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गठबंधन की राजनीति निश्चित ही देश की राजनीति के लिए आईना है।

Posted On: 10 Apr, 2019 Politics में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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2019 के चुनावी महाभारत की तरफ़ दुनियाभर की नज़रें हैं। देश का 17वां लोकसभा चुनाव क्या रूप धारेगा, इस पर राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं, हर बुद्धिजीवी चिंतित है, कि क्या 2019 का चुनाव यह तय करेगा कि देश के सेक्यूलर मूल्य बरकरार रहेंगे या यहां भगवा विचारधारा का बोलबाला होगा? क्या ये लोकसभा चुनाव ये भी तय करेगा, कि देश का बहुसंख्यक हिन्दुत्व का अलंबरदार होगा या उसे हिन्दुस्तान की गंगा-जमनी संस्कृति को बचाने की फिक्र होगी। हालांकि बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने एक नई थ्योरी पेश की है, कि 2019 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद देश में चुनाव ही नहीं होंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दुस्तान पूरे तौर पर भगवा तानाशाही के प्रभाव में रंग जाएगा। इसलिए देश की बहुरंगी संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण के लिए हर बुद्धिजीवी चिंतित है और बड़ी उम्मीदों के साथ विरोधी दलों की तरफ़ देख रहा है कि वो कब अपने राजनीतिक नफा-नुकसान और आपसी मतभेद को भूलकर हिन्दुत्व के हमले को रोकने और देश की संस्कृति को बचाने के लिए एक प्लेटफ़ॉर्म पर आते हैं, लेकिन यहां तो विपक्ष की हालत ये है, कि वो अभी तक मोदी को रोकने के लिए गठबंधन का खाका ही तैयार कर रहा है, या सीटों के जोड़-घटाव में व्यस्त है जबकि लोकसभा चुनाव की तारीख़ों का ऐलान भी हो चुका है और पहले चरण के चुनाव 11 अप्रैल को होंगे। 
यद्यपि विपक्षी दल अच्छी तरह जानते हैं कि गठबंधन की बिसात बिछाए बिना मोदी को मात नहीं नहीं दी सकती, मगर सियासत की दुम हमेशा टेंढ़ी ही रहती है, और इसी खामी की वजह से देश भारी नुकसान झेलता रहा है।

 

देश की सत्ता की बागडोर नकारात्मक शक्तियों के हाथ में जाती रही है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन तो हो गया, लेकिन कांग्रेस को इस गठबंधन से दूर रखना बीजेपी के लिए राहते जां बन चुका है। अगर यूपी में कांग्रेस भी गठबंधन में शामिल होती, तो वहां बीजेपी का सफ़ाया हो जाता। उत्तर प्रदेश से बीजेपी के सफ़ाए का मतलब है, केन्द्र से बीजेपी का ख़ात्मा। मगर सियासी धुरंधरों के अपने नफा और ज़रूरत होते हैं।

 

शुक्र है कि बिहार के गठबंधन में ये ज़रूरतें और फायदे अलग-थलग रहे और वहां पर महागठबंधन ने अपने पत्ते खोल दिए हैं, वरना सवाल उठने लगे थे, कि बिहार में सियासी दलों का अलग-अलग चुवाल लड़ने का सीधा फ़ायदा तो बीजेपी को ही पहुंचेगा, मगर लालू प्रसाद और अहमद पटेल की दूरदर्शी राजनीति से महागठबंधन अंततोगत्वा बिखराव से बच गया। लालू प्रसाद का राजनीतिक क़द भी इस गठबंधन के बाद काफी बुलंद हो चुका है। उन्होंने बिहार में महागठबंधन को टूटने से बचाकर सेक्यूलर ताक़तों की रग़ों में नई ऊर्जा भर दी है। छोटी पार्टियों को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाकर एनडीए के विजय पर ग्रहण लगा दिया है। बिहार में आरजेडी 20 और कांग्रेस 9 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि बाक़ी 11 सीटें गठबंधन में शामिल पार्टियों को दे दी गयी हैं। लालू प्रसाद की ये दरियादिली इस बात का संकेत है, कि वो हर हाल में बिहार से मोदी के क़दम उखाड़ना चाहते हैं। काश, यही दरियादिली यूपी में भी नज़र आती, तो बीजेपी की सबक लेने वाली हार इसका मुक़द्दर बन जाती। बिहार में लालू प्रसाद ने अपनी कई सीटों की क़ुर्बानी देकर महागठबंधन को मज़बूत किया है। वो इनकी दूरदर्शी राजनीति का संकेत है। जिसका नतीजा है, कि बिहार में महागठबंधन कांग्रेस के अलावा उपेन्द्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी, मुकेश साहनी और शरद यादव को साथ लेकर एनडीए को सीधी टक्कर देने की हालत में आ चुका है। बीजेपी हमेशा त्रिकोणीय मुक़ाबले का फ़ायदा उठाती रही है, मगर बिहार के महागठबंधन में अब त्रिकोणीय मुक़ाबले की गुंजाइश सीमित हो गयी है।

हालांकि बिहार में भी कांग्रेस यूपी की तरह ही कमज़ोर है, लेकिन ये लालू प्रसाद की सोच है कि उन्होंने सारी कमज़ोरियों के बावजूद कांग्रेस की अहमियत को समझा। ये इसी सोच का बहुत ही हौसलामंद नतीजा है कि आरजेडी ने कांग्रेस को 9 सीटें दी हैं और इसके उम्मीदवारों को जिताने का भी बीड़ा उठाया है। ये लालू प्रसाद के सियासी हौसले का ही करिश्मा है, कि आरजेडी की 3 सीटों पर दूसरे दलों के उम्मीदवार मैदान में हैं। लालू प्रसाद ने अपनी एक सीट सीपीआई माले को भी दे दी है। नि:संदेह आरजेडी की इस क़ुर्बानी और हौसले ने वोटों को बंटने से बचा लिया है और बड़ी पार्टियों के सामने क्षेत्रीय पार्टियों की अहमियत भी बढ़ा दी है। मुझे ये कहने में क़त्तई गुरेज़ नहीं कि कांग्रेस आलाकमान ने भी गठबंधन की अहमियत को समझा है, लेकिन इस पार्टी में कुछ ऐसे नेता भी हैं, जो पुरानी परंपराओं के पैरोकार हैं, और पुराने दौर में जी रहे हैं

 

। दिल्ली में शीला दीक्षित की वजह से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन का पेंच फंसा हुआ है। हालांकि अहमद पटेल अब भी इस पेंच को निकालने में सक्रिय हैं, और बिहार का पेंच निकालने के बाद अहमद पटेल अब दिल्ली पर ज़ोर दे रहे हैं। बिहार में महागठबंधन की तस्वीर साफ़ होने के बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति को नई ताक़त मिली है, और इसी गठबंधन का नतीजा है, कि बीजेपी के नेता शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर पटना साहिब सीट से चुनाव लड़ेंगे। बिहारी बाबू खुलकर देश में कांग्रेस की प्रचार अभियान में हिस्सा लेंगे। ये लालू प्रसाद की सियासत का नया करिश्मा है, कि उन्होंने नीतीश कुमार के अतिपिछड़ा कार्ड के जवाब में मुकेश साहनी का पत्ता फेंककर बिहार की जात-पात की राजनीतिक को नयी दिशा दे दी है। मल्लाह समाज के नौजवान नेता मुकेश साहनी की नव गठित पार्टी विकासशील इंसान पार्टी (VIP) को 3 सीटें दी गई हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री से संबंध रखने वाले बिहार के मुकेश साहनी का राज्य की बड़ी आबादी वाले मल्लाह समाज को ज़बरदस्त समर्थन हासिल है। 3 सीटें हिन्दुस्तान अवामी मोर्चा के खाते में गई हैं, लेकिन औरंगाबाद की सीट को जीतनराम मांझी को दे देने से स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं में ग़म और ग़ुस्सा है, साथ ही साथ बेगूसराय की सीट को कन्हैया कुमार को न मिलने से भी थोड़ी बेचैनी है।

मगर इन तमाम उहापोह और बेचैनी के बावजूद बिहार में महागठबंधन एक बड़ी चुनौती बनकर एनडीए के सामने खड़ा है। राष्ट्रीय राजनीति में लालू प्रसाद की सियासी क़द भी काफी ऊंचा हो चुका है, क्यों कि लालू प्रसाद के जेल में क़ैद होने के बावजूद जिस तरह बिहार में गठबंधन हुआ है, वह इनकी सियासी, आत्मविश्वास और हौसले की दलील है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है, कि लालू प्रसाद के जेल में बंद रहने से भी आरजेडी को ज़बरदस्त फ़ायदा पहुंच रहा है। लोगों में आम संदेश ये जा रहा है, कि मोदी सरकार बदले की भावना से लालू प्रसाद को जेल में क़ैद रखना चाहती है, यही संदेश बिहार की जनता में हमदर्दी की लहर बनकर दौड़ रहा है और अब तो यही लग रहा है, कि लालू प्रसाद से हमदर्दी की लहर कहीं मोदी लहर के परखच्चे न उड़ा दे। बिहार में महागठबंधन एनडीए को बैकफ़ुट पर न ला दे। लालू की गठबंधन की राजनीति निश्चित ही देश की राजनीति के लिए आईना है।

“एक हो जाएं तो बन सकते हैं ख़ुर्शीद-ए-मुबीं
वरना इन बिखरे हुए तारों से क्या काम बने”

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