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प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता

Posted On: 4 Mar, 2012 Others में

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vikaskumar

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यह सामान्य अनुभव की बात है कि जब गरीब वर्ग की आय में वृद्धि होती है तो उनके द्वारा ली जा रही भोजन की मात्रा तथा गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है । इस बात कों ध्यान में रखकर यदि हाल में कृषि मंत्रालय द्वारा जारी प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता के आँकड़ों पर ध्यान दें तो कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं। मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010 में प्रति व्यक्ति दैनिक खाद्यान्न उपलब्धता 438.6 ग्राम थी जो पिछले वर्ष अर्थात् 2009 की तुलना में कम है । वर्ष 2009 में यह 444 ग्राम थी । वैसे अगर हम वर्ष 2006 से 2010 के बीच के पाँच वर्ष के आँकड़ों पर पर नजर डालें तो कोई उत्साहवर्धक तस्वीर सामने नहीं आती ।
पिछले बीस वर्षों में भारत की राष्ट्रीय आय लगातार बढ़ी है । कई बार तो यह काफी तेज गति से बढ़ी है । यह बात भी किसी छिपी नहीं है कि भारत में गरीबी काफी अधिक है । यहाँ आबादी का एक बड़ा हिस्सा कुपोषित अथवा अल्प -पोषित है । भोजन की कम मात्रा तथा नीची गुणवत्ता के कारण ही ग्लोबल हंगर इंडेक्स -2010 में भारत का स्थान 67 वाँ था । ग्लोबल हंगर इंडेक्स में जिस देश का स्थान जितना नीचा होता है वहाँ खाद्य सुरक्षा की स्थिति उतनी कमजोर होती है । इस लिहाज से यहाँ राष्ट्रीय आय बढ़ने पर प्रति व्यक्ति दैनिक खाद्यान्न उपलब्धता बढनी चाहिए , परन्तु वास्तव ऐसा नहीं हो रहा है ।
हरित क्रांति के बाद भारत में खाद्यान्न उत्पादन तेजी से बढ़ा । आज भारत के पास ख्द्यान्नों का विशाल भंडार है । इन सबके बावजूद प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता अपेक्षा से कम क्यों ? इसका एक कारण मँहगाई है जिसके कारण लोग बाजार में वस्तुएँ रहते भी खरीद नहीं पाते । सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी दोषपूर्ण है जिसके कारण अन्न का विशाल भंडार रहते हुए भी उसका वितरण ठीक से नहीं हो पाता । इस स्थिति के कुछ सामाजिक कारण भी हैं । आज के युग में लोग दिखावे की वस्तुएँ खरीदने में बहुत अधिक खर्च करते हैं जिससे आवश्यक वस्तुओं पर व्यय कम हो जाता है ।
इस स्थिति में सुधार करना आवश्यक है । यदि खाद्यान्न उपलब्धता कम रही तो मानव संसाधन का विकास ठीक से नहीं हो पाएगा । भोजन की मात्रा का सीधा संबंध मनुष्य की कार्यक्षमता से है । अच्छा भोजन , अच्छी कार्यक्षमता । प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता बढ़ाने के लिए कई उपाय करने होंगे । इसके लिए आर्थिक एवं सामाजिक -दोनों प्रकार के सुधार आवश्यक हैं । मँहगाई में कमी लानी होगी । सार्वजनिक वितरण प्रणाली कों बेहतर बनाना होगा । ऐसे सामाजिक सुधार लाए जाएँ जिनसे लोग दिखावे की वस्तुओं पर कम खर्च करें और आवश्यकता की वस्तुओं पर अधिक ध्यान दें ।

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