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पास से दूर, दूर के पास...!!

Posted On: 26 Dec, 2014 Others में

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तारकेश कुमार ओझा

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पास से दूर, दूर के पास…!!

अंकल सीरियस … कम शून…। भैया बीमार – चले आओ…। टेलीफोन, मोबाइल व इंटरनेट से वंचित उस दौर में तब अपनों को याद करने का एक ही जरिया होता था टेलीग्राम । जिसका पाने वालोें पर बड़ा मारक असर होता था। इसके आते ही प्राप्तकर्ता के घर में सनसनी फैल जाती थी कि पता नहीं कैसा संदेशा आया है। लोग अपनों की चिंता में परेशान हो उठते थे। उस दौर में किसी बात पर नाराज होने पर बड़े – बूढ़े किसी से कहलवा कर अपनों को टेलीग्राम करवा देते थे कि फलां बहुत बीमार हैं। चले आओ। तब न तो अग्रिम आरक्षण की एेसी सुविधा थी और न तो मोबाइल ही कि आपस में बातें करके सच्चाई से अवगत हो जाए। लेकिन क्या कमाल कि टेलीग्राम पाते ही अपने जैसे – तैसे बस अपनों के बीच पहुंच ही जाते थे। औपचारिकता के बाद होने वाली बैठकों में गिले – शिकवे दूर कर लिए जाते । अतीत की ये घटनाएं वर्तमान में काफी प्रासंगिक हो गई हैं। इसलिए कि लोग भीड़ में अकेले होते जा रहे हैं। या यूं कहें कि अपनों में बेगाने। इस संदर्भ में पश्चिम बंगाल की एक दुखद घटना का जिक्र जरूरी है। जिसमें कॉलेज में पढ़ने वाले एक छात्र ने इसलिए जहर खा लिया क्योॆंकि उसके पास पंजीयन के लिए पैसे नहीं थे। टयूशन पढ़ा कर जैसे – तैसे गुजर – बसर कर रहे इस छात्र ने ऊंची शिक्षा हासिल करने के लिए किसी तरह कॉलेज में दाखिला तो ले लिया। लेकिन पंजीयन के लिए जब फीस जमा करने की बारी अाई तो वह परेशान हो उठा। आखिरकार एक दिन कालेज परिसर में ही उसने जहर खा लिया। आश्चर्य. कि इस घटना के बाद तोड़- फोड़ करने वाले उसके साथियों को पहले इस बात की भनक तक नहीं लग पाई कि उसका एक सहपाठी गहरी मुसीबत में है। फेसबुक और इंटरनेट के दूसरे माध्यमों से आज जब हम दुनिया से जुड़ने की कोशिश करते हैं वहीं अपने आस – पास रहने वालों की पीड़ा को समझ नहीं पाते। यानी हम दूर के पास और पास से दूर होते जा रहे हैं। पिछले दो दशकों के कालखंड का आकलन करने पर हम पाते हैं कि उपलब्ध तमाम सुख – सुविधाओं के बीच लोगों में संवेदना की कमी अाई है। सहानुभूति के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाने की रस्मअदायगी है। यह जानते हुए भी उनका कोई अपना गहरी मुसीबत में है या बुरे दौर से गुजर रहा है, दूसरों की कौन कहे अपने भी उसकी चिंता करने की जहमत नहीं उठाते। यह सोचते रहते हैं कि एक न एक दिन वह इस दौर से निकल ही जाएगा। या फिर मुझे क्या पड़ी है…। पता नहीं दूर के पास और पास से दूरी बनाने की यह आपाधापी एक दिन हमें कहां पहुंचा कर दम लेगी।

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