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मेरे हिस्से की प्रीत (महकती रचनाएं)

Posted On: 14 Jan, 2015 Others में

sach ka aainaअपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

sunita dohare Management Editor

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मेरे हिस्से की प्रीत  (महकती रचनाएं)…

अनगिनत लम्बी यादों के उतार चढ़ावों से भरीं जिन्दगी में बहुत कुछ गुजरा जैसे … कुछ फाँस सी चुभकर  असहनीय पीड़ा मिली, कभी अनंत ख़ुशी मिली, कभी दर्द मिला, कभी उसकी मुस्कराहट पर मुखरित हो गई गजल, कभी कविता, कभी मन यूँ ही गुनगुनाने लगा…. मैंने आज तक भगवान को नहीं देखा लेकिन मैंने तुझमें उसे हमेशा पाया, क्योंकि तुमने मेरा तब साथ दिया जब बाकी सारी दुनिया ने मेरा साथ छोड़ दिया था ! यही कारण है कि दिन पर दिन धूप में छाँव सी ठंडक पहुंचाने वाली मन की इच्छाओं का यह काफिला शब्द बन कागज़ पर महक गया ! तेरी यादों के  कुछ सुरीले,  सुखद क्षण,  मेरे हिस्से की प्रीत बन गए ! तो फिर गाहे बगाहे मन मचलने लगा कि कुछ ऐसा हो जाए जो पूरी कायनात पर राज़ कर सकूँ …… अपने मन में उठे विचारों को इन रचनाओं के जरिये आप तक पहुंचा रही हूँ कृपया इनायत फरमाएं….

(२)- बेटी तुम बगिया की खुशबू

पेड़ बबूल का रोये जाये, ये विधना की अनबूझ पहेली
सतरंगी सपनो सी खिलके, वो जो मेरी गोद में खेली
हठी नटी सी मृग तृष्णा सी, तन मन को वो बांध चली
रंग घुलते हैं पूछ के उससे, हर रंग में वो लगी भली
मन की व्यथा जब लगी बिलखने, रोते रोते सांझ ढली
बैठ उकेरे सांझ सबेरे, नैनन छलके असुंअन की डेली
घर की कन्या चिड़िया बन गयी, भाभी छोड़ी आज ठिठोली
पेड़ बबूल का रोये जाये, ये विधना की अनबूझ पहेली……..
अधर धरे मुस्कान छबीली, अश्रु बनी इक याद ढली
चटकन लागी सांस ह्रदय की, धीरे धीरे रात ढली
है त्याग दया की पावन गंगा, बेटी थी मेरी भोली
बरसों से सींची फुलवारी, महकेगी किसी और की डाली
दुल्हन बन गई मेरी लाडो, फूलों से भर जाए ओली
कैसी है ये रीत जगत की, हुई विदाई चल दी डोली
पेड़ बबूल का रोये जाये, ये विधना की अनबूझ पहेली……..सुनीता दोहरे ….

(३)…. माटी का बना दिया हूँ मैं, बस माटी में मिल जाए

बाती कहती दीप से, तू क्यूँ इतना इतराए
मैं तो जल जल हुई बावरी, तू खाली रह जाये
हुआ पतंगा मुझपे दीवाना, तू क्यूँ इतना इतराए
मेरी ऊँची शान है लौ की, तू वही खड़ा रह जाए
ओ पतंगे झूम के आजा, तू क्यूँ दूर दूर मंडराए
सुन ले बात दीवाने दिल की, ये हुआ किसी का जाए
बाती कहती दीप से, तू किसी को क्या दे पाए
देख मिलन है दो रूहों का, तू देख देख जल जाए
दीपक बोला बाती से सुन, अब कहे बिन रहा ना जाए
सुन के बतियां “बाती” तेरी, मोहे सुन सुन हांसी आये
मुझसे तेरी रात चांदनी, तू फिर हमसे क्यूँ इतराए
साथ निभाए रिश्तों की, खुश्बू छलक छलक रह जाए
मेरी बात समझ ले पगली, तू मुझ बिन रह ना पाए
मुझ बिन तेरा वजूद नहीं, तू मुझमें ही जल जाए
तू क्या लाई क्या ले जाएगी, बस मिट्टी ही रह जा
दिया है तुझको जीवन अपना, जो तू जोगन हो जाए
तो यही दुआ है शाम सुनहरी, रात पूर्णिमा छा जाये
हाथ उठा जो मांगे तू वो, सारी खुशियाँ पा जाए
मेरा क्या है मैं तो रहूँ अँधेरे में, तू उजियारा पाए
माटी का बना दिया हूँ मैं, बस माटी में मिल जाए….. सुनीता दोहरे ...

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