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हो गईं करोड़ों मासूम जानें शून्य में विलीन...

Posted On: 2 Sep, 2017 Others में

sach ka aainaअपने किरदार को जब भी जिया मैंने, तो जहर तोहमतों का पिया मैंने, और भी तार-तार हो गया वजूद मेरा, जब भी चाक गिरेबां सिया मैंने...

sunita dohare Management Editor

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हो गईं करोड़ों मासूम जानें शून्य में विलीन….

समाज में क्या गलत हो रहा है, किस बात से हिंसा बढती है, किससे समाज के नैतिक मूल्यों का हनन हो रहा है, किससे मानवता शर्मसार होती है उसके खिलाफ लिखना या उसका विरोध करना एक जिम्मेदार मनुष्य का कर्तव्य होता है। लेखक की लेखनी से समाज में सुधार और विकास हो, यही लेखक का उद्देश्य होना चाहिए । यदि कोई हिन्दू लेखक अन्य धर्मों में प्रचलित अंधविश्वासों पर लिखता है या फिर कोई मुस्लिम लेखक हिन्दुओं के अंधविश्वासों पर लिखता है तो इसमें कोई बुराई नहीं होनी चाहिए । वैसे एक अच्छा लेखक किसी जाति और धर्म से जुड़ा नहीं होता उसकी जाति उसका धर्म सिर्फ इंसानियत होती है l
आज सुबह सुबह व्हाट्सएप पर मुझे किसी ने एक तस्वीर भेजी देखकर दिल दहल गया l मैं उस तस्वीर को इसी ब्लॉग में लगा रही हूँ l आज बकरीद है लोग खुशियाँ मना रहे हैं लेकिन आज सुबह से मेरा मन उदास सा है l कारण व्हाट्सएप पर भेजी हुई वो तस्वीर है जिसमें एक मासूम सी बच्ची बकरे के कटे हुए सर को जग से पानी पिला रही है l मानो कह रही हो उठो पानी पी लो l इस बच्चे की मासूमियत को देखकर इंसान की रूह कांप जाए, अब भला इस बच्ची को क्या पता कि उस बकरे की बलि दी जा चुकी है जिसे वो पानी पिला रही है l कितना भोलापन है कितनी मासूमियत है इस बच्ची में, क्या ये नेक बंदों को दिखाई नहीं दे रहा.
मेरी जागरण जंक्शन से ये अपील है कृपया मेरे लिखें विचारों को आवाम तक पहुँचाने के लिए इसे हाईलाईट करें l  मैं किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहती हूँ लेकिन, अपने अन्दर हो रही उथल पुथल से मैं व्यथित हूँ जिसे आप लोगों तक पहुंचाना चाहती हूँ l भारतीय होने के नाते प्रत्येक नागरिक का ये दायित्व है कि समाज में यदि कुछ गलत हो रहा है तो उसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए । ऐसा सोचकर चुप नहीं बैठना चाहिए कि ये मेरा धर्म नहीं है l सभी धर्मों में कुछ न कुछ अंधविश्वास है। जिसके खिलाफ लोगों में जागरूकता लाने के लिए लिखना प्रत्येक व्यक्ति का हक है कि वो उस विषय पर लिखे, चाहे वो किसी भी धर्म का हो और ये हक़ उससे कोई नहीं छीन सकता बर्शते लेखनी में एक मर्यादा होनी चाहिए l
मैंने उस बच्चे की पिक देखने के बाद ही
फेसबुक पर ये पोस्ट डाली कि….“क्या मैं करूं आत्म-मंथन या ये बलि देने वाले करें आत्म-मंथन…. हजारों निर्दोष जानवरों की बलि देकर कैसी खुशी ? आज सभी ने मुझे विश किया लेकिन वापसी “same to you” देने में मेरा दिल व्यथित हो गया इसलिए मैं किसी को विश नही कर पाऊँगी l  कृपया मुझे इन बॉक्स में विश ना करें” l…….

मेरी पोष्ट देखकर ज्यदातर लोगों ने अपने विचारों में जानवरों को काटकर खाने की सहमती जताई l कुछ ने कहा ये काटकर खाने के लिए ही बने हैं l कमेंट्स देखकर बड़ा ही दुःख हुआ और मुझे कुछ टिप्पणियों को पढ़कर ये महसूस हुआ कि ये मुहावरा मुझ पर सटीक बैठता है कि “भैंस के आगे बीन बजाना…..
मैं यहाँ किसी धर्म और जाति विशेष की बात नहीं कर रही हूँ मैं सिर्फ मानवता और इंसानियत की बात कर रहीं हूँ जो हमारे भारत देश की संस्कृति और पहचान है l आप जब तक ये नहीं सोचेंगे कि ईश्वर सृष्टिकर्ता है और आप सृष्टि का एक विभिन्न अंग हैं। किसी निरीह प्राणी के प्राण लेने का आपको कोई अधिकार नही है l  जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार है। यह स्वयं ही इतना दिव्य, पवित्र और परिपूर्ण है कि संसार का कोई भी अभाव इसकी पूर्णता को खंडित करने में असमर्थ है। तो फिर कोई भी किसी की बलि कैसे दे सकता है l क्या इन त्योहारों की बजह से हजारों की संख्या में बलि देने वालों का यह कृत्य घोर निर्दयता नहीं है ?  वैसे तो सभी दंड से डरते हैं, सभी को मृत्यु से डर लगता है । अतः सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करिये और ना ही हत्या करने के लिये प्रेरित करिये । किसी की हत्या करके आप ईश्वर के कानून का उल्लंघन कर रहे l क्या कोई हिन्दू और मुसलमान प्रमाण दे सकता है कि यह कृत्य उचित है ? आखिर ये कैसे त्यौहार हैं जो जीव की बलियों पर निर्धारित हैं l कहने को भारतवर्ष अनेकता में एकता, सर्वधर्म समभाव तथा सांप्रदायिक एकता व सद्भाव के लिए अपनी पहचान रखने वाले दुनिया में अपना सर्वोच्च स्थान रखता है, परंतु दुर्भाग्यवश इसी देश में वैमनस्य फैलाने वाली तथा विभाजक प्रवृति की तमाम शक्तियां ऐसी भी सक्रिय हैं जिन्हें हमारे देश का यह धर्मनिरपेक्ष एवं उदारवादी स्वरूप नहीं भाता है l जहाँ तक मैं समझती हूँ कि विकृतियाँ तो सभी धर्मों में हैं l परन्तु पशुवध निर्दयता है और धर्म निर्दयता और हिंसा नहीं सिखाता है फ़िर ये सारे धर्म निर्दयी क्यूँ है ? और ये सारे धर्म निर्दयता की शिक्षा क्यूँ देते है ? जब तक आप किसी जीव का दर्द नहीं समझेंगे तब तक आप देश के एक अच्छे नागरिक नहीं कहलायेंगे.
आज धर्म – धर्म ही नहीं रहा अतिसंवेदनशील विषय हो गया है l धर्म एक हथियार बन गया है l कैसे दूसरों को चोट पहुंचाएं, कैसे दूसरों को बरगला कर धर्मांतरण करा लें ताकि एक स्थापित संस्कृति को नष्ट कर उसका दूरगामी परिणाम मिल सके l जितने आराम से धर्म की आड़ में और खुलेआम बलि के लिए जानवर लाए जाते हैं या बलि दी जाती है ये देखकर लगता नहीं कि इसके खिलाफ कहीं कोई आवाज है, कोई कानून है। परम्परा के नाम पर लोग निरीह जीव के प्राण हरने में कतई संकोच नहीं करते हैं l हिंदू धर्म में भी काली मंदिर में जानवरों की बलि दी जाती है। क्या यह क्रूरता नहीं है ? जरा सोचिये जब भी कभी किसी भयानक परिस्थिति में हम अपने आपको “बलि का बकरा” बना हुआ महसूस करते हैं तब बहुत ही मानसिक पीड़ा और दर्द की स्थिति से गुजरते हैं l तो इन मासूमों पर क्या गुजरती होगी l क्षणिक ख़ुशी के लिए हम निर्दोष पशुओं की लाशें बिछा  देते हैं l इन निर्दोष पशुओं की चीख से खरीदी गई मुस्कराह्टें मुझे आज बहुत व्यथित कर रहीं हैं l पशुबलि के नाम से ही आंखों में एक ऐसा वीभत्स दृश्य उभर जाता है जिसमें एक निरीह पशु चाहे वह बकरा हो या भैंस या गाय उसे धकेलकर ऐसे स्थान पर ले जाया जाता है जो कथित रूप से पवित्र है, धार्मिक है, प्राणरक्षक स्थल है लेकिन इन पशुओं के लिए न ही पवित्र, न ही धार्मिक और न ही प्राण रक्षक बल्कि उलटे प्राणघातक है l बेचारे बोल भी नहीं सकते.
ऐसा नही है कि इस समस्या का निदान नहीं है l निदान हैं कि… हम हिन्दू धर्मं और मुस्लिम धर्म दोनों मे जितनी कुरीतियाँ हैं उन पर लिखे, उन पर बात करे लोगो के विचार जाने और उनको दूर करने का प्रयास करे ताकि, इन मासूमों कि बलि ना चढ़ सके । लोगों को चाहिए कि वो लेखक के विषय, विचारों, मकसद और समाज में जागरूकता लाने वाली लेखनी का सम्मान करें l अपने भद्दे कमेंट्स के द्वारा लेखक की भावनाओं को ठेस ना पहुंचाएं l
सुनीता दोहरे
प्रबंध सम्पादक

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