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जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा की चरमराहट

Posted On: 8 Mar, 2016 Others में

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विजय 'विभोर'

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भारत ने लंबे लोकतांत्रिक सफर में किसी शासक या उसके पुलिसतंत्र को किसी वाजिब आवाज को दबाने की अनुमति नहीं दी। यही कारण है कि पिछले कुछ समय से मध्यवर्ती जातियों ने अपने समुदाय को आरक्षण दिए जाने के लिए आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया हुआ है। उनका कहना है कि उन्हें भी अपने समतुल्य किसान जातियों की तरह ही आरक्षण दिया जाए ताकि वे विकास की दौड़ में आगे बढ़ सकें। गुजरात में पटेल, पाटीदार और हरियाणा में जाट आंदोलन को इसी नजर से देखा सकता है। जबकि एक सर्वे बताता है कि वर्तमान समय में पटेलों और जाटों से ज्यादा तो ब्राह्मणों तथा राजपूतों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है।

सत्तारूढ़ गठबंधन उन्हीं तर्कों को मान्यता देता है, जिसकी जिन्हें स्वीकृति होती है। परन्तु दंभपूर्ण व्याख्या धमकाने की चेष्टा करती है, हरियाणा में भी आरक्षण की मांग कर रहे और स्वयं को अन्नदाता कहलाने वाली जाट जाति ने यह नारा लगाते हुए देश की राजधानी दिल्ली के लिए पेयजल सप्लाई करने वाली अहम मुनक नहर तोड़ दी कि अगर हम भूखे रहने को मजबूर हुए तो आप भी प्यास से तड़पकर जान दोगे।

जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा की चरमराहट संपूर्ण, व्यापक और बेहद विनाशक थी। एक दूसरे पर निर्भर आपसी भाईचारे के बावजूद हरियाणा के गली-मोहल्ले कई दिनों तक गुंड़ों के कब्जे में रहे। हरियाणा में जो कुछ हुआ वह मध्य युग में किसी आक्रांता के हमले के दौरान ही हो सकता था। कानून की सत्ता को एक जाति विशेष से प्रत्यक्ष चुनौती मिल रही थी। आपसी भाईचारे का इतना भीषण अतिक्रमण शायद ही कभी हुआ हो। एक सप्ताह तक आमजन के लिए गाँवों तक के कच्चे रस्ते आने जाने के लिए बंद पड़े थे, बच्चों को स्कूल जाना और सरकारी कर्मचारियों का अपने कार्यालयों में जाना बंद हो गया था। प्रशासन इस बंद को खुलवाने में नाकाम रहा और शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने वाले नेता भूमिगत प्रतीत हो रहे थे। इस दौरान अधिकारी वर्ग या तो संकट का पूर्वाभास पाने की अपनी प्रशिक्षित क्षमता को ही खो बैठा था या फिर लूटपाट, आगजनी करने वालों के साथ अधिकारीयों की कोई संधि हो गयी थी जो अचानक ही लुटेरों की ट्रैक्टर ट्रॉलियों के लिए रास्ते खुल गए और जाट आरक्षण आंदोलन विनाशकारी हो गया। कल तक जिस भाई को अपनी बेटी की शादी में खाना बनाने, साजसज्जा करने का ठेका दिया जाता था उसी की रोजी रोटी में आग लगायी गयी। जिस भाई से लत्ते-कपड़े ख़रीदे जाते थे उसी की दुकान को लूट कर आग के हवाले कर दिया गया।जिस शिक्षा के बल पर आरक्षण की मांग की जाती है इन विनाशकारी आंदोलनकारियों ने उन्ही शिक्षा के मंदिरों (स्कूलों) तक को आग के हवाले कर दिया गया जहाँ पर हर धर्म बिरादरी के बच्चे भेदभाव भुला कर अच्छे मित्र और नागरिक बनने की शिक्षा ग्रहण करते थे। ये सब हरियाणा के एक क्षेत्र विशेष में व्यापक रूप से हुआ। तीन दिन तक हरियाणा की पुलिस और दमकल कहीं विदेश चली गयी थी और बाजारों में सिर्फ लाठी, बरछे, डंडे लहराते हुड़दंगी ही काबिज़ थे। अफवाहों के दौर सुपर सोनिक गति से चल रहे थे, फलां बिरादरी ने फलां बिरादरी के इतने आदमी मार दिए। यदि स्वबरीदारी का कोई इन अफवाहों को गलत कहने की कौशिश करता भी तो उसको ये कह कर चुप करवा दिया जाता कि जब कुछ विनाश होगा तभी तो आरक्षण मिलेगा। मुख्य मंत्री साहब ने आरम्भ में ही आरक्षण की मांग को मान लिया था उसके बावजूद आम जनता के साथ ये खुला बलात्कार किया गया।


हरियाणा कोई ऐसा प्रदेश नहीं है जो चारों तरफ से समुन्द्र से घिरा हो और सेना की टुकड़ियों को हेलीकॉप्टरों से उतारना पड़े। इस विनाशकारी आंदोलन का एक गंभीर दुष्परिणाम और हुआ है : सेना की संस्थात्मक प्रतिष्ठा क्षतिग्रस्त हो गयी है। हरियाणा में किसी तरह सेना को तैनात तो किया गया लेकिन उसके कार्यवाही न करने का परिणाम यह हुआ कि एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण मिथ्याधारणा पनपने लगी कि सेना आगजनी करने वाले जाटों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई नहीं करना चाहती क्यूंकि सेना प्रमुख भी जाट बिरादरी से ही हैं। इसके बाद से भाईचारे की मिसाल इस हरियाणा प्रदेश का हर नागरिक अकेलापन महसूस करने लगा और जीवन भर की कमाई लुटती नज़र आयी। जाट आंदोलन के दौरान जिस हिंसा और आगजनी से हरियाणा झुलसा है, बर्बादी का जो ताडंव हुआ राष्ट्र के खिलाफ कोई भी कार्य करने वाला, सरकारी अथवा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाला माफी के लायक नहीं है। उस आग का धुआं लोगों के दिलों से दशकों तक उठता रहेगा। ऐसा लगता है किसी एक की हठधर्मिता के चलते एक संयुक्त परिवार टूट गया हो। लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद की समूची संयुक्त शक्ति भी इतनी व्यापक क्षति नहीं पहुंचा सकती थी जितनी क्षति इस उपद्रव ने पहुंचायी। इस विनाशक जाट आरक्षण आंदोलन के बाद से भाईचारा और अधिक बिगड़ गया है।

अब सत्तारूढ़ अभिजात्य वर्ग मुआवजे की मरहम पट्टी करने पर लगा हुआ है परन्तु भाईचारे पर लगे इस घाव के निशान कैसे मिटेंगे इसका प्रावधान कैसे होगा इसका जवाब न तो अन्नदाता के पास है और न ही अभिजात्य वर्ग के पास। वर्तमान समय में तो कोई सम्राट अशोक भी नहीं है जो विनाशक कलिंग विजय के बाद शांति दूत ही बन जाए

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