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अयोध्या के बहाने मीडिया का इस्तेमाल!

Posted On: 25 Nov, 2018 Hindi News,Politics में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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जाने कैसी दहशत है, जाने कैसा ये डर है,
हैं उदास तारीखें और चुप कैलेण्डर है !
मैंने खुद से जब पूछा क्यूँ उदास मंज़र है,
दिल ये चीख कर बोला नवंबर,दिसंबर है !!

अयोध्या को देश की राजधानी घोषित किया जाये। अयोध्या से बेहतर राजधानी हो ही नहीं सकती क्योंकि वहाँ भगवान राम पैदा हुये थे। दिल्ली ग़ुलामी की निशानी है। मुग़लों की भी राजधानी थी/ अंग्रेज़ों की भी। देश के महानतम देशभक्त भागवत जी/ मोदी जी फ़ौरन ये शुभ कार्य करें। राम की लीला देखिए की जो शिवसेना महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों का काम-धंधा नहीं चलने देती है उसे अपनी राजनीति चलाने के लिए आख़िर में उत्तर भारत ही आना पड़ा। राम मंदिर निर्माण की तारीख को लेकर चल रही गहमा गहमी के बीच आज आयोध्या में विश्व हिंदू परिषद की धर्मसभा होने वाली है। इसके साथ की शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने परिवार के साथ रामलला का दर्शन किया, विहिप का दावा है कि तीन लाख से अधिक रामभक्त धर्मसभा में हिस्सा लेंगे। राम मंदिर निर्माण के लिए यह अंतिम धर्म सभा होगी। इसके बाद कोई धर्म सभा नहीं होगी और मंदिर निर्माण शुरू होगा।राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर एक बार फिर से माहौल गर्मा गया है. मंदिर निर्माण के संबंध में तरह-तरह की बयानबाजी की जा रही है. अयोध्या में लोगों की भीड़ जुटना शुरु हो गई है. शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे भी अयोध्या पहुंचे. लेकिन इस शोर के बीच मुस्लिम धर्मगुरुओं ने चुप्पी साध ली है.

आज से ठीक 26 साल पहले 6 दिसंबर 1992 को आज़ाद हिंदुस्तान की सबसे मज़लूम शहादत पेश आयी थी। बाबरी मस्जिद की शहादत सिर्फ एक इबादत गाह की शहादत नहीं थी बल्कि दहशतगर्दों की भीड़ ने अपने आक़ाओं के इशारे पर उस दिन हिन्दुस्तान के आईन के माथे पर एक बदनुमा दाग़ लगा दिया। वो आईन जो मुल्क की अवाम को बिला तफरीक़-ए-मज़हब-ओ-मिल्लत यकसाँ हुक़ूक़ दिये जाने का एलान करता है। जो कहता है की क़ानून की नज़र मे मुल्क के हिन्दू ,मुस्लिम ,सिक्ख ,इसाई सभी बराबर हैं, मगर 6 दिसंबर 1992 को हिंदुस्तान की सरज़मीन पर हिंदुस्तान की सबसे बड़ी अक़लियत की इबादत गाह को राज्य पुलिस और नीम फौजी दस्तों की निगरानी में बेरहमी से तबाह ओ बरबाद कर दिया गया, और क़ानून के रखवाले ना सिर्फ खामोश तमाशाई बने ज़ुल्म ओ बर्बरियत का नंगा नाच देखते रहे बल्कि उन में से कुछ तो खुद भी इस जुर्म मे शरीक हुए और हिंदुस्तान के आईन की रूह को मजरूह कर दिया गया। हिंदुस्तान जल उठा जगह जगह फिरक़ावाराना फसादात के शोले भड़क उठे जिसमें 2000से ज़्यादा हिंदुस्तानी मारे गये अरबों रुपए का माली नुक्सान हुआ । गुज़िशता 26 सालों से पूरे मुल्क में मुस्लिम और दीगर मज़ाहिब के इंसाफ पसंद लोग 6दिसंबर 1992 की दहशतगर्दी को यौमे ग़म या यौमे स्याह के तौर पर मनाते आ रहे हैं । बेशक हम सबको बाबरी मस्जिद की शहादत का बेहद ग़म है और ताज़िंदिगी रहेगा मगर बाबरी मस्जिद की शहादत मुसलमानों के लिए एक पैग़ाम भी है।आज का दिन यू पी के लोगों के लिय इम्तिहान का दिन है। आज सब्र व जबतक मुज़ाहिरा करना है और उन ताक़तों को शिकस्त फाश देना है।

अपने देश की डेमोक्रेसी को क़त्ल होने से बचाना हम तमाम देशवासियों की ज़िम्मेदारी है। अयोध्या के बहाने मीडिया का इस्तेमाल करके देश भर में दहशत फैलाने की आज पूरी कोशिश हो रही है ध्रुवीकरण की एक कोशिश है। आखिर यह जमावड़ा हो किसके खिलाफ रहा है ? राज्य सरकार या केंद्र सरकार या सुप्रीम कोर्ट, या फिर यह किसके खिलाफ है ? राज्य और केंद्र में तो भाजपा यानी मंदिर आंदोलन की समर्थक दल सत्ता में काबिज है ही फिर क्या कारण है कि लोग वहां बुलाये जा रहे हैं ? यह केवल एक चाल है कि इसे वृहद हिन्दू जमावड़े का रूप देकर उत्तेजक नारे लगाए जाँय और सोशल मीडिया पर साम्प्रदायिक उन्माद की खबरें फैलायी जायें, चहेते गोदी मीडिया के चैनल उत्तेजक शब्दावली में अपने चुनिंदा मुल्लों और धर्माचार्यो के साथ डिबेट करें, ताकि मुस्लिम समुदाय में व्यापक प्रतिक्रिया हो और दंगे भड़कें। फिर ध्रुवीकरण की बिसात बिछे और वोट जो आर्थिक दुर्वयवस्था, घपले और महंगाई आदि मामलों पर पड़ने हैं वे धार्मिक आधार पर पड़ें। यह एक प्रकार से मुद्दे भटकाने की साज़िश है। वोट शिफ्टिंग है। यह दुनिया की शायद पहली सरकार होगी जो अपने कार्यकाल में अपने देश और प्रांत में अशांति और उपद्रव चाहती है, साम्प्रदायिक उन्माद और दंगे चाहती है। कारण स्पष्ट है कि पिछले साढ़े चार सालों में इनके पास उपलब्धियां बताने को कुछ है ही नहीं। अयोध्या जमावड़े का न राम से मतलब न मंदिर से सरोकार बस ये चुनाव जीतने के लिये एक शॉर्टकट की खोज है यह। अयोध्या में 144 के बावजूद एक भारी भीड़ पर खुद को सेक्युलर सेक्युलर पार्टी के नेता कहने वाले नेता गण ने चुप्पी साध रखी है मतलब वोट बैंक की राजनीति सब से उपर। अयोध्या का माहौल उतना खराब नही है जितना टीवी और फेसबुक पे दिखाया जा रहा है, थोड़ा तनाव ज़रूर है किसी अनहोनी को लेकर क्योंकि बाहरी लोग इकट्ठा हो रहे हैं पर अयोध्या के निवासी इंसाफ पसन्द हिन्दु मुसलमान, व्यपारी, नौकरीपेशा लोग खुद अमन चाहते हैं और इन बाहरी लोगों की मौजूदगी के खिलाफ हैं क्योंकि हालात बिगड़ने की स्तिथि में वहां के निवासियों का ही नुकसान है।

बाक़ी फेसबूकिया बहादुरों से खास अपील है कि अपने जज़्बात पर काबू रखें और अपनी पोस्ट से अपने शहर और इलाके में तनाव न बढ़ाएं। आप अपनी डिजिटल बहादुरी से वही दहशत हर जगह फैला रहे हैं जिसे मुल्क भर में फैलाने के लिए ही वहां भीड़ इकट्ठा की गई है। अयोध्या के जमावड़े को नजरअंदाज कीजिये और साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रखिये। अब वहां कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे तोड़ा जाय। विध्वंस सबसे आसान कार्य होता है जबकि निर्माण उसकीं अपेक्षा बहुत ही कठिन। भीड़ जुटेगी, कुछ उत्तेजक बातें करेगी, भड़केगी और भड़काने साज़िश खोजेगी. अगर साम्प्रदायिक शांति बनी रही तो यही भीड़ हताश और कुंठित हो लौट जाएगी। इस विवाद का हल या तो अदालती फैसला है या आपसी बातचीत.* भीड़ जुटाना किसी समस्या का समाधान नहीं है। यह उन्माद और पागलपन केवल एक चुनावी एजेंडा है, समझिये और शांति से रहिये।

जो कानों से सुनाई दे उसे कहते हैं ख़ामोशी,
जो आंखों में दिखाई दे उसे तूफ़ान कहते हैं

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