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बलात्कार पर दो टूक

Posted On: 3 Jan, 2013 Others में

RASHTRA BHAW"प्रेम भी प्रतिशोध भी"

vasudev tripathi

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बलात्कार की राजधानी बनती जा रही दिल्ली में 23 वर्षीय बालिका के साथ हुई बस गैंगरेप की अतिअमानवीय दुर्घटना ने देश को झकझोर कर रख दिया। दुर्भाग्य से शैतानी क्रूरता का शिकार हुई वह बालिका अब हमारे बींच नहीं है किन्तु इस घटना के बाद राक्षसी मानसिकता एवं व्यवस्था के विरुद्ध उठे देशव्यापी आक्रोश ने जिस प्रकार पहली बार एक आन्दोलन का रूप लिया व सम्पूर्ण सामाजिक विभीषिका पर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ी, इस पीड़ाप्रद व निराशाजनक वातावरण में यही थोड़ा सन्तोषप्रद है। निःसन्देह यह व्यापक जनाक्रोश मौकापरस्त व ढर्रावादी राजनीति के लिए एक चुनौती तथा व्यवस्था के लिए एक शुभ संकेत है, शायद इसी आधार पर अधिकतर बुद्धिजीवियों ने इसे नई पीढ़ी की नेतृत्वहीन क्रान्ति के रूप में परिभाषित करते हुए एक नए दौर की निश्चित भविष्यवाणी तक कर डाली किन्तु फिर भी वास्तविकता के कुछ अन्य पहलुओं की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।

दामिनी (काल्पनिक) गैंगरेप जैसे राक्षसी कुकृत्य की जितनी भी निन्दा की जाए वह कम है तथा राष्ट्रीय पीड़ा की ऐसी शर्मसार घड़ी में इस जघन्य अपराध के विरुद्ध व पीड़िता की सहानुभूति में आवाज उठाने वाला प्रत्येक नागरिक सम्पूर्ण राष्ट्र की ओर से धन्यवाद का पात्र है तथापि हम इस मुखर कटु सत्य से मुंह नहीं मोड़ सकते कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते” के आदर्शों व महान नैतिक मूल्यों की संस्कृति की नींव पर विकसित हुए इस राष्ट्र में आज प्रत्येक 22वें मिनट किसी भेड़िये द्वारा एक विवश नारी का बलात्कार होता है किन्तु समाज में आवाज उठना तो दूर पड़ोसी भी पीड़ित परिवार के साथ पुलिस स्टेशन तक जाने की सहानुभूति नहीं दिखाता.! बलात्कारियों द्वारा फेंकी गई दामिनी भी दिल्ली की रोड पर पुलिस द्वारा उठाए जाने तक नग्न पड़ी रही किन्तु उसे किसी की साहसपूर्ण सहानुभूति नहीं मिल सकी! क्या यह स्वार्थ के दीमक से संक्रमित हमारी कमजोर मानवता के खोखलेपन को नहीं उघेड़ता.? यह सत्य है कि इस कुकृत्य के विरोध में दिल्ली सहित पूरे देश में उमड़ा हुजूम स्वयं में अप्रत्याशित अनिर्देशित व भावनात्मक था तथापि हमें इस सवाल का जबाब खोजना ही होगा कि बलात्कार जैसे सामाजिक कलंक के विरोध में ऐसा जनसैलाब इस घटना से पहले अथवा बाद के किसी मामले में क्यों नहीं उमड़ा? यह जबाब तलाशना इसलिए आवश्यक है ताकि इस बार जली चेतना की यह मशाल बुझने न पाए।

जब पूरा देश दामिनी बलात्कार मामले में न्याय की मांग कर रहा था व गली-गली कैंडल मार्च किए जा रहे थे तब भी एक के बाद एक वीभत्स बलात्कार की घटनाएँ जारी थीं। पंजाब में एक बच्ची के साथ बलात्कार होता है, बंगाल में महिला के साथ बलात्कार होता है व तेजाब फेंका जाता है, सूरत में स्कूल प्रिन्सिपल द्वारा बच्ची के शोषण की घटना सामने आती है, नए साल पर दिल्ली में लड़की को नशा देकर दो युवकों द्वारा बलात्कृत किया जाता है तथा कई अन्य गैंगरेप इसी बींच हो जाते हैं। वर्तमान माहौल में मीडिया द्वारा इन घटनाओं को अपेक्षाकृत अधिक कवरेज भी मिलता है किन्तु कुल मिलाकर इन घटनाओं की मृत अथवा जीवित पीड़ितायेँ किसी भी सहायता व सहानुभूति से वंचित ही रह जाती हैं! इनमें से न तो किसी के लिए कोई रैली निकलती है और न ही कोई इतना बड़ा मुद्दा बन पाती हैं कि उन पर राजनीति हो व कोई राजनैतिक पार्टी अथवा समाज सुधारक आगे आ सके! उन शहरों से भी, जहां कि ये घटनाएँ हुईं, पीड़ित लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ते नहीं दिखे भले ही लोग हाथों में मोमबत्ती लेकर दामिनी को श्रद्धांजलि देने के लिए कतार लगाए हों!

क्या इससे कहीं न कहीं हमारी दोहरी मानसिकता स्पष्ट नहीं होती? इस बींच मैंने कई मित्रों व युवाओं से जिन्होंने दिल्ली बस गैंगरेप मामले में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया व जागरूकता दिखाई हाल की कुछ अन्य बलात्कार के गम्भीर मामलों का जिक्र किया तो उनमें से अधिकांश अधिकांश घटनाओं से पूर्णतः अपरिचित थे। कारण यह है कि हमारी युवा पीढ़ी, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में, रियल वर्ल्ड की अपेक्षा वर्चुअल वर्ल्ड में अधिक जी रही है। दामिनी गैंगरेप को सौभाग्य से मीडिया ने अच्छी गम्भीरता से उठाया व परिणामस्वरूप सोशल मीडिया पर एक तरह का अभियान चल पड़ा व देखते देखते मामला देश के कोने कोने तक पहुँच गया। किन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या मीडिया हाइप से नियंत्रित होने वाली आज की युवा पीढ़ी समाज में निर्णायक परिवर्तन को नेतृत्व प्रदान कर सकती है.? निश्चित रूप से एक समय के बाद मीडिया के लिए एक मुद्दे को दोहराते रह पाना संभव नहीं हो सकता। अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जिसमें कभी पूरे देश का नवयुवक जुड़ा दिखाई देता था आज निष्कर्षहीन मोड़ पर ठंडा पड़ चुका है। अतः एक सार्थक व निर्णायक पहल के लिए वर्तमान युवा पीढ़ी के सम्पूर्ण मानसिक व वैचारिक नवसृजन की आवश्यकता है। कैंडल मार्च तब तक सार्थक सिद्ध नहीं हो सकता जब तक यह युवा वर्ग यह नहीं समझता कि शारीरिक शक्ति से बलात्कार यदि निंदनीय है तो लड़की देखते ही फँसा लेना, सेट कर लेना और फिर यूज ऐंड थ्रो करके आगे बढ़ने की मानसिकता भी घोर निंदनीय है व षड्यन्त्रपूर्ण बलात्कार ही है। दुर्भाग्य से आज स्कूल से लेकर कॉलेज तक लड़के लड़कियों को माल कहने में जरा भी शर्म नहीं खाते, कई बार तो लड़कियां भी इसी राह पर दिखती हैं!

हमें समाधान के लिए समस्या की जड़ तक जाना होगा। इसे स्त्री बनाम पुरुष की बहस नहीं बनाया जा सकता, जैसा कि एक वर्ग द्वारा किया जाता है, क्योंकि बलात्कार पौरुषता का नहीं कायरता व नपुंसकता का काम है। चंद विकृत मानसिकता के लोग सम्पूर्ण समाज के प्रतीक नहीं हो सकते! ऐसे किसी अवसर पर प्रायः दो प्रकार के वैचारिक वर्ग सक्रिय हो जाते हैं- एक तो वे जो महिलाओं पर ही अंकुश लगाने की बात करते हैं और दूसरे वे जो आधुनिकता की आड़ में हर घटना का ठीकरा भारतीय सामाजिक संरचना पर फोड़ने का प्रयास करते हुए पश्चिम के और अधिक उन्मुक्त अनुसरण की की वकालत शुरू कर देते हैं। पहले उस रूढ़िवादी विचारधारा में हम उन लोगों को जबर्दस्ती नहीं घुसेड़ सकते जोकि असुरक्षित माहौल में नहीं चाहते कि उनकी अपनी बेटियाँ अथवा समाज की बेटियाँ किसी दुर्घटना का शिकार हों अतः देर रात तक लड़कियों के बाहर रहने आदि के विरोध में सलाह देते नजर आते हैं। यदि मेरी माँ मुझे हर बार यह बोलती है कि मैं जल्दी घर आ जाया करूँ अथवा शाम के बाद एटीएम से कभी पैसे निकालने मत जाऊँ तो इसका अर्थ यह नहीं कि वो लुटेरों का पक्ष लेना चाहती हैं और उल्टा मुझ पर नियंत्रण करना चाहती हैं। यह परिस्थितियों से उपजे भय की मानसिकता है। किन्तु सरकार अथवा प्रशासन में बैठा कोई व्यक्ति, जिसकी ज़िम्मेदारी ही वह व्यवस्था सुनिश्चित करना है जिसमें कोई भी कभी भी कहीं भी निर्भय होकर आ जा सके, बेशर्मी से महिलाओं को देर रात घर से न निकलने की सलाह किस प्रकार दे सकता है.? दुर्भाग्य से समाज में अभी तक ऐसे लोग भी हैं जो लड़कियों को सैद्धान्तिक रूप से पर्दे में कैद रखना चाहते हैं, निश्चित रूप से वे संकीर्ण मध्ययुगीन मानसिकता को ढो रहे हैं।
जिस प्रकार कितने भी संवेदनशील मुद्दे पर राजनैतिक पार्टियां पार्टीगत रोटियाँ सेंकने लगती हैं उसी प्रकार कुछ लोग विचारधारागत रोटियाँ सेंकने से भी बाज नहीं आते। इस बींच कुछ लोग अपनी पुरानी सोच को सही सिद्ध करने के लिए बलात्कार के संदर्भ में सऊदी अरब का उदाहरण देते भी नजर आए व शरीयत जैसे कानून को बलात्कार का उपाय बताने में लग गए। ये लोग सभ्यता की मौलिक अवधारणा को ही नहीं समझते! यह सही कि सऊदी अरब आदि स्थानों पर अपेक्षाकृत बलात्कार काफी कम संख्या में होते हैं किन्तु फिर भी ये देश भारत क्या किसी भी देश के लिए आदर्श नहीं हो सकते। बलात्कार स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसका शारीरिक शोषण माना जाता है किन्तु इन देशों में तो स्त्री की इच्छा की ही हत्या कर दी जाती है। स्त्रियों को न बाहर निकलने की स्वतन्त्रता है न अपना जीवन जीने की! स्त्रियॉं लड़कियों की खरीद फरोख्त व तलाक जैसी विभीषिकायेँ प्रतिदिन बलात्कार जैसी ही हैं!

पश्चिमीकरण को समाधान के रूप में प्रस्तुत करने वाले भी आधुनिकता के नाम पर रूढ़ सोच के गुलाम हैं। सच्चाई यह है कि दुनिया में सबसे अधिक बलात्कार पश्चिमी उन्मुक्तता के रोल मॉडल अमेरिका में ही होते हैं। एफ़बीआई के आंकड़ों के अनुसार 2011 में अमेरिका में 83,425 बलात्कार के मामले हुए। 2010 में 85,593 मामले सामने आए थे। 2011 में प्रति 1 लाख जनसंख्या पर अमेरिका में बलात्कार का रेट 26.8 था जबकि भारत में भारी बढ़ोत्तरी के बाद यह रेट लगभग 2 प्रतिशत है। महिलाओं की प्रति 1 लाख संख्या पर अमेरिका में बलात्कार रेट 52.7 है जबकि भारत में 4.13 है। ब्रिटेन जर्मनी फ्रांस आदि सभी तथाकथित विकसित देशों में महिलाएं कहीं अधिक बलात्कार का शिकार होती हैं। प्रायः कहा जाता है कि सामाजिक शर्म अन्य कारणों से भारत में बड़ी संख्या में बलात्कार की घटनाएँ दर्ज नहीं कराई जातीं किन्तु ऐसा अन्य विकसित देशों में भी होता है। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक समाचार के अनुसार 2010-11 के बींच अमेरिकी सरकार द्वारा कराये गए एक सर्वे में सामने आया कि हर पाँच में से एक अमेरीकन महिला बलात्कार का शिकार होती है। रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष 13 लाख महिलाएं बलात्कार/बलात्कार के अटैक का शिकार होती हैं। स्वाभाविक है कि यह संख्या दर्ज आंकड़ों से कहीं अधिक है। विकसित देशों में बलात्कार की यह स्थिति स्वच्छंद सेक्स प्रवत्ति के बाबजूद है। क्या ये आंकड़े स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं कि उच्छृलंक आधुनिकता विकृत सेक्स का इलाज नहीं वरन इस बीमारी की जड़ है?

नैतिक मूल्यों को खोते भारत में बलात्कार सबसे तेजी से बढ़ता अपराध है जिसमें 1971 (2,487 बलात्कार) से 2011 (24,206 बलात्कार) के बींच 873.3% की वृद्धि हुई है। बलात्कार स्त्री-पुरुष के बींच संघर्ष अथवा तथाकथित रूप से किसी पुरुषवाद का परिणाम नहीं वरन एक विकृत मानसिकता का परिणाम होता है अन्यथा आप एक पिता द्वारा अपनी अबोध बच्ची के साथ बलात्कार को किस तरह परिभाषित करेंगे? ऐसी घृणित घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं, अभी 27 दिसम्बर को नोएडा दादरी में ऐसी घटना फिर सामने आई है। ज्ञात रूप से 2011 में 267 बलात्कार की ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जिनमें निकट परिवार के लोग गुनहगार थे। कई घटनाओं में कम उम्र के लड़के भी शोषण का शिकार हुए थे। 20 घटनाओं में पीड़िता/पीड़ित की उम्र 10 साल के भीतर, 48 में 10 से 14 वर्ष के भीतर व 102 में 14 से 18 वर्ष की भीतर थी। अमेरिका में पुरुषों को भी बलात्कार के दायरे में कानूनी रूप से सम्मिलित किया जा चुका है तथा कुल बलात्कार के मामलों में 9% पुरुष इसके शिकार होते हैं। यही नहीं अब लगभग 1% महिलाएं भी बलात्कार की आरोपी हो चुकी हैं। पॉर्न व मनोरंजन के नाम पर बढ़ती अश्लीलता की छत्रछाया में बढ़ती नयी पीढ़ी के चलते अब फ़ीमेल-फ़ीमेल रेप की अलग श्रेणी भी बना दी गई है। अवयस्क बच्चे भी अब बलात्कारी हो रहे हैं! भारत में 2011 में 1231 बच्चे बलात्कार के आरोप में पकड़े गए।
क्या यह डरावना चित्र स्वयं ऐसे कारणों को स्पष्ट नहीं करता जोकि आज हमारे देश में छिड़ी बहस से या तो गायब हैं अथवा उपेक्षित हैं? आवश्यकता है इस सामाजिक विभीषिका पर दो टूक चिन्तन की और अपने अन्दर झाँकने की! स्त्री को न परम्परा के नाम पर चहरदीवारी में कैद किया जा सकता है और न ही मनोरंजन के नाम पर सरेआम अश्लीलता के साँचे में आइटम बनाकर पेश किया जा सकता है। यदि हम अपने सनातन सांस्कृतिक नैतिक मूल्यों की ओर लौटते हुए एक स्वतंत्र उदार किन्तु आचारबद्ध समाज की पुनर्स्थापना का संकल्प लेकर स्वयं तथा अपने बच्चों को मर्यादा, नैतिकता व आचरण का पाठ पढ़ाएँ तो यही हजारों लाखों दामिनी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी व समाज के पापों का प्रायश्चित्त भी!! इसके बाद ही न्यायिक प्रक्रिया में सुधार अथवा नए कठोर कानून, जोकि आवश्यक हैं, प्रभावी हो सकते हैं।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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