blogid : 7644 postid : 94

चाचा मेरी माँ को बचा लो ........

Posted On: 26 Apr, 2012 Others में

दिल की बातJust another weblog

विजय 'विभोर'

52 Posts

89 Comments

दोस्तो हम एक सभ्य समाज में रहते हैं जहाँ पर रिश्ते नाते बहुत माने रखते हैं ……. क्या ये सही है बात है या सिर्फ़ एक बोझ, दिखावा या कुछ और ही है ….. इन सभी पहलुओ को उधेड़ते-बुनते हुए प्रस्तुत है एक कहानी| उम्मीद है पसंद आएगी —–

दीवाली का दिन था धर्मराज अपने घर में बैठा शाम को होने वाले लक्ष्मी पूजन का खाका दिमाग़ में खिच रहे था ….. तभी उसका भतीजा दौड़ा दौड़ा आया और चाचा (धर्मराज) को कहा चाचा मेरी माँ को बचा लो वो अस्पताल में दम तोड़ देगी| देख भाई ललित मेरे पास तो इतना पैसा है नही जो मैं तुम्हारी मदद कर सकूँ| ललित ने कहा चाचा मैं चारो और से निराशा से हताश होने के ही बाद आपके पास इस उम्मीद से आया हूँ की वो जो अस्पताल में इलाज के अभाव में दम तोड़ देगी वो भी आपकी कुछ लगती है, बड़ी भाभी है वो आपकी जो माँ समान होती है| बात तो तुम्हारी ठीक है, वो मेरी भाभी है जिसने मुझे किसी भी तरह की परेशानी नही आने दी, किंतु मजबूर हूँ ललित मैं बिल्कुल सच कहता हूँ मेरे पास इतने पैसे हैं नही कि मैं तुम्हारी किसी भी प्रकार से मदद कर सकूँ| देख लो चाचा कुछ हो सकता हो तो, नही तो बस उस जीवन देने वाले का ही सहारा है, उसकी मर्ज़ी है कि मैं इस संसार में बिन माँ के जीवन बिताऊँ तो ये ही सही| ललित धर्मराज के घर की दहलीज लाँघ चुका था कि ना जाने कौनसी घड़ी पलटी या चमत्कार हुआ, धर्मराज ने ललित को आवाज़ दी… ललित एक बार वापस आ तो सही| ललित अपने चेहरे को गम्छे पौचते हुए आया, धर्मराज ने कहा बोल कितने रुपये लगेंगे| ललित को कुछ उम्मीद दिखी वो बोला चाचा डाक्टर ने 2 लाख माँगे हैं| भाई दे देता हूँ किंतु ब्याज लगेगा और वो भी 3 रुपये सैकड़ा का, बोल क्या कहता है दूं रुपया| चाचा आपकी ये ही मदद बहुत बड़ी होगी की आप वक्त पर मेरी मां के इलाज के लिए रुपया देंगे, ब्याज तो क्या है जान है तो चुका ही दूँगा, माँ की शीतल छाया तो बनी रहेगी| धर्मराज ने कागज़ी कार्यवाही पूरी की और दो महीने का अग्रिम ब्याज काट कर रुपये ललित को दे चलता किया| ललित के जाने के बाद धर्मराज का बड़ा बेटा रामराज बोला पिताजी आपने ये क्या किया ब्याज का आम रेट तो 1रुपया सैकड़ा चल रहा है, और आपने ललित को 3 के हिसाब से दे दिया| बेटा धंधे में कोई रिश्ता नाता नही है| रिश्तो की शरम जो करेगा वो कभी पैसे वाला नही बन सकता| तुम्हारी ताई, ललित की माँ ने हमेशा रिश्तो को महवत दिया और वो ही ललित को सिखाया| देखो वो आज कितना मजबूर है और मैने हमेशा ही अपना दिमाग़ इस्तेमाल किया है, तो आज मेरे पास किसी भी सुख-सुविधा की कोई कमी नही है| चल छोड़ ये सब फालतू की बाते आज दीवाली है शाम को लक्ष्मी पूजन है, बड़ी धूम धाम से लक्ष्मी पूजन करेंगे|

लक्ष्मी पूजन का समय हो गया तो धर्मराज ने अपने पूरे परिवार के साथ लक्ष्मी पूजन किया| पूजा की थाली में तिजोरी में रखा सारा का सारा रुपया रखा, लक्ष्मी को प्रसन्न करने के वास्ते सारा रुपया पूजा की थाली में ही रख कर सारे का सारा परिवार सो गया| अगली शुबहा धर्मराज ने उठ कर पूजा की तली संभाली तो वहाँ पर राख राख और सिर्फ़ राख थी| पूजा की थाली में रखे हुए दिये से लक्ष्मी राख में बदल चुकी थी, लगभग 6-7 लाख हो गये थे राख राख और सिर्फ़ राख| अभी इस हादसे से धर्मराज ठीक से निकला भी नही था की उसका बेटा रामराज अपनी जवान बीवी को छोड़ कर घर से गायब हो गया| इधर धर्मराज किस भी काम में हाथ डालता वही उसको ���टा ही उठना पड़ता| समय बिता तो घरवालों ने रामराज को मरा समझ लिया| रामराम की पत्नी जवान थी और जवान औरत का पति पास ना हो तो वो बिना ल��ाम की घोड़ी हो जाती है जिसकी सवारी कोई भी करने की कोशिश करता है| कदम बहकने में देरी ही कितनी लगती है, और इस संसार में बिन भाड़े के सवार तो बेशुमार फिरते हैं, किंतु धर्मराज ने अपनी चालाकी से रामराज की पत्नी का नाड़ा कही और खुलने से पहले खुद ही खोल लिया| पहले जो रामराज का बिस्तर गरम करती थी वो अब धर्मराज का बिस्तर सवारने लगी| राज कितने दिन तक राज रहता, ससुर बहू का रिश्ता सभी को पता चल चुका था| सभी उस परिवार से दूर ही रहने की कोशिश करने लगे| यदि दूसरे शब्दो में कहे तो धर्मराज का परिवार समाज से एक प्रकार से कट सा गया था|

उधर ललित के सर पर उसकी माँ का आँचल नीले आकाश की भाँति छाया हुआ था| उसने अपनी मेहनत और माँ के आशीर्वाद से धर्मराज से लिया हुआ कर्ज़ सूद समेत उतार दिया| वो जिस भी काम में हाथ डालता सफलता उससे चार कदम आगे खड़ी मिलती| एक समय में कर्ज़ में डूबा हुआ ललित आज सभी भौतिक सुख सुविधा अपने घर में जुटा चुका था| अपनी माँ की पसंद की एक सुंदर और सुशील लड़की से शादी भी कर ली| समाज में आज ललित को एक दर्जा मिला हुआ था, लोग उसकी सादगी, मेहनत और सच्चाई की कसमे खाने को तैयार रहते थे|

दोस्तो कहानी कैसी लगी …….. आपके कोमेंटों का इंतजार है ……..

Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग