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बीजेपी की एकतरफा जीत

Posted On: 11 Jun, 2019 Politics में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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बीजेपी की एकतरफा जीत ने साबित किया कि जनता राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा नेतृत्व तलाश रही थी जो एनडीए सरकार द्वारा दिये गए घावों पर मरहम लगा सके लेकिन कांग्रेस और विपक्षी दल मिलकर ऐसा कोई नाम देने में नाकाम रहे जो राष्ट्रीय स्तर एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीद्वार का मुक़ाबला करता। दरअसल, इस चुनाव में कांग्रेस और विपक्षी दलों की विकल्पहीनता ने भाजपा की भारी जीत के लिए खुला मैदान छोड़ दिया और इस मैदान में भाजपा ने आक्रामक तेवर और रणनीति से चुनाव लड़ा। कांग्रेस और विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व की कमी के साथ-साथ समन्वय और सहयोग का संकट की साफ दिखाई पड़ रहा था। मोदी गरीब है, मोदी पिछड़ा है, मोदी अतिपिछड़ा है, मोदी हिन्दू के लिए जान भी दे सकता है, मोदी पाकिस्तान को सबक सिखा सकता है, मोदी सारे देश का एकमात्र नेता है, मोदी विदेश में भी लोकप्रिय देश का पहला और इकलौता नेता है। मोदी के व्यक्तित्व में इतनी खूबियां गढ़ दी गईं कि विरोधी दल के नेता क्षेत्रीय और कमजोर लगने लगे। मोदी के सामने तो बिल्कुल बौना। देश संभालने में अक्षम। इस छवि निर्माण में संघ परिवार के साथ एक और परिवार जुड़ा हुआ था, जिसे हम भारतीय संघी मीडिया परिवार कह सकते हैं। इस चुनाव में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। दरअसल मीडिया का एक बड़ा तबका पिछले पांच साल में एनडीए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के साथ रहा और उसका सबसे बड़ा प्रचारक बनकर उभरा। दूसरी तरफ कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा सरकार से पूछे गए सवालों पर मीडिया उस तरह से मुखर नहीं हुआ जैसा पिछली सरकारों में था। इसने जनता के बीच सरकार की बेहतर छवि बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने एनडीए सरकार को घेरने में कोई कसर छोड़ रखी थी। राहुल गांधी ने राफेल, जीएसटी, नोटबंदी, कालाधन, बेरोज़गारी समेत एनडीए सरकार से जुड़े तमाम मसलों पर उसे घेरा लेकिन एक तो मीडिया का उन्हें साथ नहीं मिला, दूसरी तरफ जनता कांग्रेस से अब भी चिढ़ी हुई दिखी। इस चिढ़ में कांग्रेस की वंशवादी राजनीति की बड़ी भूमिका है। ऐसा नहीं है कि दूसरे दलों में वंशवाद नहीं है लेकिन कांग्रेस ने जिस तरह से पार्टी को खानदानी विरासत बना लिया है, वह कांग्रेस के खिलाफ जाता है। यह भी एक बड़ी वजह रही कि बीजेपी इस चुनाव में बड़ी लीड ले गई। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जिस तरह से अपनी अमेठी लोकसभा सीट हार गए, उससे यह बात तो स्थापित हो गई कि कांग्रेस की न केवल जमीन पर पकड़ कमजोर है बल्कि वह वोटरों के साथ-साथ कार्यकर्ताओं से भी दूर हो चुकी है। दूसरी तरफ भाजपा ने न केवल जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत की है बल्कि सहयोगी दलों के सहारे उन क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ मजबूत की, जहां उसका जनाधार नहीं था। इसके अलावा बीजेपी ने सोशल मीडिया अभियान के जरिये वोटरों का एक ऐसा तबका भी तैयार किया है, जो उसके कार्यकर्ताओं से भी बड़ा प्रचारक बनकर उभरा है। ऐसे प्रचारकों ने घर, परिवार, रिश्तेदारी से लेकर आस-पास के लोगों के वोट को बीजेपी को दिलवाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इस चुनाव ने यह भी साबित किया है कि भाजपा ने धर्म और जाति के आधार पर टिकट बंटवारे का चुनावी प्रबंधन बेहतर तरीके से किया और यही कारण है कि उत्तर प्रदेश और बिहार समेत तमाम राज्यों में क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक समीकरण मुंह के बल गिर गया और बीजेपी को इसका बड़ा फायदा मिला।कोई भी राजनीतिक दल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि यह मोदी का करिश्मा है और उन्हें तो जीतना ही था। यह चुनाव सीधे-सीधे विपक्ष की रणनीतिक विफलता है। अगर गठबंधन संयुक्त होकर चुनाव लड़ता और मोदी के खिलाफ कोई एक नाम विकल्प के तौर पर तैयार करता तो शायद कांग्रेस और विपक्ष को इतनी बुरी पराजय का मुंह नहीं देखना पड़ता। इस चुनाव में यह तो महत्वपूर्ण है ही कि भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस और गठबंधन का संभावित यूपीए बिखराव का शिकार हो गया। देश की जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ वोट करते हुए 2014 में नरेंद्र मोदी को भारी बहुमत के साथ जनादेश देते वक्त यह उम्मीद की थी कि व्यवस्था परिवर्तन होगा और पारदर्शिता बढ़ेगी। 2019 आते-आते ये सारी बातें बेमानी साबित हो गईं। लोकसभा चुनाव 2019 दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे महंगा चुनाव साबित हुआ है। इसमें प्रति लोकसभा सीट पर औसतन 100 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जबकि प्रति वोटर 700 रुपये का खर्च गिरा है। 2019 के चुनावी खर्च जारी रिपोर्ट के मुताबिक हाल में संपन्न लोकसभा चुनाव में 55 से 60 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसमें से केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधन ने अकेले 45-55 फीसदी खर्च किया है जबकि कांग्रेस गठबंधन ने 15-20 फीसदी खर्च किया है। CMS के मुताबिक पिछले 20 साल में आम चुनाव में होने वाला खर्च छह गुना यानी 9000 करोड़ रुपये से बढ़कर 55000 करोड़ रुपये हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी, जिसका खर्च 1998 के चुनाव में कुल खर्च का 20 फीसदी हुआ करता था, वो बढ़कर 45-55 फीसदी हो गया। भाजपा ने 437 सीटों पर खर्च किये 27 हजार करोड़ हर सीट पर 62 करोड़ देश के रक्षा बजट का 10 प्रतिशत शिक्षा का 30 प्रतिशत स्वास्थ्य का 43 प्रतिशत। किसका है यह पैसा? कहां से आया यह पैसा? सोचिए ? इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 37.4 फ़ीसदी मत मिले. हिंदू वोटरों के बीच पार्टी की लोकप्रियता अपने चरम पर रही. 44 फ़ीसदी हिंदुओं ने बीजेपी को वोट किया, और याद रहे मुसलमानों की 8 फ़ीसदी आबादी ने भी उसे वोट किया. अब हिसाब समझिए देश में कुल वोटर 90 करोड़ हैं. यानि क़रीब 70 करोड़ वोटर हिंदू हैं. इसका मतलब हुआ- क़रीब 46 करोड़ हिंदुओं ने मतदान में हिस्सा लिया. इनमें से 44 फ़ीसदी ने बीजेपी को वोट किया यानी 20 करोड़ हिंदुओं ने बीजेपी को वोट किया. देश में क़रीब 13.5 करोड़ मुस्लिम मतदाता हैं, जिनमें करीब 9 करोड़ ने मतदान में हिस्सा लिया. 8 फ़ीसदी मुसलमानों ने बीजेपी को वोट किया. यानी 72 लाख वोटरों ने बीजेपी को वोट किया. यानी कांग्रेस के बाद इतनी बड़ी संख्या में मुसलमानों ने किसी दूसरी पार्टी को वोट नहीं किया है… इसका मतलब ये भी है कि बीजेपी को ईसाई और सिक्खों से ज़्यादा वोट मुसलमानों ने दिया. देश के 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राष्ट्रीय स्तर पर 2014 के मुक़ाबले अपनी वोट हिस्सेदारी 7% से भी अधिक बढ़ाने में सफलता हासिल की है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 31% जनता ने वोट किया था, जो 2019 में बढ़कर 38% से भी अधिक हो गया है। इसी तरह से एनडीए 2014 के 38% के मुकाबले 45% वोट की हिस्सेदारी हासिल करने में सफल रही है। करीब 7% से भी अधिक वोट शेयर की बढ़ोतरी समान रूप से बीजेपी और एनडीए दोनों में देखने को मिलती है। यह बेहद दिलचस्प है कि बीजेपी को उत्तर प्रदेश में 2014 के मुकाबले करीब 10 सीटों का नुकसान हुआ है लेकिन वोट शेयर करीब 42% से बढ़कर 50% के नजदीक पहुंच गया है। भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस के वोट शेयर में 3% से भी कम की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि एनडीए की देश की लोकसभा की कुल सीटों की भागीदारी करीब दो-तिहाई तक पहुंच गई है। इस तरह से भारतीय जनता पार्टी देश के राजनीतिक पटल पर और मजबूती से उभरी है और अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर अपनी स्थापना के बाद से बीजेपी की चुनावी सफलता का निर्विवाद रूप से एक नया इतिहास लिखा है।

सैय्यद आसिफ इमाम काकवी

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