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क्या छात्राओं का अपनी सुरक्षा की मांग करना साजिश है?

Posted On: 25 Sep, 2017 Others में

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TIRTH RAJ SINGH

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय न सिर्फ देश में, बल्कि दुनिया के तमाम देशों में अध्ययन-अध्यापन, सीखने के लिए प्रतिष्ठित है। यही कारण है कि यहां न सिर्फ देश के विभिन्न राज्यों से अपितु दुनिया के तमाम देशों के छात्र अध्ययन के उद्देश्य से, शिक्षा के उद्देश्य से, सीखने के उद्देश्य से व यहां के सांस्कृतिक वातावरण में आगे बढ़ने के उद्देश्य से यहां आते हैं। भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय ने इस विश्‍वविद्यालय की नींव रखी।


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मालवीय जी की यह बगिया हमेशा अपने गौरवशाली इतिहास व उपलब्धियों की वजह से सुर्खियों में रहती है, हमेशा देश में सराहना होती है। आज फिर यह बगिया सुर्खियों में है, लेकिन न तो अपने गौरवशाली इतिहास के लिए और न ही किसी उपलब्धि के लिए। आज यह सुर्खियों में है तो छात्र-छात्राओं पर हुई बर्बरता की वजह से, छात्रों की अराजकता की वजह से और विश्वविद्यालय प्रशासन की हठधर्मिता की वजह से।


जी हां! मैं बात कर रहा हूं महामना की बगिया में हुई घटना के विषय में। महामना की बगिया में अक्सर ही छात्राओं के साथ अमानवीय व छेड़छाड़ की घटना होती आ रही हैं, जिसकी वे लगातार विश्वविद्यालय से शिकायत करती आ रही हैं और अपनी सुरक्षा की मांग करती आ रही हैं। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा छात्राओं की समस्या व मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।


विगत 21 अगस्त को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बने नवीन छात्रावास में रहने वाली छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना तब हुई, जब वह शाम के समय से अपने हॉस्टल लौट रही थी। यह घटना उसके छात्रावास के समीप हुई। जिसके बाहर न तो समुचित प्रकाश की व्यवस्था है, न ही छात्रावास के आसपास सुरक्षा गार्ड रहते हैं। छात्रावास से थोड़ा आगे प्रॉक्टोरियल बोर्ड का ऑफिस है, जहां पर भारी मात्रा में सुरक्षा गार्ड रहते हैं, लेकिन छात्रावास के आसपास कोई नहीं।


छात्रा ने अपने साथ हुई घटना की शिकायत समीप में रहे गार्ड से की, लेकिन उसने अनसुना कर दिया। तब छात्राओं ने इस घटना की शिकायत प्रॉक्टोरियल बोर्ड से की और लिखित शिकायती पत्र देकर अपनी मांगे रखीं। लेकिन जब कोई कार्रवाई न हुई तो छात्राओं ने आंदोलन का स्वरूप बनाया। वे चाहती थीं कि कुलपति महोदय आकर उनसे मिलें, बात करके उनकी समस्याओं को सुनकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करें व उनकी सुरक्षा संबंधी मांगों को पूरा करने के संबंध में आश्वासन दें।


कुलपति महोदय छात्राओं से न बात करने की हठ में डूबे रहे और उसी बीच प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री, राज्यपाल आदि 2 दिन बनारस में रहे, लेकिन छात्राओं की समस्या को जानने कोई नहीं पहुंचा। प्रधानमंत्री जी का दुर्गा मंदिर जाने का रास्ता धरनास्थल के सामने से ही प्रस्तावित था, तो छात्राओं को लगा कि हो सकता उन्हीं से बात हो जाए और कुछ आश्वासन मिल जाए, लेकिन लास्ट के कुछ समय में उनका रूट बदल दिया गया।


विश्वविद्यालय प्रशासन की हठधर्मिता व शासन की अनदेखी के चलते छात्राओं के द्वारा शुरू किया गया यह स्वस्थ आंदोलन राजनैतिक स्वरूप ग्रहण करने लगा। इसमें छात्र भी शामिल हो गए व तमाम संगठन व पार्टियों के लोग प्रत्य़क्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित हो गए। जिसके बाद से ही स्थितियां बिगड़नी शुरू हो गईं और उस समय और विकराल हो गई जब कुलपति ने छात्राओं के एक प्रतिनिधि मंडल को मिलने के लिए बुलाया था।


इसमें छात्र भी पहुंचे, जिन्हें रोक दिया गया। उसके बाद गुस्साए छात्र उग्रता और अराजकता को उतारू हो गए और पुलिस भी छात्रों के साथ बर्बरता से पेश आई। पुलिस ने न सिर्फ छात्रों पर लाठियां बरसाईं, अपितु छात्राओं को भी नहीं छोड़ा और बिना महिला पुलिस के ही उनके साथ भी अमानवीय तरीके से बर्बरता हुई। इसके बाद राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा भारत रत्न महामना जी की प्रतिमा पर कालिख पोतने का प्रयास किया गया, जो बहुत ही घृणित व निंदनीय है। महामना की बगिया का कोई छात्र ऐसा कृत्य नहीं कर सकता। ऐसा निंदनीय कृत्य द्रोही लोग ही कर सकते हैं, जो देश विरोधी बातें करते हैं, सेना को गालियां बकते हैं आदि।


मालवीय जी ने मानवीय व अच्छे उद्देश्यों के साथ इस बगिया की आधारशिला रखी थी, जिसे न तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने समझा और न ही छात्रों ने। किसी भी अमानवीय कृत्य को जायज नहीं ठहराया जा सकता। वह फिर चाहे लाठीचार्ज हो या छात्रों की अराजकता। एक तरफ देश व प्रदेश दोनों की ही सरकारें बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा देती हैं, वहीं दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा की मांग करने वाली छात्राओं को लाठिया मिलती हैं।


देश मे नवदुर्गा का पर्व चल रहा है। भारतीय समाज में नारियों को देवियों की तरह पूजा जाता है। देश के प्रधानमंत्री व प्रदेश के मुख्यमंत्री नवदुर्गा के 9 दिन के व्रत पर हैं, लेकिन उनका प्रशासन देवियों की तरह पूजी जाने वाली छात्राओं को उनकी सुरक्षा के बदले लाठियों से उनकी पूजा कर रहा है।


इस पूरे प्रकरण के बाद तमाम वैचारिक लोग इसे राजनैतिक, साजिश और षड्यंत्र बता रहे हैं। यदि यह साजिश, षड्यंत्र था, तो पहले ही क्यों नहीं ध्यान दिया गया? कुलपति ने छात्राओं से क्यों बात नहीं की, जो छात्राएं चाहती थी और जिसने इस आंदोलन को यह स्वरूप दिया? इतनी बड़ी घटना हो जाने के बाद ही यह क्यों पता चला कि यह साजिश है? जब छात्राएं आंदोलित थीं, तब क्यों नहीं समझ आया कि यह साजिश है? क्या छात्राओं का अपनी सुरक्षा की मांग करना एक साजिश है? क्या छात्राओं की मांग जायज नहीं थी? बिना महिला पुलिस के छात्राओं पर बल प्रयोग कहां तक जायज है?


यदि विश्वविद्यालय प्रशासन पहले ही ध्यान देता व कुलपति महोदय पहले ही आकर छात्राओं से बात कर लेते और आश्वासन देते, तो इस घटना को न तो इतना बड़ा स्वरूप मिलता। न ही छात्राओं के द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन राजनैतिक बनता, न ही किसी साजिश या षड्यंत्र का हिस्सा बनता। यदि यह साजिश, षड्यंत्र या राजनीति का हिस्सा बना तो विश्वविद्यालय प्रशासन की कमी, हठधर्मिता व अनदेखी से। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने सही ही कहा है…
‘जब नाश मनुज पर छाता है।
पहले विवेक मर जाता है।’

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