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टीम अन्ना के राजनीति में प्रवेश के निहितार्थ

Posted On: 4 Aug, 2012 Others में

RASHTRA BHAW"प्रेम भी प्रतिशोध भी"

vasudev tripathi

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0दस दिन तक चले टीम अन्ना के अनशन के समाप्त होने पर एक भी उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकी जिसके लिए अनशन प्रायोजित था किन्तु टीम अन्ना की ओर से राजनीति में उतरने की अनपेक्षित घोषणा ने लोगों को चौंका अवश्य दिया। इससे अन्ना समर्थकों और यहाँ तक कि उनके खेमे में भी दो फाड़ हो गए हैं। टीम अन्ना के राजनीति में उतरने के निर्णय को समझने से पहले हमें इस चरण के अनशन के घटनाक्रम को समझना होगा।
25 अगस्त से प्रारम्भ हुआ यह अनशन मुख्य रूप से भ्रष्ट मंत्रियों के विरुद्ध त्वरित कार्यवाही की मांग पर केन्द्रित था। यहाँ तक कि जनलोकपाल को भी एक सीमा तक टीम ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था, यह स्वयं अन्ना ही थे जो जनलोकपाल की मांग दोहराते रहे। उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस बार अनशन का प्रारम्भ अन्ना द्वारा स्वयं न करके अरविन्द केजरीवाल व मनीष शिसोदिया द्वारा किया गया। यद्यपि इसके पीछे टीम अन्ना के स्वास्थ्य को कारण बताने का प्रयास करती रही किन्तु इसमें सुदृढ़ आधार दिखाई नहीं देता। अन्ना संभवतः अनशन के लिए तैयार थे और पाँच दिन बाद वे अनशन पर बैठ भी गए और पाँच दिन तक अनशन पर स्वस्थ भी रहे। प्रश्न उठता है कि क्या टीम अन्ना नहीं चाहती थी कि अन्ना इस बार अनशन पर बैठें? स्वास्थ्य के प्रश्न पर बात को कैसे टाला जा सकता है जबकि आप आमरण अनशन पर बैठे हों और बलिदान देने की बात कर रहे हों? अतः कहीं न कहीं यह शंका उठती ही है कि क्या टीम अथवा टीम के कुछ सदस्यों की मंशा अन्ना के स्थान पर अरविन्द केजरीवाल को आंदोलन के मुखिया के रूप में आगे करने की थी? इस शंका को तब और बल मिलता है जब इस बार अभियान की प्रचार शैली पर हम ध्यान देते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जोकि टीम अन्ना के प्रचार का सबसे बड़ा माध्यम रहा है, पर अन्ना की अपेक्षा केजरीवाल अधिक छाए रहे। टीम अन्ना के एक प्रमुख सदस्य कुमार विश्वास के पेज पर तो सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल के समर्पण और बलिदान के कसीदे दिखते रहे जिस पर मैंने प्रश्न भी किया था कि अन्ना कहाँ हैं? स्वास्थ्य तो केजरीवाल का भी ठीक नहीं था क्योंकि वो मधुमेह (शुगर) के रोगी हैं किन्तु इसके कारण टीम ने उन्हें अनशन के लिए नहीं रोका अपितु इसे अधिक से अधिक प्रचारित करने का प्रयास किया गया कि अरविन्द बलिदान देने का संकल्प ले चुके हैं। स्वयं अरविन्द भी दोहराते रहे कि वे बलिदान देने से पीछे नहीं हटेंगे। दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न आंदोलन के उद्देश्य व संकल्प को लेकर उठता है। जिस प्रकार केजरीवाल लगातार यह दोहराते रहे कि इस बार लड़ाई आर-पार की है और वे पीछे नहीं हटने वाले जब तक सरकार उनकी मांग मान नहीं लेती, उससे आम समर्थकों को पुनः आशा जगी थी। किन्तु जिस तरह आंदोलन को दसवें दिन बिना किसी निष्कर्ष व सार्थक कारण के चुपचाप समाप्त कर दिया गया उससे न सिर्फ जनता को निराशा हाथ लगी अपितु आन्दोलन की सार्थकता व टीम-अन्ना की कार्यशैली पर भी प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। प्रश्न उठता है कि क्या केजरीवाल और टीम को यह आशा थी कि वे दस दिनों में ही वह हासिल कर लेंगे जिसके लिए उन्होने बलिदान के नारे के साथ आन्दोलन के इस चरण का श्रीगणेश किया था.? इतना तो देश का आम से आम आदमी भी जानता था कि सरकार इतना शीघ्र झुकने वाली नहीं है, क्या पिछले कई दौर का अनुभव लिए टीम अन्ना को यह बात नहीं पता थी? यदि पता थी तो ऐसी कौन सी नई परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गईं कि अनशन को बेनतीजा बींच में ही छोड़ देना पड़ा.?
राजनैतिक दल बनाने की घोषणा का जहां तक प्रश्न है तो यह नहीं स्वीकारा जा सकता कि यह एक-दो दिन में उपजा विचार है। इतना बड़ा निर्णय तात्कालिक नहीं हो सकता भले ही टीम अन्ना समर्थकों से राय देने की बात कहकर इसकी सुनियोजितता को छुपाना चाहती हो। समर्थकों को भी मात्र दो दिन इतने बड़े विषय पर अपनी राय देने के लिए दिए गए। यदि फिर भी निर्णय तात्कालिक है तो निश्चित रूप से अपरिपक्व है और लंबे समय तक टिकने वाला नहीं, और यदि पूर्वनिर्धारित था तो इसे अनशन के दसवें दिन तक क्यों नहीं सामूहिक किया गया.? इस समूचे घटनाक्रम से जो तर्कसंगत निष्कर्ष निकलता है वह यह कि या तो अन्ना आंदोलन रणनीतिक दिशाहीनता की स्थिति में पहुँच चुका है अथवा इस चरण के अनशन का एकमात्र उद्देश्य राजनीति में उतरने के निर्णय के लिए माहौल बनाकर घोषणा करना था।
जहां तक अन्ना का प्रश्न है इसके बहुत अधिक कारण नहीं हैं कि राजनीति का विचार उनकी उपज हो और अरविन्द केजरीवाल व मनीष शिसोदिया की जनता के मध्य आज भी अन्ना जैसी छवि नहीं है कि उन पर जनता अन्ना सा विश्वास व्यक्त कर सके। यदि अन्ना फैक्टर को भुनाया भी जाता है तो भी राजनीति की राह इतनी आसान नहीं होने वाली। राजनैतिक दल के गठन के लिए न तो टीम अन्ना के पास तन्त्र है और न ही अनुभव। जनसमर्थन का सैलाब भी अब सिमट सा चुका है जैसाकि इस अनशन से स्पष्ट था। इसके अतिरिक्त टीम अन्ना के लिए 2014 तक पूरे देश में वह संगठन खड़ा कर पाना भी संभव नहीं होगा जो राष्ट्रीय सफलता के लिए किसी दल को चाहिए होता है। निष्कलंक ईमानदार प्रत्याशियों का चयन, वह भी जिताऊ, इसके बाद की वह टेढ़ी खीर है जिसे पकाना सरल नहीं! अंत में सुस्थापित राजनीति में प्रत्याशियों को जिता पाना वह चुनौती होगी जिसमें रणनीति व राजनीति के महापुरोधाओं के दांत खट्टे हो जाते हैं। टीम अन्ना तो अभी चंद सदस्यों की टीम का ही प्रबंधन नहीं कर पा रही है। प्रायः एकदूसरे के बयान को व्यक्तिगत कहकर टीम कन्नी कटती रहती है। टीम में कोई प्रशान्त भूषण सा कश्मीर पर पाकिस्तानी रुख का समर्थक है तो कुछ नक्सलियों के शुभचिंतक व सेना के विरुद्ध अभियान चलाने वाले! इस सबके बाद भी यदि मान लिया जाए कि कुछ सीटें केजरीवाल व सहयोगी निकाल भी लेते हैं तो भी चंद सीटों से न तो लोकपाल आने वाला है और न भ्रष्टाचार ही समाप्त होगा। इससे कहीं न कहीं कांग्रेस को ही लाभ होगा जिसके भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आन्दोलन का जन्म हुआ था| फिर शायद केजरीवाल को भी उसी तरह के राजनैतिक समझौते करने पड़ें जैसे कि उत्तर प्रदेश में एक दूसरे को भरपेट गाली देने वाली सपा-बसपा-कॉंग्रेस केंद्र में तथाकथित सांप्रदायिक ताकतों को रोकने की विवशता के चलते करते हैं। भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही के लिए अनशन करने वाले केजरीवाल ऐसा नहीं करेंगे यह भी कैसे कहा जा सकता है जबकि उन्हें अपने आन्दोलन को सेकुलर बनाए रखने की मजबूरी के चलते इमाम बुखारी से दर पर चलकर जाना पड़ता है बाबजूद इसके कि कोर्ट बुखारी को गंभीर आरोपों के तहत गैरजमानती वारंट जारी कर चुकी है व भगोड़ा तक घोषित कर चुकी है!
यद्यपि हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध दृढ़ता से अन्ना के साथ हैं किन्तु टीम अन्ना के लिए अभी यही बेहतर होगा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनजागृति को लक्ष्य कर के जमीन पर काम करे| एक बड़े परिवर्तन की उम्मीद तभी की जा सकती है जब हमें राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं व समझौतावादी प्रकृति से रहित जयप्रकाश जैसा कुशल दूरदर्शी नेतृत्व व सरदार पटेल जैसा दृढ़ व्यक्तित्व मिले।
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-वासुदेव त्रिपाठी

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