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एक भिखमंगा और एक गाँधीवादी… दोनों लतखोर…

Posted On: 2 Sep, 2010 Others में

Suresh Chiplunkar OnlineJust another weblog

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क्या आपने कभी ऐसा भिखारी देखा है जो भीख भी माँगता है और भीख देने वाले को न सिर्फ़ गालियाँ देता है, बल्कि दाता को नुकसान पहुँचाने की हरसम्भव कोशिश भी करता रहता है… दूसरी तरफ़ एक गाँधीवादी दाता भी है जो उस भिखारी से हमेशा बुरा-भला सुनता रहता है, वह भिखारी आये दिन उस दाता को लातें जमाता रहता है, दाता के घर में उसके घर की गन्दगी फ़ैलाता रहता है… फ़िर भी वह बेशर्म गाँधीवादी दाता हें हें हें हें हें हें हें करते हुए लगातार उस भिखारी के जूते खाता जाता है, खाता जाता है, खाता ही रहता है। न तो कभी पलटकर यह पूछता है कि “आखिर तू भिखारी क्यों रह गया? और इतने साल से भीख ही माँग रहा है तो आखिर वैसा कब तक बना रहेगा? क्या कभी अपने पैरों पर खड़ा होना भी सीखेगा?”, और न ही उस भिखारी को दो लात जमाकर मोहल्ले से बाहर करता है, न ही उससे ये कहता है कि “…आगे से कभी मेरे दरवाजे पर मत खड़ा होना, मेरा-तेरा कोई सम्बन्ध नहीं…”।

इस प्रकार उस भिखारी की हमेशा मौज रहती है, वह गाँधीवादी दाता से अहसान जताकर पैसा तो लेता ही है, बाकी पूरे मोहल्ले से भी यह कहकर पैसा वसूल करता है कि “यदि तुम लोगों ने मुझे भीख नहीं दी तो मैं अपने बच्चों को तुम्हारे घर पर छोड़ दूंगा…” उल्लेखनीय है कि उस भिखारी द्वारा पाले-पोसे हुए बच्चे बुरी तरह से “एड्स” से पीड़ित हैं जिन्हें कोई अपने घर में देखना तक पसन्द नहीं करता, लेकिन भिखारी इसे भी अपना प्लस पाइंट समझकर पूरे मोहल्ले को धमकाता है कि “भीख दो, वरना मेरे बच्चे आयेंगे…”।

उस मोहल्ले का एक पहलवान है, वैसे तो वह भिखारी उस पहलवान से डरता है, क्योंकि वह पहलवान चाहे जब उस भिखारी को उसी के घर में घुसकर झापड़ रसीद करता रहता है, लेकिन पहलवान को भी उस भिखारी की जरुरत पड़ती है अपने उल्टे-सीधे काम करवाने के लिये,,,, सो वह उसे पुचकारता भी रहता है, खाने को भी देता है… उसके एड्स पीड़ित बच्चों की देखभाल भी करता है। मोहल्ले का पहलवान, उस गाँधीवादी को दबाने और धमकाने के लिये उस भिखारी का उपयोग गाहे-बगाहे करता रहता है, और चूंकि उस गाँधीवादी में आत्मसम्मान नाम की कोई चीज़ नहीं है, इसलिये वह पहलवान की लल्लो-चप्पो भी करता रहता है और भिखारी की भी खिदमत करता रहता है। हालांकि उस भिखारी के पाले-पोसे बच्चे पहलवान की नाक में भी दम किये हुए हैं, लेकिन पहलवान अपनी नाक ऊँची रखने के चक्कर में किसी को कुछ बताता नहीं, जबकि मोहल्ले के सभी लोग इस बात को जानते हैं।

असल में उस गाँधीवादी के घर के कुछ सदस्य अति-गाँधीवादी टाइप के भी हैं, और हमेशा सोचते रहते हैं कि कैसे उस भिखारी से मधुर सम्बन्ध बनाये जायें, वे लोग हरदम सोचते रहते हैं कि भिखारी उनका दोस्त बन सकता है, वे लोग भिखारी को अपने साथ, अपने बराबर बैठाने की जुगत में लगे रहते हैं… भले ही वह इन लोगों की बातों पर कान न देता हो और न ही गाँधीवादी के बराबर बैठने की उसकी औकात हो… फ़िर भी लगातार कोशिश जारी रहती है कि किस तरह भिखारी का “दिल जीता” जाये।

मजे की बात यह कि गाँधीवादी और वह भिखारी बरसों पहले एक ही मकान में रहते थे, फ़िर भिखारी अपने कर्मों की वजह से अलग रहने लगा, उसी समय गाँधीवादी ने दरियादिली दिखाते हुए उस भिखारी को गृहस्थी जमाने के लिये काफ़ी पैसा दिया था, लेकिन उस भिखारी की “शिक्षा-दीक्षा” और मानसिकता कुछ ऐसी थी कि वह हमेशा असन्तुष्ट रहता था, चाहे जितनी भीख मिले हमेशा आतिशबाजी में उड़ा देता था, “गलत-सलत शिक्षा-दीक्षा” के कारण उसके बच्चों को एड्स भी हो गया… लेकिन फ़िर भी वह बाज नहीं आता। वैसे एक बार जब पानी सिर से गुजर गया था तब गाँधीवादी ने उस भिखमंगे की जमकर ठुकाई की थी, लेकिन उसके बावजूद वह आये-दिन चोरी के इरादे से घुसपैठ करता रहता है, गाँधीवादी सिर्फ़ सहता रहता है।

कई बार बहुत “कन्फ़्यूजन” होता है कि आखिर दोनों में से “बड़ा लतखोर” कौन है? वह भिखारी या वह गाँधीवादी?
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खैर जाने दीजिये, कहानी बहुत हुई… अब दो खबरें असलियत के धरातल से भी पढ़ लीजिये…

1) पाकिस्तान ने बाढ़पीड़ितों के लिये भारत की दी हुई 50 लाख डालर की सहायता राशि लेने से इंकार कर दिया था… फ़िर कहा कि यह राशि उसे संयुक्त राष्ट्र के जरिये दी जाये… और “मेरा भारत महान” इसके लिये भी राजी है…। अब ताज़ा खबर ये है कि इस 50 लाख डालर की सहायता रकम को पाँच गुना बढ़ाकर 250 लाख डॉलर कर दिया गया है, ताकि हमारा “छोटा भाई” और अधिक हथियार खरीद सके, और अधिक कसाब-अफ़ज़ल भेज सके, कश्मीर में और अधिक आग भड़का सके… (“अमन की आशा” की जय हो…)। जबकि बाढ़ का फ़ायदा उठाकर अब मंगते पाकिस्तान ने चिल्लाना शुरु कर दिया है कि उस पर समूचे विश्व के देशों और वर्ल्ड बैंक का जितना भी कर्ज़ बाकी है वह माफ़ किया जाये, क्योंकि वह चुकाने में सक्षम नहीं है…।

मैने तो सुना था कि OPEC यानी पेट्रोल उत्पादक देशों का समूह जिसमें अधिकतर इस्लामिक देश ही शामिल हैं और जो मनमाने तरीके से पेट्रोल के भाव बढ़ाकर खून चूसने में माहिर है… वह पूरी दुनिया को खरीद सकते है, फ़िर पाकिस्तान के बाढ़पीड़ितों को गोद क्यों नहीं लेते? या OPEC ऐसा क्यों नहीं कहता कि पाकिस्तान हमारा “भाईजान” है और हम उसके सारे कर्जे चुका देंगे… लेकिन खुद इस्लामिक देशों को ही भरोसा नहीं है कि उनके दिये हुए पैसों का पाकिस्तान में “सही और उचित” उपयोग होगा। ये बात और है कि “जेहाद” और “ज़कात” के नाम पर चादर बिछाकर चन्दा लेने में यही सारे देश बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं… जबकि हकीकत में बाढ़पीड़ित गरीबों की मदद करना कोई नहीं चाहता और जो देश ऐसा चाहते हैं उन्हें पाकिस्तान पर भरोसा नहीं है…। फ़िर भी हम हैं कि 50 लाख डालर की जगह ढाई करोड़ डालर देकर ही रहेंगे… चाहे कुछ हो जाये।

2) इधर “अमन की आशा” के एक और झण्डाबरदार शाहरुख खान ने फ़िर से अपने पाकिस्तान प्रेम को जाहिर करते हुए IPL-4 में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को खिलाने की पैरवी की है… जबकि उधर इंग्लैण्ड में नशेलची मोहम्मद आसिफ़ के साथ 6 अन्य खिलाड़ी पाकिस्तान का राष्ट्रीय खेल (यानी “सट्टेबाजी”) खेलने में लगे हैं…। शायद शाहरुख खान अब माँग करें कि उन सभी “मज़लूम, मासूम और बेगुनाह” खिलाड़ियों को भारत की “मानद नागरिकता” प्रदान की जाये, ताकि उन्हें किसी लोकसभा सीट से खड़ा करके संसद में पहुँचाया जा सके… (मुरादाबाद की तरह)

फ़िलहाल आप तो सेकुलरिज़्म और गाँधीवाद की जय बोलिये और अपने काम पर लगिये… क्योंकि भिखमंगों के साथ इन दोनों की फ़ूहड़ और आत्मघाती जुगलबन्दी तो 65 साल से चल ही रही है… आगे भी चलती रहेगी…

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