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नाम मिटाकर क्या हम इतिहास को मिटा सकते हैं?

Posted On: 29 Aug, 2015 Others में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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ये किसी से छुपा नहीं है कि भारत में ऐसे लोगों का एक बड़ा वर्ग है जो मुसलमानों से जुड़ी हर चीज़ को मिटा देना चाहता है. उनके प्रतीकों, उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों को बदलना और उनके ऐतिहासिक किरदारों को मिटाना चाहता है. ऐसे में चाहे वो ताजमहल को तेजो महालय नहीं कर सकते, लेकिन औरंगज़ेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड तो कर ही सकते हैं.

ये सीधा और साफ़ संदेश है कि भारत को ईमान के पक्के मुसलमान नहीं, बल्कि नाम के मुसलमान चाहिए. जिनके लिए इस्लाम किरदार की चमक नहीं बल्कि बस विरासत में मिला एक नाम हो. इसलिए उन्हें एपीजे अब्दुल कलाम चाहिए. औरंगज़ेब नहीं चाहिए.
वो औरंगज़ेब जिसने इस मुल्क पर 49 साल शासन किया और जिसे आलमग़ीर यानी दुनिया जीत लेने वाले का ख़िताब दिया गया. वो औरंगज़ेब नहीं चाहिए जिसने टुकड़ों में बंटे भारत को एक करके हिंदुस्तान बनाया था.वो उस औरंगज़ेब के बारे में मिथक गढ़ेंगे, उसके चरित्र पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाएंगे. भले ही इस बात के कितने ही प्रमाण क्यों न हों कि औरंगज़ेब हिंदू विरोधी नहीं बल्कि इस्लाम प्रेमी शासक था. वो अपने धर्म का पक्का था, अपने ईमान का पक्का था और उसका किरदार उसकी शासन व्यवस्था में नज़र आता था.औरंगज़ेब रोड का नाम बदल कर एपीजे अब्दुल कलाम कर देने से औरंगज़ेब के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. जिस औरंगज़ेब को आरएसएस के इतिहासकार हिन्दू विरोधी कहते हैं वे यह नहीं बताते कि औरंगज़ेब ने बनारस और इलाहाबाद में हिन्दू मंदिरों को ज़मीन और धन दिया था। कहा ये जाता है कि जाजिया कर जोकि आम हिन्दुओं पर लगाया जाता था, औरंगज़ेब ने उसे ब्राह्मणों और मौलवियों पर लगाना शुरू कर दिया था जिसके बाद उसके खिलाफ अनेकों कहानियां प्रचारित की गईं। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर को खजाने से रोज़ाना चार सेर घी मिलता था जिससे वहां ज्योति जलती थी। गुवाहाटी के उमानंद मंदिर के पुजारी को ज़मीन का टुकड़ा और कुछ जंगल की जागीर दी गई ताकि धार्मिक काम में कोई रुकावट न आये। भूतपूर्व राज्यपाल उड़ीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार प्रोफ़ेसर बी एन पाण्डेय अपनी किताब ‘इतिहास के साथ यह अन्याय’ में लिखते हैं, ‘जब मैं इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ों को उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाड़ी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी।’ ये सच है औरंगज़ेब ने बनारस के विश्वनाथ मंदिर के साथ ही साथ गोलकुंडा की जामा मस्जिद को गिराने का आदेश दिया था। बनारस वाली घटना के पीछे का कारण डॉ. पट्टाभि सीता रमैय्या ने अपनी किताब ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ में बताया है कि औरंगज़ेब का काफिला बनारस में आ कर रुका और काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं की रानियाँ गंगा नहाने गईं। लेकिन उनमें से एक रानी वापस नहीं आई तो खोजबीन शुरू हुई। मालूम चला कि उसे मंदिर में कहीं छुपाया गया है। बहुत खोजने पर नहीं मिली तो गणेश जी की मूर्ति के पीछे से जाने वाली सीढ़ी से तहखाने में पहुंचा गया। वहां रानी बेसुध पड़ी थी। उसकी इज्जत लूट ली गई थी। दक्षिण से लेकर उत्तर भारत तक में मंदिरों पर हमलें धार्मिक नफरत से कम ,वहां मौजूद सोने चांदी को लूटने के लिए अधिक हुए लेकिन जिस औरंगजेब की सादगी का बखान खुद भारतीय इतिहासकार करते हुए नहीं थकते वह भला लूटने की नियत से कैसे कहीं हमला कर सकता है। औरंगज़ेब ने तो अहमदाबाद के एक व्यापारी के उस क़र्ज़ को अदा किया जो की उसके भाई ने ,खुद औरंगज़ेब के खिलाफ लड़ने के लिए लिया था। औरंगज़ेब ही था जो जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए बाज़ार में जाता था। कुरआन लिखता था और उसके पैसे से खाता था। उसकी सादगी और जनप्रियता का इससे बड़ा क्या सबूत होगा कि उसने जनता के पैसे का इस्तेमाल किसी भवन निर्माण या ऐयाशी में नहीं किया बल्कि सब लोगों पर खर्च कर दिया। वो औरंगज़ेब ही था जिसके शासन में भारत का पहला स्ट्रक्चर्ड Land Revenue & Records System तैयार हुआ। उस गूगल मैप / सेटेलाइट रहित ज़माने में अपने आधीन भूमि के हर एक टुकड़े को अलग अलग नंबर देकर पहचान देना निश्चित ही जटिल काम रहा होगा। लेकिन इसे इस पुख्तगी से अंजाम दिया गया कि अंग्रेजों ने हू ब हू वैसा ही जारी रखा। आज भी खेवत, खतौनी, मुस्तकिल, मुंदरज़ा, तहसील, चकबंदी पटवारी आदि अरबी फ़ारसी शब्दावली ही तमाम तहसील और कलक्ट्रेट परिसरों में सुनाई देती हैं। भारत में ऐसे कई गोरी गज़नी ख़िलजी आदि आए जिन्होंने यहाँ के मंदिरों को नुक्सान पहुँचाया लेकिन वो औरंगज़ेब ही था जिसने मंदिरों के साथ मस्जिदें भी गिरा दीं… तमाम दरगाहों को भी खोद दिया। हर उस जगह पर चोट की जहाँ धर्म के अलावा अन्य प्रयोजन चल रहे थे। और जहाँ दीन था धर्म था, वहां शाही खज़ाने भी खोल दिए।औरंगज़ेब रोड का नाम बदल कर अब भारत के पूर्व राष्ट्रपति रहे मरहूम डाक्टर कलाम साहब के नाम पर ”कलाम रोड” रखा जायेगा अशोका रोड, बीरबल रोड, चाणक्य पूरी, राजीव चौक, इन्द्रा चौक नाम से रोड/तिराहे/चौराहे दिल्ली में मौजूद हैं में से किसी के नाम पर भी ”कलाम रोड” किया जा सकता था/है मगर ‘लोहे से लोहे’ को काटने की नीति के तहत ‘संघ’ की विचारधारा को आगे बढ़ने के लिए मुग़ल शहंशाह आलमगीर औरंगज़ेब का नाम हटाना देश के अंदर बहुत बड़ी घटना है सड़क का नाम तो बदल देंगे, औरंगज़ेब ने जो कुछ अपनी ज़िंदगी में किया है उसे कैसे मिटाएंगे ?नाम बदलने से होगा कुछ नहीं। गांव में एक कहावत है कि ‘’दो रूपये की हांडी गई मगर कुत्ते की जात पहचानी गई’’ सड़क के टुकड़े का नाम बदलना बताता है कि मशीनरी कहां तक दूषित हो चुकी है ? दर्जन भर फ्लाई ऑवर बन रहे हैं मैट्रो स्टेशन बन रहे हैं मगर कलाम साहब की आड़ लेकर ‘हलाल’ किया गया सिर्फ औरंगजेब को। महज इसलिये कि जिनका इस देश की आजादी, अस्मिता, से कोई सरोकार ही नहीं रहा वे हिंदूवादी संगठन औरंगजेब से चिड़ते हैं उन्होंने औरंगजेब को खलनायक की शक्ल में पेश किया है। जम्मू से कश्मीर को जोड़ने वाली एक सड़क मुगल रोड भी है उसका नाम कब बदला जा रहा है ? काम करके दिखाईये काम, महज कलाम साहब के नाम पर सड़क बनाने से कुछ न होगा उस पर चलना भी पड़ेगा क्या आप में इतनी कुव्वत है कि आप उस ‘सड़क’ पर चल सकें जिस पर कलाम साहब चले हैं ? ये मिटाने का सिलसिला बंद कर दीजिये, सड़क का नाम बदलने से औरंगजेब को फरामोश नहीं किया जा सकता, अखंड भारत के निर्माण में उसके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। हमसे दुश्मनी है न… कैसे मिटाओगे हमारी दास्तानों को, पलड़े में तौल कर देखिये अल्पसंख्यक हैं मगर इस वतन के लिये मर मिटने वाले, इस मुल्क को बनाने में हमारा ही पलड़ा भारी है। बकौल शाईरे मशरिक…
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर ए जहां हमारा।

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