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पत्रकारों की लाशों पर लिखा जा रहा यूपी का इतिहास

Posted On: 23 Jun, 2015 Others में

sach ka aainaअपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

sunita dohare Management Editor

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sunita dohare

पत्रकारों की लाशों पर लिखा जा रहा यूपी का इतिहास…

लोकतंत्र की ये कैसी विडंबना है कि नेता की भैंस गुम हो जाए तो पूरा सरकारी अमला हरकत में आ जाता है लेकिन यहाँ सपा सरकार की छत्र छाया में एक पत्रकार को जिन्दा जलाकर मार देने वाले खुले घूम रहे हैं ! ऊपर से तुर्रा ये कि उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक एके जैन कहते है कि शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह ने संभवतया खुद को आग लगा ली होगी। और वहीँ डीजीपी जैन कहते हैं कि इस केस की फॉरेंसिक रिपोर्ट जगेंद्र के खुद को आग लगाने की ओर इशारा कर रही है । उनके मुताबिक जगेंद्र के शरीर इस तरह से जला था, जैसे उसने अपने शरीर पर आग लगाई हो।”
अब इस तरह की बचकानी बातों से आपको नही लगता कि……

पत्रकारों पर हमले और हत्या में आरोपियों पर कड़ी कार्यवाही न होना उकसाने जैसा है l सच तो ये है कि उत्तर प्रदेश में “विज्ञापन लो और चुप रहो, हमारे खिलाफ मत बोलो नहीं तो हम तोड़कर रख देंगे l”
ये पत्रकार जगत के लिए बड़ी शर्मनाक बात है कि पहले शाहजहाँपुर के जगेंद्र सिंह को जिन्दा जला कर मार दिया गया। फिर कानपुर में पत्रकार दीपक मिश्रा को पांच गोलियां मारी गयीं। जालौन में दो पत्रकारों, लखनऊ के कैनविज टाइम्स के पत्रकार अमित सिंह को सपा के छुटभैये नेताओं ने वाहन चढ़ाकर मारने का प्रयास किया। इन घटनाओं से साफ़ जाहिर होता है कि अगर पहली घटना में अखिलेश सरकार तुरंत कार्यवाही करती तो इन घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होती। पहली घटना में आरोपी मंत्री और पुलिस कर्मियों पर प्रभावी कार्यवाही न होने से माफिया के हौसले और बढ़ गए और उन्होंने एक और पत्रकार को निशाना बना दिया। अभी तक जगेंद्र की तरह दीपक मिश्रा के हमलावर भी गिरफ्तार नहीं हुए। इससे साफ़ दिखाई दे रहा है कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश का इतिहास पत्रकारों की लाशों पर लिखा जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार, घोटाले, कानून व्यवस्था की मैली तस्वीर और पुलिस, नेता, माफिया के खतरनाक गठजोड़ ने कलम के सिपाहियों को दहशत में डाल दिया है।
पत्रकार भले ही कितना ईमानदार, निस्पक्ष व सिद्धांत वादी हो, मगर राजनेता उसकी ईमानदारी, सिद्धांतवादी नीति व निस्पक्षता के स्पैलिंग ही बदल कर रक् देते हैं। ये कैसी विडम्बना है जो खुद को पत्रकार साबित करने के लिए अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ती है l राजनेता कैसे दिखते हैं, क्या करते हैं और उनका असली चेहरा कैसा है, उनकी हर पोल पत्रकार जानते हैं और राजनेता भी जानते हैं कि वह अपनी छवि व कार्यप्रणाली कैसे जनता की नजरों में बनाये रखना हैं। इसलिए पत्रकारों को अपने पक्ष में करना उनकी राजनीतिक विवशता होती है और जो पत्रकार उनका विरोध करता है तो उसे जान से हाँथ धोना पड़ता हैl
एक समय था जब सत्ता की गलतियों को पकड़ना पत्रकारिता की पहचान माना जाता था। जो पत्रकार जितना तेज-तर्रार और तेवर वाला होता था, उतना ही उसे बड़ा और गंभीर माना जाता था। लेकिन आज मान्यताएं बदल चुकी हैं। आज पत्रकार का मतलब है कि वह अपनी आम लोगों के प्रति पक्षधरता को कितनी जल्दी तोड़कर नौकरी करने और नौकरी बचाने की मानसिकता से खुद को जोड़ कर इस व्यवस्था का खुद को अंग बना लेता है। आज के माहौल में जिस पत्रकार ने तेवर दिखाए या आम लोगों के अधिकारों की बात की, उसकी नौकरी छीन ली गई। या फिर जलाकर मार दिया गया, फिर जब कलम ही छीन लिया गया तो पत्रकारिता कैसे बचेगी l इतना सब देखने सुनने के बाद सीधी और साफ़ बात ये नजर आती है कि लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का जो सफ़ाया हुआ था असल में उसमें मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही थी. उससे सचेत होकर और नई नीति अपनाकर जिस तरीक़े से मीडिया मैनेजमेंट किया जा रहा है ये मीडिया की आज़ादी के लिए बहुत बड़ा ख़तरा हो गया है. जो पत्रकार खुलासे का काम करता है, जो राजनीतिज्ञों के भ्रष्टाचार के खुलासे करता है और जो राजनीतिक और आतंरिक नीतियों का पर्दाफाश करता है आज उसका अस्तित्व खतरे में है l ये विचारणीय है कि मीडिया का एक हिस्सा आर्थिक और सामाजिक दबावों की वजह से सरकार के साथ भी हो गया है और जो विद्रोही पत्रकार है उन पर चुन-चुन कर हमला हो रहा हैl
हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अपने देश की अखबारी पत्रकारिता आजादी के आंदोलन की कोख से निकली और क्रांतिकारी वक्त में पली बढ़ी है। जाहिर है, उसके आदेशों और क्रांति की तपिश पर ही आगे बढ़कर ये यहां तक पहुंची है। आज के हालातों को देखते हुए घटनास्थल पर जाने वाला पत्रकार यह सोचकर नही निकलता कि वह वापस लौटेगा भी या नही, अपितु उसे अपना लक्ष्य दिखाई देता हैl भारत के सुधि जनों को लोकतंत्र के चौथे खम्बे पर बहुत गंभीर चिंतन की दरकार हैl इन हालातों में अगर हर पत्रकार ये ठान ले कि “अब यूपी का इतिहास पत्रकारों की लाशों पर नहीं लिखने देंगे, हर पत्रकार अब जगेंद्र बनेगा” तो क्या मजाल इन सत्त्धारियों की कि इनकी आँख भी हमारी तरफ उठे l आज मीडिया और राजनीति में गहरा रिश्ता है, जिसे हमें समझने की जरूरत है। आज शेयर बाजार, सट्टा और सर्वे कई गलत तस्वीरें समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज प्रभावित होता है। ये सत्य है कि हिन्दुस्तान तभी आगे बढ़ेगा जब लोगों में सामाजिक न्याय के लिए भूख पैदा होगी। पत्रकारिता का यह दायित्व है कि लोगों में सामाजिक चेतना की भूख पैदा करे।  पत्रकारिता,  राजनीति और देश आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता देश हित में होनी चाहिए l निष्पक्ष होकर पत्रकार को अपनी कलम चलानी चाहिए। किसी पार्टी विशेष से जुड़कर लिखेंगे तो उस लेखन में वह धार नहीं होगी। किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर लेखन करना भी ठीक नहीं।
सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक
इण्डियन हेल्पलाइन

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