों से छुआछूत का मामला हो या मंदिर में प्रवेश को लेकर टकराहट या उनसे व्यभिचार की घटनाएं लगभग हर रोज देश के किसी न किसी कोने से देखने सुनने को मिल ही जाती हैं। जातियों और वर्गो के बीच में भेद को मिटाने की पहल इसलिए भी नही करने दी जाती क्यूंकि, राजनीतिक रोटियों को सेंकने का जरिया समाप्त हो जायेगा.
संविधान के अनुच्छेद 46 के अनुसार- ‘राज्य विशेष सावधानी के साथ समाज के कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जाति/ जनजातियों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों के उन्नयन को बढ़ावा देगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के सामाजिक शोषण से उनकी रक्षा करेगा’। लेकिन दलितों के प्रति, साल-दर-साल, बढ़ते अपराधों के आंकड़े, चिन्ताजनक भी और शर्मनाक भी हैं। हमारे देश कि यह घोर त्रासदी है कि, अब भी समाज में गैर-बराबरी है, सामाजिक भेद है, छूआछूत तथा जाति का अहंकार है। दलितों पर होने वाले अत्याचार की वीभत्स घटनाएं निरन्तर सामने आ रहीं है। हमारा समाज इन धटनाओं को रोकने में पूरी तरह से असमर्थ हो चुका है। ‘दलित एक्ट’ के तहत सजा के कठोर प्रावधान किए गए हैं। दलित उत्पीड़न के संदर्भ में उन्हें उचित ढंग से अगर लागू किया जाए तो उसके भय से ही बहुत हद तक ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।

सुनीता दोहरे

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