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आये थे भारतीय रेलवे सूरत बदलने

Posted On: 9 Sep, 2016 Others में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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रेलमंत्री का क्रांतिकारी आइडिया कॉरपोरेट संस्कृति में सरकार के विलय-भाव का दिलचस्प उदाहरण है। सर यही तो विकास जहां विमान यात्रा की दर रेलयात्रा के समान हो गई है । अब प्रभु ही रेलवे का मालिक है ! प्रभु की लीला आये थे भारतीय रेलवे सूरत बदलने किसी ने बताया है कि अच्छे दिन अंततः राजधानी, शताब्दी और दूरंतो से आ धमक रहे है ! इसीलिए सब कहते हैं ‘सूट बूट वाले मोदी जी फर्स्ट क्लास वालों को देते है छूट और साधारण जनता से कर रहे किराये की लूट’। जनता को ‘अच्छे दिन’ का अहसास कराने का मौका था पर हैरत है कि प्रभु की रेलवे पर प्रभु की रेल तो पब्लिक को लगातार रेले जा रही है और पब्लिक है कि सुगंधित वातावरण में मदहोश हुयी जा रही भारत में रेल व्यापार नहीं है, सेवा है। इसीलिए उस पर सरकार का एकाधिकार है। निजीकरण का इरादा है तो खुलकर आइए न, विमानन की मानिंद विदेशी निवेश आमंत्रित कीजिए, समाजवाद का नाटक देरसबेर तो ख़त्म होगा ही ! पर रेल टिकट की प्रस्तावित ‘सर्ज़’ दरें रेलवे का भला करेंगी या विमान सेवाओं का, जो मुख्यतः मुनाफ़ाख़ोर कॉरपोरेट हाथों में हैं ?सरकार ने राजधानी,शताब्दी और दुरंतो जैसी ट्रेनों में “फ्लैक्सी किराये” का नियम लागू किया है। इधर हम उम्मीद कर रहे थे कि ये व्यवस्था हवाई यात्रा में समाप्त होगी लेकिन हुआ एकदम उल्टा। ये जनता के साथ धौख़ा है रेल सेवा का विकास होने की उम्मीद थी लेकिन यहाँ तो आम आदमी की कमर तोड़ने का जुगाड़ किया जा रहा। ये सरकार ‘केवल किराए बढ़ा रही सेवाएँ नहीं’ आम आदमी और विपक्ष को इसका कड़ा विरोध करना चाहिए।पिछले सत्तर साल में जब-जब किराया बढ़ता था तब-तब उस सरकार के कान उमेठे जाते थे. पिछले चुनाव के पहले सत्ता के आकांक्षी राजनीतिक दल रेल किरायों को लेकर तरह-तरह के वायदे किया करते थे. सत्ता सौंपने के बाद अब लोग उनसे पूछ रहे हैं कि उन वायदों का क्या हुआ. खासतौर पर रेल में सफर को सस्ते सरकारी यातायात का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता था. मौजूदा सरकार का बड़ा दिलचस्प तर्क है कि ऊंचे दर्जे का किराया पहले से ही ज्यादा है. यानी औसत जनता से ही ज्यादा वसूली की गुंजाइश इस सरकार को दिखाई दे रही थी. पता नहीं यह क्या चक्कर है, लेकिन इतना तय है कि महंगाई से जूझती और नाकाम होती जा रही सरकारी योजनाओं के कारण आमदनी से छीजती जनता पर रेल किराये का यह बोझ महंगाई को और ज्यादा महसूस कराने वाला होगा।

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