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आम चुनाव पर सबकी नजरें

Posted On: 20 May, 2019 Others में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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आज लोकतंत्र के महापर्व का सभी सातों चरण खत्म हो गया। देश की सम्मानित जनता ने अपना मत EVM में कैद कर दिया। दिनांक 23 मई को जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधित्व का प्रणाम देश के सामने होगा इस के लिए देश और देश की सम्मानित जनता को ढेरों शुभकामनाएं देती हुँ ।
ये चुनाव अपने आप मे ऐतिहासिक रहा कई क्षेत्रों में जैसे जो देश और समाज का मुद्दा था बेरोजगारों को रोज़गार देने का, किसानों को उसके मेहनत का फल देने का, शिक्षा/चिकित्सा के दिशा में बेहतर काम करने का, कालाधन लाने का, महंगाई कम करने का, महिलाओं को सशक्त व सुरक्षित करने का, भ्रष्टाचार और आतंकवाद/नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने का जैसे वादे और मुद्दे सिरे से केंद्र द्वारा गायब कर दिए गए। जैसे देश इन सारी परेशानियों से आज़ाद हो गया हो। सारे TV चैनल शाम 4 बजे से दुकानें सजा कर बैठे हैं। जो माल बेच रहे हैं वो किसी काम का नहीं है। ना तो वो खबर है और ना ही मनोरंजन। सारे कयास हैं, वो भी दलालों के। 3 दिन बाद असली नतीजे आ जाएंगे। नकली नतीजे देख क्या हो जाएगा ? इतने दिन प्रतीक्षा की है तो 3 दिन में प्राण तो सूख नहीं जाएंगे एग्जिट पोल नही बल्कि ये भाजपा पोल है जो 23 मई को बेनकाब हो जायेगा। लोकसभा चुनाव के नतीजों से पहले एक्ज़िट पोल सामने आ रहे हैं. लगभग सभी एक्ज़िट पोल्स ने एक बार फिर मोदी की सत्ता में वापसी तय बताई है। टीवी से लेकर मोहल्ले तक में इन नतीजों पर बहस जारी है लेकिन मेरा दिल इन सभी पोल्स को मानने से इनकार कर दिया है। मैं एग्जिट पोल गॉसिप में भरोसा नहीं करता हु। इस गॉसिप के जरिए हजारों ईवीएम में हेरफेर करने या बदलने का गेम प्लान है। Exit Poll होता है उपभोक्ता वर्ग की पार्टी को जीतते दिखाना उनकी व्यवसायिक मजबूरी है। अगर उपभोक्ता वर्ग की पार्टी हारती है तो लोग निराशा में टीवी ही बंद कर देंगे। टीवी बंद तो TRP डाउन। Exit Poll पर उनका जोश और परिणाम की यह भी एक वजह है। ये चैनल्स किसके हैं क्या ये भी बताने की जरूरत है फिगर्स हकीकत से कितनी दूर हैं ये इससे ही साबित होता है कि कोई बिहार में नीतीश को 11 तो कोई 17 सीटें दे रहा है तो कोई रामविलास को 6 में से 6 , कोई मीसा भारती को हरा रहा है, कोई भाजपा को 17 में 17 , कोई एनडीए को 40 में 40 , इसबार के आम चुनाव पर अब सबकी नजरें टिकी हैं। क्या बिहार पिछला ट्रेंड अपनाता है और किसी एक गठबंधन को दो तिहाई से अधिक सीटें वोटर देते हैं या फिर कोई नई कहानी लिखी जाती है। वैसे इस बार दोनों ही मुख्य गठबंधन एनडीए और महागठबंधन ने अपनी-अपनी जीत पक्का करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं दस तो कांग्रेस अध्यक्ष राहलु गांधी बिहार में छह चुनावी सभाएं की हैं। राहुल गांधी ने पटना में रोड शो भी किया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भी पटना में रोड शो हुई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और राजद नेता तेजस्वी प्रसाद यादव समेत दोनों गठबंधनों के तमाम बड़े नेता बिहार में जमकर सभाएं की हैं। देखना दिलचस्प होगा, ऊंट किस करवट बैठेगा। पूरी कहानी पहले से तैयार थी तभी तो 300 पार की रट लगाये हुए थे. इस देश में 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होने वाला है ये सिर्फ दो व्यक्ति को पता है वो है मोदी और अमितशाह आपको थोड़ा अटपटा लग रहा होगा लेकिन यही सच्चाई है , मोदी ने इस बार के चुनाव में उस ट्रेंड को बदल दिया जिसमें पीएम कि सभा वहीं करायी जाती थी जहां जीत सुनिश्चित रहता था मोदी औऱ अमितशाह सचिन और लारा कि जोड़ी कि तरह विपरित परिस्थिति में भी सर्घष जारी रखा वही विपंक्ष इस बार चुनाव लड़ते दिखा ही नहीं कांग्रेस 2024 के लिए चुनाव लड़ रहा था औऱ यही हाल राजद का था वो भी 2020 के विधानसभा चुनाव कि तैयारी कर रहा था इन सबके बावजूद जनता मोदी से आमने सामने लड़ाई लड़ा है और यही वजह है की टीम मोदी भी सहमा हुआ है बिहार और झारखंड में क्या रिजल्ट होगा कहना मुश्किल है सारे ओपेनियन पोल कि हवा निकल जाये तो कोई बड़ी बात नहीं होगी मोदी विरोध का एक एक वोट चाहे वोटर भेटिलेटर क्यों ना हो मतदान केन्द्र पर आकर अपने वोट का उपयोग किया है हम पत्रकार इस वोटिंग ट्रेंड को नहीं समझ रहे हैं लेकिन मोदी टीम इस वोटिंग ट्रेंड से सहमा हुआ है गैंंस, आवास और शौचालय योजना दलित और कमजोर वर्ग के वोटर को कितना प्रभावित किया है इसका आकलन वोट खत्म होने के बाद भी नहीं हो पा रहा है, ये सूनामी का संकेत हैं अगर ये वोटर मोदी के साथ गया है तो बिहार , झारखंड औऱ यूपी में विपंक्ष का सुपरा साफ हो जायेगा औऱ परिणाम 1977 ,1989 कि तरह 54 में 54 और यूपी में 80 में 80 होगा अगर ऐसा नहीं है तो फिर 2014 के मोदी वेभ में बिहार में 31 ,झारखंड में 12 और यूपी में 73 सीट के आसपास कि छोड़िए इन्ही तीन राज्यों में बीजेपी को इतना नुकसान हो जायेगा कि उससे बाहर निकलना मुश्किल हो जायेगा । वैसे अभी तक जो 8 ओपेनियम पोल आये हैं उनमें से 6 ओपेनियन पोल दिखा रहा है कि बीजेपी को 2014 कि तुलना में 10 से 80 सीट कम आयेगा , मतलब बीजेपी इस बार अपने दम पर सरकार नहीं बना पायेगी सिर्फ दो ऐंजसी चाणाक्य और इंडियाटुडे दिख रहा है कि बीजेपी खुद 300 सीट जीत रही है । इस ओपेनियन पोल से एक औऱ संकेत मिल रहा है कि मोदी बनाम अन्य के बीच जिस तरीके से चुनाव कराने कि कोशिश मोदी टीम के द्वारा कि गयी उसका बहुत लाभ होता नहीं दिख रहा है ,बीजेपी या एनडीए जहां कही भी चुनाव हारती दिख रही है उसमें स्थानीय सांसद के खिलाफ आक्रोश एक बहुत बड़ी वजह है ।देखिए आगे आगे होता है क्या लेकिन ये तय है कि इस बार कुछ अप्रत्याशित होने वाला है इस पार नहीं तो उस पार ,बीच का मामला नहीं रहेगा यह भी तय मानिए । 2019 के महासंग्राम में 23 मई के नतीजों का इंतजार अभी बाकी है लेकिन लगभग सभी एग्जिट पोल कह रहे हैं कि एनडीए आसानी के साथ सरकार बनाने जा रही है। यूपीए को 2014 के मुकाबले भले थोड़ा फायदा पहुंचता दिख रहा हो लेकिन बहुमत के आंकड़े से वो बहुत-बहुत दूर है।
2014 के एग्जिट पोल में सबसे सटीक भविष्यवाणी करने वाले न्यूज 24-चाणक्य के पोल में एनडीए को पहले से भी कहीं ज्यादा यानी 350 सीटें मिलने जा रही हैं। वहीं यूपीए को 95 और अन्य को 97 सीटें दिखाई गई हैं।
क्या असली खेल EVM है ? क्या पैसे देकर EXIT POLL कराया गया? यू पी, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली, बंगाल हर जगह BJP ही जीत रही है ये कौन यक़ीन करेगा? एक्ज़िट पोल का यह इतिहास रहा है कि वह 99•99% भाजपा के पक्ष में रहा है। कारण स्पष्ट है कि सर्वे कराने वाली एजेन्सीज़ को भाजपा सालों साल काम और दाम देती है और अपने मनपसंद का ओपीनियन और ऐक्जिट पोल कराकर उसे चैनलों पर प्रसारित कराती है और देश में अपने पक्ष में माहौल बनवाती है। 23 तारीख़ को जब तक चुनाव के नतीजे नहीं आ जाते तब तक मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि भारतीय जनता पार्टी और एनडीए को 300 से ज़्यादा सीटें मिल रही हैं, जैसा कि तमाम एग्ज़िट पोल बताने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ एग्ज़िट पोल तो इतने उत्साह में दिखे कि उन्होंने एनडीए को 350 से ज़्यादा सीट मिलने की बात कही। सारे के सारे राजनीतिक पंडित और विश्लेषक परले दर्जे के बेवकूफ़ साबित हुए। अगर 23 तारीख़ को यही नतीजे आते हैं तो फिर यह समझ लेना चाहिए कि हिंदुस्तान पूरी तरीके़ से बदल गया है और वह नरेंद्र मोदी नाम के एक जादूगर के इशारे पर नाचता है। मैं फिलहाल, यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि हिंदुस्तान को कोई अपनी उंगलियों पर नचा सकता है।मुझे, एग्ज़िट पोल के इन आंकड़ों पर क़तई यकीन नहीं है यह बात भी गले नहीं उतरती कि नया बना हिंदू वोट बैंक आर्थिक मजबूरियों को पूरी तरीके़ से नकार देता है। 2014 के बाद से देश की अर्थव्यवस्था में काफ़ी गड़बड़ी आई है। बेरोज़गारी भयानक तौर पर बढ़ी है। एनएसएसओ के मुताबिक़, बेरोज़गारी के आंकड़े पिछले 45 सालों में सबसे ऊँचे पायदान पर हैं। सीएमआई के मुताबिक़, अप्रैल के तीसरे हफ़्ते में बेरोज़गारी का आंकड़ा 8.4% था। सरकार ने रोज़गार के आंकड़े देना भी बंद कर दिया है बेरोज़गारी के साथ-साथ, औद्योगिक उत्पादन में भी गिरावट आई है। मैन्युफ़ैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर का बुरा हाल है। गाँव-देहात में ख़पत में कमी आई है और लोगों की क्रय शक्ति कम हुई है। हाल ही में ऑटो सेक्टर में आई मंदी इस बात का ताज़ा प्रमाण है। मारुति कारों की बिक्री में 20 प्रतिशत की कमी आई है। सैकड़ों कार डीलरों ने अपनी दुकानें बंद कर दी हैं या बंद करने की कगार पर हैं। यह वही मोदी थे जिन्होंने 2014 में हर साल 2 करोड़ रोज़गार देने का वादा किया था और हिंदुस्तान के हर व्यक्ति को यह भरोसा दिलाया था कि उनकी परेशानियाँ चुटकी बजाते ही हल हो जाएँगी। लेकिन 5 साल बाद चुनाव के दौरान मोदी जी बदले-बदले से नज़र आए। न उन्होंने रोज़गार की बात की और न ही उन्होंने कहा कि देश आर्थिक सुपर हाईवे पर सरपट दौड़ रहा है। यह दावे ज़रूर किए गए कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से भागने वाली अर्थव्यवस्था है। लेकिन उसके जीडीपी के आंकड़े भी अब संदेह के घेरे में आ गए हैं क्योंकि यह ख़ुलासा हुआ है कि जिन कंपनियों के आधार पर जीडीपी निकाली गई उनमें से 39 फ़ीसदी कंपनियाँ फ़र्जी हैं। ऐसे में यह कह पाना बहुत मुश्किल होगा कि आम आदमी मोदी के कार्यकाल में इतना ख़ुश हो गया है कि उसने छप्पर फाड़ के बीजेपी को वोट दिया है। एग्ज़िट पोल करने वाले तो यह मान सकते हैं लेकिन मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ। देश के लोकतंत्र के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं होगी। सरकार बीजेपी की हो या कांग्रेस की या फिर तीसरे मोर्चे की, लोकतंत्र में लोगों की आस्था किसी भी तरीक़े से कम नहीं होनी चाहिए लेकिन अगर आर्थिक मोर्चे पर सरकार के नाकाम रहने के बाद भी चुनाव नतीजे ऐसे आते हैं जिस पर लोगों को स्वाभाविक रूप से विश्वास नहीं होता तो फिर पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ जाती है। जहां 2014 में मोदी सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे पर अपने प्रचार को आगे बढ़ाती दिखी थी वहीं इस बार नाम के आगे ‘चौकीदार’ लगाने से लेकर ‘आएगा तो मोदी ही’ जैसे तमाम वाक्यों को प्रचार अभियान का हिस्सा बनाया गया। नरेंद्र मोदी ने देश भर में करीब डेढ़ लाख किलोमीटर की यात्रा की और 142 रैलियों को संबोधित किया। जहां राहुल गांधी ‘चौकीदार चोर है’ के साथ अपना अभियान आगे बढ़ाते रहे वहीं मोदी ने तमाम रैलियों में ये कहते हुए इसे भुनाया कि ‘मैं गाली को गहना बना लेता हूं।’ये चुनाव इस लिए भी ऐतिहासिक माना जाएगा क्योंकि भारत के इतिहास में पहली बार कोई प्रधानमंत्री बिना मीडिया कॉन्फ्रेंस के जवाब दिए अपना कार्यकाल समाप्त कर दिया। देश अचंभे में है जो प्रधानमंत्री इतना बोलता है माइक के सामने वो पत्रकारों के सवाल पर उसकी जवाबदेही अपने मित्र व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह पर क्यों डाल दिया? क्या प्रधानमंत्री को जवाब देने नही आता है या प्रीप्लांड इंटरव्यू होने के बावजूद बड़बोले में गलत जवाब देने वाले अपनी आदतों की डर से मीडिया कॉन्फ्रेंस में सीधा जवाब देने से मना कर दिया। जनता ने मोदी मंत्रिमंडल के 5 साल देखें देश मे भारी आक्रोश है फ़र्ज़ी डिग्री फर्जी भाषण जैसे मुद्दे ने देशवासियों को अपमानित करने का काम किया है। जनता ने बदलाव की नीयत से अपना मत दे दिया है। मुझे पूरी उम्मीद ये है़ के इस बार जनता ने इस सरकार को उखाड़ फेंकने का काम किया होगा। देश मे जिस तरह से संविधान विरोधी गतिबिधिया हुई है जिस प्रकार से संविधान को खत्म करने के काम हुए हैं जनता इस संविधान विरोधी को रोक संविधान के रक्षा करने वाली पार्टियों बाबा साहेब और महात्मा गाँधी के विचारों को आगे बढ़ाने वाली पार्टियों नेताओं को अपना मत देना का काम की होगी। मैं फिर से देश की सम्मानित जनता को संविधान की रक्षा के लिए उठाए गए कदम को नमन करती हूँ और पूरे विश्वास से आशा करती हूँ इस बार संविधान के रक्षक बाबा साहेब के मार्गदर्शन पर चलने वाले कि सरकार बनेगी और देश की जनता को उसका अधिकार मिलेगी। मैं, किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले 23 मई को आने वाले चुनाव परिणामों को देखना पसंद करूंगा और फिर उसके बाद यह कहने की स्थिति में रहूँगा कि क्या राजनीतिक पंडित ग़लत थे जो जनता का मूड भांपने में नाकाम रहे या फिर कुछ दूसरे बाहरी कारण चुनाव को प्रभावित कर रहे थे।

सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

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