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बिहार में इस बार लोकसभा चुनाव दिलचस्प मोड़ पर

Posted On: 29 Apr, 2019 Politics में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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बिहार में इस बार लोकसभा चुनाव दिलचस्प मोड़ पर है। एक तरफ एनडीए और दूसरी तरफ महागठबंधन। पीएम मोदी के लिए नीतीश कुमार खुद वोट मांग रहे हैं। इतना ही नहीं नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू मोदी पर ही निर्भर है। जातीय समीकरणों में इस बार मामला ऐसा उलझा है कि दोनों तरफ के लिए वोट ट्रांसफर चुनौती है। साथ ही अगड़ा बनाम पिछड़ा का मुद्दा भी चरम पर है। आम चुनाव की दिशा तय करने में बिहार की 40 सीटों की बड़ी भूमिका होगी। 2014 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में 31 सीट जीतने वाला एनडीए पिछली बार से भी बेहतर परिणाम की उम्मीद कर रहा है। वहीं आरजेडी के नेतृत्व में नए सिरे से बना महागठबंधन परिणाम को उलटने के लिए मैदान में जोर-शोर से जुटा है। बिहार राज्य में इस बार जातियों का गणित उलझ गया है। इससे दोनों दलों को एक दूसरे के उम्मीदवारों को वोट ट्रांसफर करवाना चुनौती होगी। यही दिक्कत कांग्रेस और आरजेडी के बीच भी है। इस बार जो महागठबंधन वोटों का ट्रांसफर बेहतर कराएगा वही फायदे में दिखेगा। एक दर्जन सीटों पर दोनों तरफ चुनौती यही है। बिहार में माई फैक्टर के बाद इस बार महागठबंधन ने नया जातीय समीकरण का नारा दिया है-‘मुनिया’। मुनिया मतलब मुस्लिम, निषाद और यादव। राज्य की लगभग डेढ़ दर्जन सीटों पर यह समीकरण सफल रहा तो नतीजे प्रभावित कर सकता है। बिहार में इस बार कई सीटों पर चुनाव सीधे तौर पर अगड़ा बनाम पिछड़ा में तब्दील हो चुका है। पहली बार बिहार की 40 लोकसभा सीटों पर महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधे मुकाबले में आधे दर्जन से अधिक सीटों पर बागी खेल बनाने और बिगाड़ने की भूमिका में है। बेगूसराय में सीपीआई के कन्हैया कुमार हों, बांका में निर्दलीय के रूप में खड़ी पुतुल देवी, मधेपुरा से पप्पू यादव या किशनगंज से अख्तरुल ईमान जैसे उम्मीदवार, ये इन सीटों पर अपनी मजबूत मौजूदगी से चुनावी समीकरण को उलट देने की स्थिति में दिख रहे हैं। लोकसभा चुनाव में दूसरे चरण की वोटिंग 18 अप्रैल को होनी है. इस चरण में बिहार के सीमांचल इलाके की महत्वपूर्ण सीटों पर भी मतदान होगा. किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया की सीटों पर इस दिन वोटिंग होगी. एनडीए और आरजेडी महागठबंधन दोनों के लिए ही यह चरण बेहद महत्वपूर्ण है. सीमांचल में जातीय गणित का खेल ही विजेता तय करेगा. बीजेपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही है जनता दल यूनाइटेड ने मुसलमानों वोटों का रुख अपनी तरफ करने में पूरी ताकत झोंक दी है तो कांग्रेस की निगाह सवर्ण वोट बैंक पर है. जेडीयू और कांग्रेस दोनों की ही तरफ से धर्मनिरपेक्ष राजनीति को स्टैंड बनाया गया है. इस इलाके में मुसलमानों की तादाद अच्छी-खासी है. ऐसे में यहां पर बीजेपी के बजाए जेडीयू ही ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है. सबसे ज्यादा हालत जदयू उम्मीदवार खराब है नीतीश की अहमियत दिखाई नहीं दे रही है,बीजेपी ने अपने हिंदुत्व के स्टैंड में इस इलाके में ढील दी हुई है।
किशनगंज: किशनगंज सीट की करीब 68% आबादी मुस्लिम है जिसके चलते यहां कौन जीतेगा ये मुसलमान ही तय करते हैं. किशनगंज को बिहार का चेरापूंजी भी कहा जाता है. बिहार के अन्य इलाकों के मुकाबले प्राकृतिक तौर पर खूबसूरत भी माना जाता है. किशनगंज मुस्लिम बहुल इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय होता नजर आ रहा है. कांग्रेस प्रत्याशी डा. मो. जावेद पहली बार लोकसभा चुनाव में भाग्य आजमा रहे हैं. हालांकि इससे पहले वे चार बार विधायक भी रह चुके हैं. जबकि एमआईएम प्रत्याशी अख्तरुल ईमान दूसरी बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं. जदयू प्रत्याशी सैयद महमूद अशरफ दूसरी बार लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं , जेडीयू से सैयद महमूद अशरफ, कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. मो. जावेद व एमआईएम प्रत्याशी अख्तरुल ईमान के बीच ही यहां मुख्य मुकाबला होने की उम्मीद है. एमआईएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने 14 अप्रैल को यहां जनसभा की थी जिसमें भारी भीड़ पहुंची थी. इस सीट पर पिछले दो बार ( 2009 और 2014 ) कांग्रेस के मौलाना असरारुल हक ने जीत हासिल की है. इस बार कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बदला है. कांग्रेस की तरफ डॉ. मो. जावेद मैदान में हैं. पिछली बार इस सीट पर बीजेपी के विनय कुमार जायसवाल चुनाव लड़े थे. तब बीजेपी-जेडीयू का गठबंधन नहीं था. इस बार गठबंधन के तहत ये सीट जेडीयू के खाते में गई है. इस लोकसभा सीट की जनता का मिजाज अन्य से बिल्कुल अलग है. यहां चुनाव से एक दिन पहले मुस्लिम वोटों की गोलबंदी होती है. जिस तरफ इनका झुकाव हुआ उस प्रत्याशी की जीत होती है।
कटिहार: मुसलमान-यादव बहुल इस सीट पर इस बार सीधा मुकाबना एनडीए उम्मीदवार दुलालचंद्र गोस्वामी और आरजेडी नीत महागठबंधन उम्मीदवार तारिक अनवर के बीच है. बिहार के कटिहार लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार तारिक अनवर की छवि सभ्य, शालीन, मृदुभाषी सेक्युलर नेता की है. क्षेत्र के लोगों को उनपर विश्वास है और वे सर्वसमाज के नेता माने जाते हैं. सीमांचल की इस सीट के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तेजस्वी यादव ने अपने प्रचार अभियान की शुरुआत इसी सीट से की थी. सीएम नीतीश कुमार समेत कई बड़े नेता यहां पर चुनावी सभा कर चुके हैं. दोनों ही गठबंधन मानते हैं कि यह चुनाव उनकी ओर झुकेगाुै।
पूर्णिया : पूर्णिया सीट पर भी एनडीए और विपक्षी गठबंधन में सीधी लड़ाई है. महागठबंधन की तरफ से उदय सिंह कांग्रेस उम्मीदवार हैं और एनडीए के प्रत्याशी वर्तमान सांसद संतोष कुशवाहा हैं. दिलचस्प ये है कि इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार उदय सिंह यहां से 2004 और 2009 में बीजेपी के टिकट पर सांसद बन चुके हैं. पिछले चुनाव में उन्हें संतोष कुशवाहा ने पटखनी दी थी. अब एक बार फिर दोनों आमने-सामने हैं, देखना होगा किसकी जीत होती है।
भागलपुर: भागलपुर सीट पर मुख्य मुकाबला राष्ट्रीय जनता दल के शैलेश कुमार ऊर्फ बूलो मंडल और जेडीयू जदयू के अजय मंडल के बीच है. भागलपुर की पहचना बिहार की सिल्क सिटी के तौर पर की जाती है. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद बीजेपी के कद्दावर नेता सैयद शाहनवाज हुसैन करीब नौ हजार वोटों से आरजेडी के बूलो मंडल से मात खा गए थे।
बांका: इस सीट पर लोकसभा चुनाव त्रिकोणीय संघर्ष में तब्दील हो गया है. यहा आरजेडी की तरफ से जय प्रकाश नारायण यादव ( मौजूदा सांसद ), जेडीयू के गिरधारी लाल यादव और निर्दलीय पुतुल कुमारी के बीच मुकाबला है. पुतुल कुमार के दिवंगत पति दिग्विजय सिंह राज्य में कद्दावर नेता रह चुके हैं।

सैय्यद आफिस इमाम काकवी

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