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चुनावी मैदान में कन्हैया कुमार

Posted On: 29 Apr, 2019 Politics में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में आगामी 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिये प्रचार कार्य शनिवार शाम छह बजे थम गया गया है. इस चरण में 9 राज्यों की 71 सीटों के लिए मतदान होगा. इस चरण का मतदान तय कर देगा कि केंद्र में किसकी सरकार बनने वाली है. लेकिन यह चरण काफी कुछ साफ कर देगा कि केंद्र में किसकी सरकार आने जा रही है. बात करें बिहार की पांच लोकसभा (दरभंगा, उजियारपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय और मुंगेर) सीटों के लिये मतदान होगा . मतदान सुबह सात बजे शुरू होकर शाम छह बजे तक होगा. बिहार में चौथेचरणके मुख्य प्रत्याशियों पर नजर डालें में दरभंगा लोकसभा सीट पर भाजपा के गोपालजी ठाकुर और राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी में टक्कर की स्थिति बन रही है। उजियारपुर संसदीय क्षेत्र में रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एवं मौजूदा सांसद नित्यानंद राय के बीच लड़ाई है। समस्तीपुर में मौजूदा सांसद रामचंद्र पासवान और कांग्रेस के अशोक राम ताल ठोक रहे हैं।बेगूसराय में त्रिकोणीय लड़ाई है। भाजपा के केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह जबकि सीपीआइ से कन्हैया कुमार और राजद ने तनवीर हसन की प्रतिष्ठा दांव पर है। मुंगेर में जदयू की ओर से राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह और कांग्रेस से मोकामा विधायक अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी के बीच लड़ाई है।
बेगूसराय के इस चुनाव में दिल्ली भी है और मास्को भी। ‘दिल्ली और मास्को दिनकर की बहुचर्चित कविता थी। उस समय की इस कविता का अर्थ इस चुनाव में बदले अर्थों में कायम है। चुनावी रण में राष्ट्रीय आकर्षण का केंद्र बनी बेगूसराय सीट से राष्ट्रकवि दिनकर का जुड़ाव उनकी जन्मभूमि के कारण तो है ही, उनकी रचनाओं की पृष्ठभूमि में भी यह इलाका गहरे समाया हुआ है। मौसम के रूख के साथ राजनीति का रूख भी बदलना शुरू हुआ है. जैसे-जैसे सर्दी से बसंत की तरफ़ बढ़ रहे हैं, तापमान भी बढ़ता जा रहा है. बात बस इतनी कि दिनकर ने जब ‘दिल्ली और मास्को कविता लिखी तब भी बौद्धिक और वैचारिक संकट का क्षण था और इस चुनाव में भी यहां के राजनीतिक दल के एजेंडा में राष्ट्रवाद बनाम फर्जी राष्ट्रवाद है। गिरिराज टुकड़े-टुकड़े गैंग से सावधान कर रहे हैं। वंदेमातरम् का ओज भर रहे हैं। उधर, तेजस्वी संविधान के नष्ट होने के खतरे का समय बता रहे हैं। कन्हैया जोर देकर कह रहे हैं कि टुकड़े-टुकड़े गैंग कहना देश के मुद्दों से ध्यान भटकाने का शब्द स्वर है। कन्हैया इसे फर्जी राष्ट्रवाद घोषित करते हैं। कन्हैया का नारा है: ‘लूटतंत्र, भीड़ तंत्र और नोट तंत्र के खिलाफ उनकी लड़ाई है। बेगूसराय की यही है मांग सबको शिक्षा, सबको काम, मजदूर को उचित मजदूरी, किसान को फसल का दाम।

बेगूसराय : बिहार के लेनिनग्राद के नाम से मशहूर बेगूसराय में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, कन्हैया कुमार और आरजेडी के तनवीर का मुकाबला है. नवादा से बीजेपी सांसद गिरिराज सिंह पहले यहां से चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन बाद में उनको पार्टी का आदेश मानना पड़ गया. वहीं जेएनयू छात्र संघ के नेता रहे कन्हैया कुमार सीपीआई के टिकट से चुनाव मैदान में है. मीडिया में काफी सुर्खियां बटोर चुके कन्हैया कुमार को अब जमीनी हकीकत का सामना करना पड़ा है. वहीं तनवीर हसन के पास मुस्लिमों का ठोस वोट है और बीते चुनाव में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया था. तनवीर हसन भाजपा को आरक्षण और संविधान विरोधी करार देते हैं। अपने आधार वोटरों को याद करा रहे हैं कि लालू प्रसाद ने उन्हें बोलने का अधिकार दिलाया। तटस्थ हैं तनवीर। पिछले चुनाव में भी मैदान में डटे थे और करीब-करीब पौने चार लाख वोट उनके खाते में थे। उनको अहसास है कि हरा कपड़े पर पाबंदी की मांग का असर उनके आधार वोटरों को गोलबंद करेगा। आप सिर्फ़ बेगुसराय ही नहीं बल्कि पूरे बिहार की एक मशहूर सियासी व समाजी शख़्सियत के मालिक हैं, आप बहुत शिक्षित और विवेकशील इंसान है। आप सियासी लीडर होने के साथ साथ एक अच्छे इंसान भी हैं। आपके सीने में एक ऐसा दिल है जो क़ौम के लिए तड़पता है। और एक ऐसा दिमाग़ है जो समाज के उत्थान और तरक़्क़ी के लिए सोचता है। मजलूमो पीड़ितों और परेशान हाल लोगों की खबरगीरी करना आपकी पहचान है। बेगुसराय के लिए आपकी जो क़ुर्बानियाँ हैं उनको भुलाया नही जा सकता। आपकी सेवाओं को भुलाना नामुमकिन है। बेगुसराय के लोग भी आपसे बहुत मोहब्बत करते हैं उनके दिल में आपके लिए बहुत आदर और सम्मान है।
पिछले लोकसभा चुनाव में लोगों ने आपको दिल खोलकर वोट दिया और आपकी सफलता के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन शायद क़ुदरत को मंज़ूर नही था। और आप कुछ ही अंतर से बाज़ी हार गये। इसके बावजूद लोगों के दिलो में आपके लिए आदर और सम्मान में कोई कमी नही आई और न ही आपकी तरफ़ से मोहब्बत और प्यार में कुछ कमी महसूस हुई बेगुसराय के लिए आपकी सेवाएँ पहले की तरह जारी हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्के समर्थक, कट्टर हिंदूवादी चेहरा, विवादित बयान और विरोधियों को बात-बेबात पाकिस्तान भेजने का बयान देने वाले गिरिराज सिंह की छवि भाजपा के फायरब्रांड नेता की बनी है। साल 2014 में नवादा से पहली बार सांसद बनने के बाद मोदी सरकार में मंत्री बने गिरिराज सिंह इस बार बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। गिरिराज सिंह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्के समर्थक माने जाते हैं। चुनावी सभाओं में अपने विवादित बोल के कारण गिरिराज सिंह इन दिनों देश-प्रदेश में चर्चा के केंद्र में हैं। भाजपा के प्रत्याशी गिरिराज सिंह का जो पुराना तेवर है, वह कायम है। अपनी उग्रवाणी से वह रोज-रोज नया वितंडा रच लेने के अपने मकसद से सुॢखयां बटोर ले रहे हैं।

कन्हैया केवल नाम नहीं बल्कि जुल्म के खिलाफ देश की आवाज है। वह गरीबों, मजलुमों, अल्पसंख्यकों तथा दलितों के ह़क की लड़ाई लड़ रहा है। सांसद का यह चुनाव उसकी पहली कड़ी है। आज देशभर के लोग बेगूसराय आकर कन्हैया को वोट देने की चाहत रखते हैं। बेगूसराय में चुनाव प्रचार के दौरान स्टार पावर का जबरदस्त जमावड़ा देखने को मिला. सीपीआई कैंडिडेट और जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार में सिनेमा, कला, शिक्षा और राजनीतिक जगत की हस्तियों ने प्रचार किया. इस सियासी मुकाबले में कन्हैया कुमार अकेले नहीं हैं, बल्कि देश के कोने-कोने से लोग उनके पास पहुंचे हैं. बेगूसराय में कन्हैया का मुकाबला बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से है. इसके अलावा आरजेडी कैंडिडेट तनवीर हसन भी बीजेपी और सीपीआई को तगड़ी चुनौती दे रहे हैं. बेगूसराय के मतदाता खुशकिस्मत हैं कि उनकी धरती ने कन्हैया जैसे सपूत को जन्म दिया है। आप सांसद नहीं भविष्य का प्रधानमंत्री चुनने जा रहे हैं। आप कन्हैया को विजयी बनाकर संसद भेजिए। वह जिस दिन संसद में भाषण देंगे, आप यकीन मानिए मोदी उस दिन संसद नहीं आएंगे। कन्हैया देश की आवाज हैं और आप का आशीर्वाद मिला तो यह आवाज संसद में गुंजेगी।
1980 से 2014 के बीच बेगूसराय सीट पर दस बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं. 2009 में मोनाजिर हसन की उम्मीदवारी को छोड़ दें तो अब तक बेगूसराय सीट पर भूमिहार नेता ही सांसद चुने गए हैं। सिर्फ़ 2009 के चुनावों में ऐसा मौक़ा आया जब बेगूसराय को एक मुस्लिम सांसद मिला. ये सांसद थे नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड से डॉ. मुनाजिर हसन. बेगूसराय में चाहे जो जीते लेकिन यहां लोग इस बात का पूरा श्रेय दे रहे हैं कि कन्हैया कुमार के कारण शहर की चर्चा देश भर में हो रही है। यहां के अच्छे होटलों में जगह नहीं है। कन्हैया के कारण शहर में सैकड़ों ऐसे लोग पहुंचे हैं जो इससे पहले कभी बिहार नहीं आए। यहां तक कि विदेशी रिसर्चर भी पहुंचे हैं और कन्हैया के चुनावी अभियान को क़रीब से देख रहे हैं। कन्हैया जातीय वोट बैंक को तोड़ते दिख रहे हैं और उन्हें हर जाति से वोट मिलेगा। संभव है कि कन्हैया को सबसे कम वोट उनकी अपनी जाति भूमिहार से मिले। ‘मुसलमान कन्हैया को लेकर बहुत आशान्वित हैं। कन्हैया को ये ध्यान से सुन रहे हैं। मन में पसोपेश की स्थिति ज़रूर है। लेकिन इतना तय है कि 50 फीसदी से ज़्यादा मुसलमानों का वोट कन्हैया को जरूर मिलेगा। बेगूसराय में मुसलमान वोटरों की तादाद लगभग तीन लाख है। यहां किसी एक जाति में भूमिहार सबसे बड़ा तबका है। भूमिहार वोटर चार लाख से ज़्यादा हैं। भूमिहारों के बाद दलित वोटर सबसे ज़्यादा हैं। कन्हैया को अपनी जाति से बहुत ज़्यादा वोट नहीं मिलेगा। बेगूसराय के आम मुसलमान आरजेडी उम्मीदवार तनवीर हसन के साथ रहने की बात तो करते हैं लेकिन कन्हैया की भी तारीफ करते हैं। कन्हैया निर्दलीय रहते तो ज़्यादा अच्छा होता’ कन्हैया को सीपीआई से नहीं लड़ना चाहिए था। वो निर्दलीय रहते तो ज़्यादा अच्छा होता।’बेगूसराय में ग़ैर-भूमिहारों में कन्हैया की छवि अच्छी है लेकिन उनकी पार्टी की छवि अच्छी नहीं है। यहां तक कि मुसलमानों में भी सीपीआई की छवि बहुत अच्छी नहीं है। सीपीआई यानी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की छवि गैर-भूमिहारों में ऊंची जाति की पार्टी के तौर पर है। बेगूसराय में अभी की सीपीआई की कमान के लिहाज देखें तो ये बात सही भी लगती है। अभी हाल ही में तेजस्वी ने कहा कि बिहार में वर्तमान सीपीआई एक जिले और एक जाति की पार्टी है। कन्हैया का कोई वोट बैंक नहीं है। वोट बैंक है तनवीर हसन और बीजेपी का। कन्हैया वोट बैंक की राजनीति को तोड़ रहा है और यह अब दिखने भी लगा है। आपको बता दें कि बिहार में महागठबंधन इस बार के लोकसभा चुनाव में 40 सीटों पर एनडीए को सीधी टक्कर दे रहा है। हांलाकि गठबंधन राजनीति के दबाव और व्यक्तित्वों के टकराव की वजह से बिहार के कई संसदीय क्षेत्रों में मुकाबला पेचीदा हो चुका है। जहां तक बिहार की बात है सीपीआई-सीपीएम जैसे वामपंथी पार्टियों का महागठबंधन से बाहर रह जाना विपक्ष के लिए कुछ सीटों पर भारी पड़ सकता है। इसी क्रम में हम बात करने जा रहे हैं कि बिहार की बेगूसराय संसदीय क्षेत्र की जहां से कन्हैया कुमार ने बतौर सीपीआई उम्मीदवार नामांकन दाखिल किया है। भाजपा से गिरिराज सिंह, राजद के तनवीर हसन और सीपीआई के कन्हैया कुमार की दावेदारी के चलते बेगूसराय में मुकाबला अब त्रिकोणीय हो चुका है। इतना ही नहीं यह संसदीय क्षेत्र देश की हॉट सीट्स में शुमार हो गया है। सियासी गलियारे में चर्चा है कि बेगूसराय से कन्हैया के जीतने से राजद नेतृत्व विशेषकर तेजस्वी यादव की चमक राष्ट्रीय फलक पर मंद पड़ जाएगी। इस सवाल पर तेजस्वी यादव कहते हैं कि अभी कन्हैया कुमार कौन से पद पर हैं। जब से वो जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं, तबसे वो वोकल हो गए हैं। मतलब यदि वो सांसद नहीं बनेंगे तो क्या समाप्त हो जाएंगे। यह बात समझने की जरूरत है। यह बात केवल विरोधी फैलाते हैं। क्या बाल ठाकरे कभी चुनाव लड़े थे, क्या कभी मुख्यमंत्री रहे थे बावजूद इसके महाराष्ट्र की राजनीति में उनका गहरा प्रभाव था। हमारे देश में ऐसे कई नेता हुए हैं जो परदे के पीछे रहे और उनका ग़ज़ब का फॉलोविंग भी रहा है। केवल पद मिल जाने से कोई नेता नहीं हो जाता। जहां तक कन्हैया कुमार की बात है, उनसे मेरी कोई समानता नहीं है। मेरे और उनके काम करने में बहुत अंतर है। बेगूसराय में कन्हैया कुमार को राजद की तरफ से समर्थन नहीं मिलने के मसले पर तेजस्वी यादव यह कहना नहीं भूलते हैं कि कन्हैया के नाम की घोषणा महागठबंधन में सब कुछ तय हो जाने के बाद हुई थी। चूंकि बेगूसराय सीट राजद की परंपरागत सीट रही है। यह क्षेत्र समाजवादियों का गढ़ रहा है। साल 2014 में मोदी लहर के बावजूद तनवीर हसन को क़रीब पौने चार लाख वोट मिले थे। तनवीर हसन बहुत कम वोटों से चुनाव हारे थे। इसके अलावा बेगूसराय में कार्यकर्ताओं का भी भारी दबाव था कि तनवीर हसन को पार्टी उम्मीदवार बनाए। चूंकि तनवीर हसन राजद के प्रदेश उपाध्यक्ष भी हैं, इसलिए उनमें हमें कोई कमी नजर नहीं आती। तेजस्वी यादव कहते हैं कि हमारी पार्टी का एक ही मकसद है भाजपा को हराना। बेगूसराय से तनवीर हसन चुनाव जीतने जा रहे हैं। हम लोग राजद को जीताने और लालू जी को न्याय दिलाने के लिए एक पांव पर खड़े हैं।बेगूसराय की अवाम से अपील है कि वे तनवीर हसन को जिताएं और एक अच्छे व सच्चे इंसान को सांसद बनाएं. बेगूसराय में जावेद अख्तर आए और उन मुसलमानों को भाजपा का एजंट बता कर चले गए जो तनवीर हसन के साथ है. मुसलमान चुप रहे क्योंकि कुछ लोग कन्हैया के पक्ष में है. तीन तलाक पर नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना करने वाले मुसलमानों ने जावेद अख्तर से सवाल क्यों नहीं किया कि तीन तलाक का समर्थन वे क्यों कर रहे हैं. कन्हैया कुमार से भी सवाल करें कि तीन तलाक पर उनकी क्या राय है. यह वक्त सोचने का है, जज्बात में बहने का नहीं है. आज ही किसी ने मुझे व्हाट्सअप पर संदेश भेजा था कि एक कन्हैया ने मुसलमानों की एकता को खंडित कर डाला है. सोचें आप भी. कन्हैया की आवाज का मैं भी कायल हूं लेकिन सवाल वोट का है तो हम बिहार में महागठबंधन के साथ पूरी ताकत के साथ खड़े हैं. कन्हैया बेगुसराय में गिरिराज सिंह से कहीं ज्यादा तनवीर हसन साहब का वोट काट रहा है, और आपको ऐसा लगता है कि कल का छात्र नेता भविष्य मे गरीबों का मसीहा बनेगा तो आप गलत फहमी में हैं, लेफ्ट से शुरुआत हुई है कल को किसी भी पार्टी में आप इन्हें देख सकते हैं ।बेगूसराय में अल्पसंख्यक समाज कन्हैया को सपोर्ट करने को तैयार है। बहुसंख्यक क्यों नहीं ? कन्हैया का पूरा फोकस मुस्लिम वोट पर है जबकि वहां पर सबसे ज्यादा वोट भूमिहार का है कन्हैया का प्रचार में भूमिहार जाती पर कोई फोकस नही है जबकि कन्हैया खुद भूमिहार जाती से आता है । दोस्तो भूमिहार जाती पूरे तरह से भाजपा के साथ है बेगूसराय में भूमिहार वोटर 15.68 प्रतिशत, मुसलमान 13.69 प्रतिशत, यादव 8.48 प्रतिशत, कुर्मी 6.53 प्रतिशत, धानुक 3.07 प्रतिशत, ब्राह्मण 2.82 प्रतिशत, कोईरी 3.63 प्रतिशत और राजपूत वोटरों की संख्या 1.60 प्रतिशत है। मतलब साफ है कि कन्हैया का उद्देश्य जितने का नही है क्योंकि जितने के लिए सभी लोगो का समर्थन चाहिए होता है बिहार में लगभग 20 प्रतिशत की आबादी वाले मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को समाप्त करने की लगातार कोशिश हो रही है. सबसे मज़ेदार बात बेगूसराय लोकसभा सीट को लेकर है. बेगूसराय लेनिनग्राद के नाम से मशहूर है. बेगूसराय क्षेत्र कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ समझा जाता है. लेकिन यह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं है बिहार में कम्यूनिस्ट पार्टी के मात्र तीन विधायक हैं और तीनों में से एक भी बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से जीतकर नहीं आते हैं. यानी 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक भी क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं रहे थे. प्रश्न फिर वही है कि जिस लोकसभा क्षेत्र में एक भी विधायक नहीं है वह कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया? प्रश्न यह है कि आख़िर कम्यूनिस्ट पार्टी क्यों बेगूसराय की सीट ही लेना चाहती है? जब कम्यूनिस्ट पार्टी सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व को लेकर इतना चिंतित रहती है तब फिर क्यों बेगूसराय में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को कुचलने का अथक प्रयास कर रही है? एक तर्क है कि कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं, यह बात सही है कि कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं और कम्यूनिस्ट विचारधारा के ऊर्जावान पथिक है. वह जब राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं तब भारत के किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते थे. मोतिहारी, नवादा, नालंदा, मधुबनी, जहानाबाद तो कम्यूनिस्ट का गढ़ रहा है और पहले से भी पार्टी के सांसद निर्वाचित होते रहे हैं फिर बेगूसराय पर ही नज़र क्यों है? अरविंद केजरीवाल दिल्ली से चलकर प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध बनारस चुनाव लड़ने आए थे. फिर राष्ट्रीय स्तर के नेता कन्हैया कुमार मुसलमान समुदाय के हिस्से में वाली सीट से ही चुनावी मैदान में उतरने के लिए क्यों उतावले है? क्या सिर्फ़ इसलिए कि मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करके खुद की जीत सुनिश्चित कर सके? वक़्त तेज़ी से गुज़रता रहा यहाँ तक 2019 का चुनाव आ गया। पिछले पांच सालों के दौरान देश में जो कुछ भी हुआ है वो आज़ादी के बाद से अब तक नहीं हुआ। आर्थिक स्तर पर देश कंगाल हो गया, रोज़गार ख़त्म हो गये, मंहगाई आसमान छू रही है झूठ,फ़रेब और भ्रष्टाचार चरम पर है। महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार और बालात्कार की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं देश का धन चंद अमीरों के हाथ में सिमट कर रह गया है और सबसे बढकर यह कि देश में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच नफ़रत की दीवार खड़ी कर दी गई। हर तरफ़ ख़ौफ़ और दहशत का माहौल क़ायम कर दिया है। मॉब लिंचिंग का एक नया अपराध अपने वीभत्स रूप में सामने आया है। पीड़ितों और दलितों की आवाज़ को ताक़त के ज़ोर पर दबा दिया गया, लोग इंसाफ़ के लिए तरसने लगे, तमाम संवैधानिक संस्थाओं को ख़त्म कर दिया गया। और ऐसा महसूस होने लगा कि देश में सकून के साथ जीना अब मुश्किल हो गया है। यही नही बड़े बड़े तालीमी इदारों को भी बर्बाद करने की कोशिश की गई है ताकि उनमें पढ़ने वाले ग़रीब और पिछड़ो को आगे बढ़ने से रोका जाए। अब ऐसा लगने लगा है कि देश फिर ग़ुलामी के दौर में पहुँच गया जहाँ हक़ और इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करना एक जुर्म समझा जाने लगा है ऐसे ख़ौफ़नाक हालात में कन्हैया कुमार मजलूमो, पीड़ितों और दबे कुचले जनता की आवाज़ बनकर सामने आया है। और उसने ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ ऐसा नारा लगाया कि पूरी दुनिया में धूम मच गई, सत्ता में बैठे जालियों की नींद उड़ गई। यह पहला मौक़ा था जब मीडिया ने यह बात स्वीकार की कि मोदी सरकार हिल गई और उसको हिलाने वाला कोई और नहीं बल्कि कन्हैया कुमार था जो देखने में एक मामूली नौजवान लगता है लेकिन अपनी ज़ेहानत, हाज़िरजवाबी और अपने बोलने की कला, राजनीतिक सूझबूझ, हिम्मत और मझे हुए सियासतदां के तौर पर उसने अपनी पूरी ताक़त के साथ ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की। वो मजलूमों का ऐसा हीरो बन गया कि भाजपा के दिग्गज नेता उसके सामने भीगी बिल्ली नज़र आने लगे। टीवी डिबेटों में उसने भक्तों को पानी पिला दिया। आख़िरकार मजबूर होकर सरकार ने टीवी चैनलों के मालिकों पर कन्हैया कुमार की बातों को प्रसारित न करने के लिए दबाव बनाया और टीवी चैनलों ने उसको कवरेज देना बंद कर दिया। लेकिन वो सोशल मीडिया में छाया रहा। सरकार ने उसकी आवाज़ जितनी दबाने की कोशिश की वो और भी लोकप्रिय होता गया और पूरी दुनिया में बेगुसराय का नाम रौशन करता रहा। फिर वो वक़्त भी आया कि जब बेगुसराय की जनता ने उसको संसद में अपना नुमाइंदा बनाने का फ़ैसला किया ताकि हक़ और इंसाफ़ की वो आवाज़ जो अब तक सड़कों पर गूँज रही थी वो लोकतंत्र के सबसे मज़बूत प्लेटफ़ार्म यानि संसद में पहुँचे और वहाँ एक ऐसा नौजवान पहुँच सके जिसके अंदर सत्ता में बैठे जालिमों की आँखों में आँखें डालकर बात करने की हिम्मत हो। यक़ीनन कन्हैया के अंदर ये क्षमता है इससे कोई इंकार नही कर सकता। पूरे देश के मजलूमों का ये ख़्वाब है कि बेगुसराय का ये नौजवान संसद में पहुँचकर हक़ और इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करे। चूँकि ये मजलूमो की कामना है इसलिए उम्मीद है कि यह कामना ज़रूर पूरी होगी।

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