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मोदी-शाह किसी भी कीमत पर 2019 का चुनाव जीतना चाहते हैं!

Posted On: 18 Apr, 2019 Politics में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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भोपाल संसदीय सीट,मध्य प्रदेश की हाई प्रोफाइल सीटों में शुमार है। पिछले लंबे समय से इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही थी। लेकिन इन तमाम कयासों पर अब पूर्ण विराम लग गया है। भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर दी है। पार्टी ने यहां से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा है। साध्वी प्रज्ञा के इस सीट से उम्मीदवार बनाए जाने के बाद यहां की लड़ाई रोचक बन गई है। कांग्रेस ने पहले ही इस सीट पर कद्दावर नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को प्रत्याशी घोषित कर दिया था। ऐसे में यहां लड़ाई अब साध्वी बनाम दिग्विजय सिंह की हो गई है।, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के अंतर्गत संचालित BJP को देश की अन्य सभी राजनैतिक पार्टियों से अलग करती है. कोई भी अन्य पार्टी इतनी दूषित नहीं हुई है कि वह आतंकवाद के आरोपी को पार्टी प्रत्याशी बना दे.

इससे यह भी साफ नज़र आता है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को BJP ने लगभग दफना दिया है, ताकि कट्टर हिन्दुत्व की लाइन को बढ़ावा देकर बचे हुए चरणों में वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके. प्रज्ञा ठाकुर को 23 अक्टूबर 2008 को मालेगांव ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार कर लिया गया था। वह इस मामले में आरोपी रही हैं और नौ साल तक जेल में भी रही हैं। हालांकि इस समय वो जमानत पर हैं। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की दिग्विजय सिंह से पुरानी अदावत है। मालेगांव बम धमाकों की मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जिसमे 35 लोग मारे गए थे और 100 से ज्यादा घायल लोग घायल हुई था? यानि के बीजेपी जॉइन करते दाग खत्म| एक काम कीजिए अकेले साध्वी को क्यों ? कोडनानी, असीमानंद, कर्नल पुरोहित, आसाराम, रामरहीम को भी टिकट दे दीजिए। नाम मे क्या रखा है ? 1993 मे मुंबई बम धमाको से दहल गई था इन धमाको मे रूबीना मेमन की कार प्रयुक्त हुई, इस जुर्म मे रूबीना को उम्रकैद की सजा काट रही है। 2008 मे मालेगांव ब्लास्ट मे प्रयुक्त की गई बाईक साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की थी जिस के खिलाफ 100 से ज्यादा लोगों की हत्या करने/करवाने की साजिश रचने का बेहद संगीन आरोप है।

देश में दो तरह का कानून। एक आतंकी को खराब सेहत के आधार पर जमानत दी जाती है और उसे उम्मीदवार बनाया जाता है, दूसरी तरफ अनेकों गंभीर रोगों से ग्रस्त जीवन से संघर्षरत लालू प्रसाद जो वृद्धावस्था में हैं, तीन बार सर्जरी हो चुकी है. आप ही वो शख्स थे जिसने भारतीय रेल को मुनाफे में ला दिया और गरीबों के लिए रेलगाड़ियां चलवायीं. 71 वर्ष के हो चुके हैं, आपने कभी जमानत नहीं तोड़ी, कभी अदालत की सुनवाई से गैरहाजिर नहीं रहे, किसी भी अदालती आदेश का कभी उल्लंघन नहीं किया, लेकिन फिर भी आपको जमानत नहीं दी जाती. कानून के किस किताब में यह लिखा है कि एक “सजायाफ्ता” कैदी का इलाज सिर्फ किसी सरकारी अस्पताल में ही हो सकता है? लेकिन आपकी जमानत याचिका का विरोध करते हुए सीबीआई के वकील ने अदालत में क्या कहा? उन्होंने तर्क दिया कि आप एनडीए सरकार के धुर विरोधी हैं और आप सरकार के खिलाफ जनमत उभार सकते हैं आदि. क्या ये सब जमानत याचिका ठुकराने का आधार हो सकते हैं? फिर भी, आपको जमानत नहीं दी गयी. उनकी जमानत निरस्त कर दिया जाता है। इतने दुर्दांत आतंकी को चुनाव लड़ने दिया जाता है और हार्दिक पटेल को रोक दिया जाता है। ये केवल भारत में ही संभव है। आप क्या सोचते है मालेगांव धमाके के मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मोदी शाह ने ऐसे ही मैदान में उतारा हैं? नहीं बिल्कुल नही मोदी शाह एक सोची समझी रणनीति के तहत उसे उतारा है ताकि कांग्रेस उसके खिलाफ हिन्दु टेरर शब्द यूज करे और पूरे देश का ध्रुवीकरण किया जा सके। पाकिस्तान में आतंकी हाफिज़ सईद चुनाव लङा था और वहां कि अवाम उसे एक सीट तक जीतने नहीं दी थी।

बताने का मकसद ये है कि आतंकी चाहे कोई भी हो वो सजा के हकदार हैं वोट के नहीं। चूंकि साध्वी प्रज्ञा ठाकुर अब भोपाल सीट से लड़ रही हैं इसलिए उनका मुकाबला कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से होगा। साध्वी का बीजेपी में शामिल होना पार्टी की मनोदशा को दिखाता है। साध्वी प्रज्ञा और दिग्विजय सिंह को एक दूसरे का धुर विरोधी माना जाता है। दिग्विजय सिंह कांग्रेस के उन चुनिंदा नेताओं में से एक हैं, जिन्होंने यूपीए सरकार के दौर में ‘भगवा आतंकवाद’ के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। शायद यही वजह है कि साध्वी प्रज्ञा चुनावी बिसात पर दिग्विजय सिंह को चुनौती देना चाहती हैं। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी हैं। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और दिग्विजय का मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प होने वाला है क्योंकि दिग्विजय 16 साल बाद चुनाव लड़ने जा रहे हैं। 1993 से 2003 तक लगातार 10 सालों तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह 2003 के बाद से अबतक किसी भी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में नहीं लड़े हैं। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पहली बार तब चर्चा में आईं, जब 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में उन्हें गिरफ्तार किया गया। वह 9 सालों तक जेल में रहीं और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। जमानत पर बाहर आने के बाद उन्होंने कहा था कि उन्हें लगातार 23 दिनों तक यातना दी गई थी। साध्वी प्रज्ञा 2007 के आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी हत्याकांड में भी आरोपी थीं, लेकिन कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। साध्वी प्रज्ञा का जन्म मध्य प्रदेश के भिंड जिले के कछवाहा गांव में हुआ था।

हिस्ट्री में पोस्ट ग्रैजुएट प्रज्ञा का शुरुआत से ही राष्ट्रवादी संगठनों की तरफ रुझान था। वह आरएसएस की छात्र इकाई एबीवीपी की सक्रिय सदस्य भी रह चुकी हैं। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मध्य प्रदेश के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं. परिवारिक पृष्ठभूमि के चलते वे संघ व विहिप से जुड़ी और फिर बाद में संन्यास धारण कर लिया. साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मालेगांव 2008 बम कांड में आरोपी है. उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर है और मुकदमा चल रहा है.साध्वी प्रज्ञा ठाकुर फिलहाल जमानत पर हैं. जमानत मांगने के आधार में एक आधार खराब स्वास्थ्य भी था. खास बात है कि NIA ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को क्लीन चिट दी थी लेकिन NIA की अदालत ने उन्हें बरी नहीं किया.भोपाल लोकसभा सीट पर करीब तीन दशक से बीजेपी का कब्जा है. कांग्रेस नेता शंकर दयाल शर्मा, जो देश के राष्ट्रपति भी रहे ने 1984 में इस सीट पर जीत दर्ज की थी. 1989 से लेकर बीजेपी के सुशील चंद्र वर्मा ने तीन बार यहां का

प्रतिनिधित्व किया. 1999 में उमा भारती यहां से जीतीं लेकिन मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. वर्तमान में अशोक सांझर भोपाल से सांसद हैं. 1989 से ही बीजेपी का गढ़ मानी जाती है। बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारकर इस सीट की लड़ाई को रोचक बना दिया है। पार्टी ने साध्वी को यहां से उतारकर एक तीर से दो निशाना किया है। बीजेपी जहां साध्वी को एक तरफ हिंदुत्व के चेहरे के रूप में पेश करना चाहेगी तो वहीं कांग्रेस को हिंदू आतकंवाद के मुद्दे पर भी घेरने की कोशिश करेगी। साध्वी हिंदुत्व का एक बड़ा चेहरा मानी जाती हैं। वह अपने तीखे बोल की वजह से जनता के बीच खासी लोकप्रिय भी हैं। लेकिन उनकी इस छवि और लोकप्रियता का फायदा बीजेपी को कितना मिलेगा यह तो भविष्य के गर्भ में ही छुपा है। 2019 में सबसे ज़्यादा ध्रुवीकरण कहीं होने जा रहा है, तो वह भोपाल में हो रही दिग्विजय बनाम ठाकुर लड़ाई में ही है.

मोदी के कार्यकाल के दौरान BJP हिन्दुत्व के नए धुरंधरों को मुख्यधारा में लेकर आई है, जिनमें कट्टरपंथी साधु से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ शामिल हैं, और अब, प्रज्ञा को सामने लाया गया है, जबकि हिन्दुत्व के वास्तविक कट्टर पैरोकारों और पार्टी के संस्थापकों लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को पार्टी ने रिटायरमेंट में धकेल दिया है ठाकुर के चयन का लक्ष्य BJP के समर्पित वोटरों को फिर एकजुट करना, और दूर चले गए पुराने विश्वासियों को वापस लाने की कोशिश है. आतंकवाद के आरोपी शख्स को संसद में पहुंचाने से मोदी-शाह को कोई फर्क नहीं पड़ता है, जो किसी भी कीमत पर 2019 का चुनाव जीतना चाहते हैं.

सैय्यद आफिस इमाम काकवी

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