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चौकीदार वाला नारा कितना कारगर!

Posted On: 14 May, 2019 Politics में

SYED ASIFIMAM KAKVIJust another weblog

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लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अपने चरम पर है. चार चरण का मतदान पूरा हो चुका है और अगले तीन दौर के मतदान के लिए सभी दलों के नेता रैलियां कर रहे हैं. खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी ताकत झोंकी हुई है और पिछले एक महीने में वो ताबड़तोड़ रैलियां कर चुके हैं. लेकिन रैलियों में दिए जा रहे पीएम मोदी के भाषणों पर विपक्ष आपत्ति जता रहा है. यहां तक कि मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है सवा सौ करोड़’ देशवासियों का भरोसा खोकर अब वो बंगाल के 40 विधायकों के तथाकथित दल-बदल के अनैतिक भरोसे तक सिमट गए हैं. ये वो नहीं काले धन की मानसिकता बोल रही है, लोकसभा चुनाव के दौरान ‘चौकीदार’ सबसे बड़ा नारा बन चुका है, बीजेपी के बड़े बड़े लीडर केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर शहर-ब्लॉक के दूर-दूर तक सभी अपने नाम के आगे ‘मैं हूं चौकीदार’ का लक़ब लगाकर देश के प्रति अपनी सेवाओं का डमरू बजा रहे हैं। राजनाथ सिंह ने देश के सबसे बड़े चौकीदार का समर्थन करते हुए नया नारा दिया है। ‘चौकीदार प्योर है, सत्ता में आना श्योर है’ जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर’ है के नारे को अपने चुनावी मुहिम का सबसे बड़ा हिस्सा बना दिया है। उन्होंने चौकीदार चोर है का नारा लगाकर सीधा पीएम मोदी को निशाने पर लिया है। इतना ही नहीं, वह चुनावी सभाओं में हज़ारों की भीड़ से चौकीदार चोर है की हामी भी भरवा रहे हैं। राफेल घोटाला, माल्या, नीरव मोदी, चौकसी , देश ख़ज़ाने का 13860 करोड़ लेकर फिर भागा 38वां राष्ट्रवादी लूटेरा महेश शाह वग़ैरह के घोटालों के ज़रिए वह सीधे प्रधानमंत्री मोदी को घेर रहे हैं। राजनीति में नारों की बड़ी अहमियत होती है. ये जिताने में अहम भूमिका निभा सकते हैं और उल्टे पड़ जाएं तो गले का पत्थर बन सकते हैं. ‘चौकीदार चोर है’ का राहुल गांधी का नारा, क्या कांग्रेस और उसके अध्यक्ष के गले का पत्थर बनेगा? मोदी के ‘मैं भी चौकीदार’ के देशव्यापी अभियान से तो ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं. पर किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ेगा. समय-समय पर लगे राजनीतिक नारों का अध्ययन करें तो ज़्यादातर सकारात्मक नारे ही कामयाब होते हैं. नकारात्मक नारे तभी लोगों की ज़बान से होते हुए दिल में उतरते हैं जब जिसके ख़िलाफ़ नकारात्मक नारा लगा है, उससे लोग बहुत नाराज़ हों. साल 1971 में विपक्ष का महागठबंधन बना और उसने नारा दिया ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’. इंदिरा गांधी ने उसे पलट दिया. कहा, ‘मैं कहती हूं ‘ग़रीबी हटाओ, वे कहते हैं इंदिरा हटाओ. इंदिरा गांधी भारी बहुमत से जीतीं.

साल 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा. सोनिया गांधी और कांग्रेस को इसका आजतक अफ़सोस होगा. अपनी तरफ़ आने वाले तीर को विपक्षी की तरफ़ मोड़ देने की प्रधानमंत्री में अद्भुत क्षमता है. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की ‘चायवाला’ और प्रियंका वाड्रा के ‘नीच’ शब्द को उन्होंने किस तरह कांग्रेस के ख़िलाफ़ हथियार बना लिया, यह सबको पता है. कुछ महीने पहले राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया. इसके लिए उन्होंने रफ़ाल लड़ाकू विमान की ख़रीद का मुद्दा उठाया. पिछले लोकसभा चुनाव में ‘चायवाला’ मुद्दा बना तो इस बार ‘चौकीदार’ है. चौकीदार चोर है, चौकीदार चोर है, चौकीदार चोर है ये नारा तो याद ही होगा आपको, ये राहुल गाँधी का पसंदीदा नारा है. और राहुल ये अपनी हर सभा में बोलते हैं. मगर उन्होंने इस नारे में सुप्रीम कोर्ट को खींच कर गलती कर दी थी. अब उनको अपने किये कर शर्मिंदा होना पड़ गया. कुछ दिन पहले ही राहुल अपनी एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे. और राफेल डील को लेकर पीएम मोदी पर तंज कस रहे थे. फिर उन्होंने कह दिया की अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है की चौकीदार चोर है. दरअसल शीर्ष अदालत राफेल डील के लीक दस्तावेजों को सबूत मानकर मामले की दोबारा सुनवाई के लिए तैयार हो गई थी. राहुल ने इसी को मुद्दा बना लिया था. राहुल की इस हरकत से भाजपा नेता मीनाक्षी लेखी ने उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना की याचिका दायर कर दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान में लेते हुए राहुल को नोटिस भेज दी थी. राहुल गाँधी ने अपने कहे शब्दों पर माफ़ी मांग ली है. राहुल ने कहा- मैं सुप्रीम कोर्ट के बयान के खिलाफ गया उसके लिए मुझे खेद है. चुनावी माहौल की गर्मी के बीच ऐसा बयान निकल गया. मेरा इरादा कोर्ट के आदेश को गलत प्रस्तुत करने का नहीं था. मेरे बयानों को राजनीतिक विरोधियों ने गलत तरह से इस्तेमाल किया है. अब राहुल की ये खेद मंजूर है या नहीं इसपर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा. राहुल गाँधी पर अभी भी तलवार लटकी हुई है. अपने प्रधानमंत्री को घिरा देखकर अब मोदी भक्तों की एक बड़ी जमात देश की चौकीदार बन चुकी है और सितम-ए-सियासत ये है, कि चौकीदारों की जितनी तादाद बढ़ रही है, उतने ही घपलों का पर्दाफ़ाश हो रहा है। कांग्रेस ने चौकीदार बनने वाले कई बड़े नेताओं की कलई खोल दी है कि किस तरह उन्होंने अपनी ही पार्टी के सीनियर लीडर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा से 1800 करोड़ रुपए लेकर इनके भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला है।

लोकसभा चुनाव में चौकीदार वाला ये नारा कितना कारगर होगा, ये तो समय बताएगा लेकिन इतना ज़रूर है कि राहुल गांधी ने देश के चौकीदार को कठघरे में खड़ा कर दिया है और ये अलग बात है कि देश का चौकीदार चुनावी सभाओं में अपनी सफ़ाई पेश करने के बजाय देशभक्ति और एअरस्ट्राइक का क्रेडिट लेते हुए जनता से कह रहा है कि आपको मुझ जैसा मज़बूत फ़ैसला करने वाला प्रधानमंत्री चाहिए या कमज़ोर सरकार चाहिए? मोदी को भी अहसास है कि कहीं बाज़ी पलट न जाए । चौकीदार दोबारा आएगा या नहीं, इस पर देशभर में सियासी मंथन जारी है। बुद्धिजीवियों की मंडली में अटकलें लगायी जा रही हैं। टीवी चैनलों के जितने भी सर्वे आए हैं इन सब में यही रुझान मिलता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 2014 का परिदृश्य नहीं होगा। विपक्ष का गठबंधन बीजेपी के दिल्ली की ओर बढ़ते क़दमों को यूपी-बिहार, पश्चिम बंगाल , झारखण्ड , में ही रोक देगा। संसद में न तो कांग्रेस की बहुमत होगी और न ही बीजेपी सत्ता में आने के लायक़ होगी। हंग पार्लियामेंट में गठबंधन में शामिल जमातों का बोलबाला होगा। वो बादशाहगर बनकर उभरेंगी, इसलिए सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़, ख़रीद-फ़रोख़्त औऱ लेन-देन का बाज़ार गर्म होगा और जिसकी गठरी जितनी भारी होगी, वही सिकंदर बनेगा। देश की दो बड़ी पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस दोनों अच्छी तरह आने वाले दौर का अंदाज़ा लगा रही हैं। दोनों जमातें गठबंधन का खेल खेल रही हैं। दिल्ली विजय के लिए तरह तरह की सियासी बिसातें बिछायी जा रही हैं। पांच साल की सत्ता के दौरान सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है। नोटबंदी, जीएसटी, बेरोज़गारी, किसानों की ख़ुदकुशी, मॉब लिंचिंग, दलित अत्याचार जैसे जज़्बाती मुद्दों के सिवाय कोई मुद्दा नहीं है। बाबरी मस्जिद के मामले में अब तीसरे पक्ष की मदद ली जा रही है। राम जन्मभूमि पर फ़िल्म रिलीज़ हो चुकी है।

ये फ़िल्म देश की जनता की सोच को बुनियादी मुद्दों से हटाने के लिए बनायी गयी है। इसके प्रभाव भी चुनाव पर पड़ सकते हैं, लेकिन अफ़सोस तो ये है, कि चुनाव आयोग भी इस मामले में ख़ामोश है, और अदालत में भी इस फ़िल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से अपना दामन बचा लिया है। सवाल ये भी है, कि क्या सरकार एअरस्ट्राइक का फ़ायदा उठा सकेगी। क्या लोकसभा चुनाव में देशभक्ति और राष्ट्र का नारा ‘चौकीदार चोर है’ के नारे पर हावी हो जाएगा, और तमाम मुद्दों को पीछे धकेल देगा। राहुल गांधी ने वक्त के तेवर को भांप लिया है कि आज देश में सबसे ज़्यादा परेशान मध्यमवर्गीय और ग़रीब तबक़ा है। इसलिए उन्होंने मोदी की देशभक्ति और राष्ट्रवाद का जवाब ग़रीब का हाथ थामकर दिया है। उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े न्यूनतम आमदनी गारंटी योजना ‘न्याय’ का ऐलान करके हिन्दुत्व के ध्वजवाहकों को चौंका दिया है और देश का रुख़ समाजी और आर्थिक मसले की तरफ़ मोड़ दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ऐलान किया है कि अगर इनकी सरकार बनी तो देश के सबसे ग़रीब 20 फ़ीसद परिवारों को 72 हज़ार रुपए सालाना मदद की जाएगी। ये रक़म सीधे खाते में जमा होगी। इस योजना से देश के 25 करोड़ अति गऱीब लोग लाभ पाएंगे। ग़रीबों के लिए 6 हज़ार मासिक का ऐलान बीजेपी के ज़रिए किसानों को 6 हज़ार सालाना का जवाब समझा जा रहा है। राहुल के इस क़दम से बीजेपी की सत्ता के गलियारों में हलचल मची हुई है। बीजेपी चीख़ो-पुकार कर रही है कि आख़िर ये रक़म कहां से आएगी ? क्या देश पर कोई नया टैक्स लगेगा? नीति आयोग भी बीजेपी की हां में हां मिला रहा है। राहुल गांधी ने ‘न्याय योजना’ को ग़रीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक क़रार दिया है। उन्होंने कहा कि देश के चंद लोगों की तरक्की के लिए साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए ख़र्च किए जा सकते हैं तो ग़रीबों के लिए क्यों नहीं? राहुल गांधी ने बाक़ायदा इस योजना का ब्लू प्रिंट भी बना लिया है आशा है कि न्याय योजना पर तीन लाख 60 हज़ार करोड़ रुपए का ख़र्च आएगा जो देश के बजट का 13 फ़ीसद और जीडीपी का 2 फ़ीसद है।

रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी न्याय योजना को ग़रीबी मिटाने वाली योजना क़रार दिया है। हमारे देश में हुकूमत, सियासत और दौलत की अजीब तिकड़ी रही है। तमाम सरकारें टैक्स के नाम पर नौकरी-पेशा लोगों और मध्यमवर्गीय तबक़े का ही ख़ून चूसती रही हैं और अमीरों पर मेहरबान रही हैं क्यों कि ये तल्ख़ हक़ीक़त है, कि हिन्दुस्तान का सुपर रिच तबक़ा अपनी आमदनी से बहुत ही कम टैक्स अदा करता है। जबकि दुनिया के तमाम बड़े देशों में अतिरिक्त टैक्स के लिए ग़रीबों की ज़ेब ख़ाली नहीं करायी जाती है बल्कि अमीरों पर ज़्यादा टैक्स लगाकर विकास की योजनाएं चलायी जाती हैं। फ्रांस, ब्राज़ील, अमेरिका, जर्मनी समेत 20 देशों में ग़रीबों की न्यूनतम आमदनी का तजुर्बा होता रहा है। इन देशों की योजनाएं और तजुर्बे हमारे काम आ सकते हैं। इसलिए ग़रीबों की आमदनी की गारंटी देने के राहुल के ऐलान से कारपोरेट घरानों से लेकर बीजेपी तक में हलचल मची हुई है। अगर इस योजना के तहत देश के 1 फ़ीसद सुपर रिच परिवारों पर नया टैक्स लगता है तो ग़रीबों की भलाई के लिए नये दौर की शुरुआत हो सकती है। मगर सवाल ये है, कि जिन सुपर अमीर घरानों की दौलत से सियासत का निज़ाम चल रहा हो, क्या वो इस योजना को कामयाब होने देंगे? दौलत और सियासत का चोली-दामन का साथ रहा है। दौलत हमेशा सियासत पर हावी रही है। न्याय योजना बेशक एक ऐतिहासिक क़दम है, लेकिन ये ऐतिहासिक क़दम उस वक्त मंज़िल तक पहुंचेंगे जब देश की सत्ता और सियासत में परिवर्तन आएगा। फ़िलहाल देखना ये है कि ग़रीबों को आमदनी की गारंटी देने वाली इस योजना का लोकसभा चुनाव पर कितना असर होता है या जनता इसे महज़ चुनावी वादा समझकर देशभक्ति की लहरों में बह जाएगी और अपने बुनियादी मुद्दे नज़रअंदाज़ कर देगी और चौकीदार फिर नये ताम-झाम के साथ सत्ता के सिंहासन पर क़ाबिज़ होगा।

सैय्यद आफिस इमाम काकवी

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